कांग्रेस घास : अमेरिका से आई वह मेहमान जो पूरे हिंदुस्तान में फैल गई

Congress Grass: The visitor from America that spread across the whole of India

‘गाजर घास’ के आगमन, विस्तार और ‘कांग्रेस घास’ नाम के पीछे की कहानी

सत्य भूषण शर्मा

सड़क के किनारे, खाली मैदानों में, रेलवे पटरियों के आसपास, खेतों की मेड़ों पर और बरसात के बाद उभरती सफेद फूलों वाली एक साधारण-सी वनस्पति को हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन यह मामूली दिखाई देने वाला पौधा पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस है—जिसे भारत में गाजर घास, कांग्रेस घास अथवा कांग्रेस वीड के नाम से जाना जाता है। आज यह देश की सबसे चर्चित आक्रामक खरपतवारों में शामिल है।

हिंदुस्तान की मूल वनस्पति नहीं है:

कांग्रेस घास भारत की देशज वनस्पति नहीं है। इसका मूल क्षेत्र उष्णकटिबंधीय अमेरिका, विशेषकर मध्य एवं दक्षिण अमेरिका तथा वेस्ट इंडीज माना जाता है। बाद में यह दुनिया के कई हिस्सों में फैल गई। भारत में इसके प्रवेश को सामान्यतः 1950 के दशक के मध्य में अमेरिका से आयातित खाद्यान्न, विशेषकर गेहूँ, के साथ आए बीजों से जोड़ा जाता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के स्रोत भी अमेरिका से आयातित गेहूँ के साथ इसके भारत में आने का उल्लेख करते हैं।

उस समय भारत खाद्यान्न की कमी और कठिन आर्थिक परिस्थितियों से गुजर रहा था। अमेरिका से खाद्यान्न आयात किए गए। इसी खाद्यान्न के साथ अनजाने में पार्थेनियम के बीज भी भारत पहुंच गए—ऐसा वैज्ञानिक साहित्य में व्यापक रूप से स्वीकार किया गया है। हालांकि कुछ शोध स्रोत यह संभावना भी व्यक्त करते हैं कि इसका बीज इससे पहले किसी अन्य दूषित अनाज के माध्यम से भारत पहुंच चुका हो सकता है और बाद में 1950 के दशक में इसका स्पष्ट प्रसार दिखाई दिया।

भारत में इसकी पहली उल्लेखनीय उपस्थिति पुणे, महाराष्ट्र के आसपास 1950 के दशक में दर्ज हुई। इसके बाद इसकी फैलने की गति इतनी तेज रही कि कुछ दशकों में यह देश के लगभग सभी हिस्सों तक पहुंच गई।

फिर इतनी तेजी से कैसे फैल गई?

यही इस खरपतवार की सबसे बड़ी विशेषता है। पार्थेनियम अत्यंत तेजी से बढ़ता है और बड़ी संख्या में बीज पैदा करता है। उसके बीज हवा, वर्षाजल, मिट्टी, कृषि उपज, पशुओं, वाहनों तथा मनुष्यों की गतिविधियों के माध्यम से दूर-दूर तक पहुंच सकते हैं। भारतीय वन्यजीव संस्थान के एक विवरण में यह भी उल्लेख है कि इसके बीज लंबे समय तक जीवित रह सकते हैं।

शहरों की खाली जमीन, सड़क किनारे की मिट्टी, निर्माणाधीन क्षेत्र, रेलवे लाइन के आसपास की भूमि और खेतों की उपेक्षित जगहें इसके लिए अनुकूल स्थान बन गईं। परिणाम यह हुआ कि जो पौधा कभी भारत के लिए अपरिचित था, वह धीरे-धीरे ग्रामीण और शहरी दोनों परिदृश्यों का हिस्सा बन गया।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अनुसार देश में इसके संक्रमण का अनुमान लगभग 3.5 करोड़ हेक्टेयर तक लगाया गया है; अलग-अलग समय और आकलन-पद्धतियों के कारण वास्तविक क्षेत्रफल में परिवर्तन संभव है।

इसे ‘गाजर घास’ क्यों कहा गया?

इसके पत्तों और शुरुआती अवस्था में पौधे की बनावट कुछ हद तक गाजर के पौधे जैसी दिखाई देती है। इसी कारण भारत के कई क्षेत्रों में इसे ‘गाजर घास’ या ‘गाजर बूटी’ कहा जाने लगा। महाराष्ट्र में इसके लिए ‘गाजरगवत’ जैसे स्थानीय नाम भी प्रचलित हैं।

लेकिन इसके नाम की सबसे दिलचस्प कहानी है—‘कांग्रेस घास’।

‘कांग्रेस घास’ नाम कैसे पड़ा?

इस प्रश्न का उत्तर देते समय सावधानी आवश्यक है, क्योंकि इसके नाम की उत्पत्ति के संबंध में अलग-अलग व्याख्याएं मिलती हैं।

एक प्रचलित व्याख्या यह है कि जब 1950 के दशक में यह पौधा भारत में तेजी से दिखाई देने लगा, उस समय देश में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सरकार थी और अमेरिका से खाद्यान्न आयात भी सरकारी व्यवस्था के अंतर्गत हुआ था। इसलिए आम बोलचाल में इस विदेशी खरपतवार को ‘कांग्रेस घास’ कहा जाने लगा—अर्थात कांग्रेस के शासनकाल में आई घास। कुछ भारतीय स्रोत इसी व्याख्या को प्रस्तुत करते हैं।

दूसरी व्याख्या इससे अलग है। वैज्ञानिक साहित्य में उल्लेख मिलता है कि इसके छोटे-छोटे सफेद फूलों की तुलना उस समय कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा पहनी जाने वाली सफेद गांधी टोपी से की गई, इसलिए इसे ‘कांग्रेस घास’ कहा गया। एक अन्य व्याख्या इसे अमेरिका से आए उस खाद्यान्न कार्यक्रम से जोड़ती है, जिसमें अमेरिकी कांग्रेस की भूमिका थी।

अर्थात ‘कांग्रेस घास’ नाम को लेकर लोकप्रचलित व्याख्याएं हैं, लेकिन किसी एक कारण को अंतिम और निर्विवाद ऐतिहासिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। इतना अवश्य है कि ‘कांग्रेस वीड ’ और ‘कांग्रेस घास ’ इसके अंतरराष्ट्रीय प्रचलित नामों में शामिल हो चुके हैं।

सफेद फूलों के पीछे छिपा खतरा:

कांग्रेस घास देखने में भले ही सामान्य हो, लेकिन इसका प्रभाव गंभीर हो सकता है। इसके संपर्क और परागकण कुछ संवेदनशील व्यक्तियों में त्वचा संबंधी एलर्जी, डर्मेटाइटिस तथा श्वसन संबंधी समस्याएं पैदा कर सकते हैं। कृषि क्षेत्र में यह फसलों के साथ प्रतिस्पर्धा करती है और प्राकृतिक वनस्पतियों तथा जैव-विविधता को प्रभावित कर सकती है।

यह केवल किसान की समस्या नहीं है। यह पर्यावरण, सार्वजनिक स्वास्थ्य और जैव-विविधता से जुड़ा विषय है। इसलिए इसका नियंत्रण भी सामुदायिक सहभागिता के बिना संभव नहीं।

विदेशी मेहमान से राष्ट्रीय समस्या तक:

कांग्रेस घास की कहानी हमें एक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय सबक देती है। वैश्वीकरण केवल वस्तुओं, तकनीक और विचारों का आदान-प्रदान नहीं करता; कभी-कभी अनजाने में जीव-जंतु और वनस्पतियों की प्रजातियां भी एक देश से दूसरे देश तक पहुंच जाती हैं। यदि नई प्रजाति को स्थानीय पर्यावरण में प्राकृतिक नियंत्रण न मिले और उसे अनुकूल परिस्थितियां मिल जाएं तो वह तेजी से फैल सकती है।

कांग्रेस घास इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।

आज आवश्यकता इसे केवल उखाड़ने की नहीं, बल्कि पहचान, रोकथाम, वैज्ञानिक नियंत्रण और जन-जागरूकता की है| भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और उसके संस्थानों द्वारा पार्थेनियम नियंत्रण तथा जागरूकता के लिए वर्षों से अभियान चलाए जा रहे हैं। हाल के वर्षों में भी इसके एकीकृत प्रबंधन पर किसानों को प्रशिक्षित किया जा रहा है।

बरसात के बाद सड़क किनारे दिखाई देने वाला वह छोटा-सा पौधा इसलिए हमें एक बड़ी चेतावनी देता है—प्रकृति में किसी समस्या का आकार छोटा हो सकता है, लेकिन उसका प्रभाव बहुत बड़ा।

कांग्रेस घास भारत में किसी योजना के तहत लाई गई फसल नहीं थी; यह एक अनचाहा यात्री थी। मगर आज यह हमारी भूमि, कृषि और पर्यावरण की वास्तविकता का हिस्सा बन चुकी है। इसलिए इसकी कहानी केवल एक खरपतवार की कहानी नहीं, बल्कि मानवीय गतिविधियों, वैश्विक खाद्य व्यापार और पर्यावरणीय असंतुलन के बीच के संबंध की कहानी भी है।