जनता साथ, संस्थाओं की साख पर सवाल क्यों?

With the public on board, why question the credibility of institutions?

प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

लोकतंत्र की असली ताकत वोट में नहीं, उस भरोसे में है जो वोट के बाद बचा रहता है। नागरिक को यदि अपने वोट, अधिकार और शिकायत के साथ संस्थाओं के निष्पक्ष व्यवहार का भरोसा न रहे, तो लोकतंत्र का आधार कमजोर पड़ता है। इंडिया टुडे-सीवोटर के अगस्त 2026 के ‘मूड ऑफ द नेशन’ सर्वेक्षण का सबसे गंभीर संकेत संस्थाओं पर बढ़ता अविश्वास है। जनवरी 2026 में 46 प्रतिशत लोग लोकतंत्र को सुरक्षित (खतरे में नहीं) मानते थे; अब 46.7 प्रतिशत इसे खतरे में मानते हैं (जबकि 41.6 प्रतिशत अभी भी सुरक्षित मानते हैं)। चुनावों को स्वतंत्र और निष्पक्ष मानने वालों की संख्या अगस्त 2025 के 64.4 प्रतिशत से घटकर 51.9 प्रतिशत रह गई, जबकि ऐसा न मानने वालों की संख्या 31.7 से बढ़कर 40.9 प्रतिशत हो गई। ये आंकड़े किसी दल के खिलाफ फैसला नहीं, लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर उठता सवाल हैं।

यहीं सर्वेक्षण का सबसे बड़ा विरोधाभास सामने आता है—मुद्दों पर सहमति है, मगर उन्हें लागू करने वाली प्रक्रिया पर भरोसा कमजोर है। समान नागरिक संहिता, एक साथ चुनाव और अवैध प्रवासन के खिलाफ कार्रवाई को पर्याप्त समर्थन मिल रहा है, लेकिन संस्थाओं के कामकाज पर नागरिक पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं। यानी बदलाव की मांग है, पर बदलाव की प्रक्रिया संदेह के घेरे में है। नीति से असहमति लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है; चिंता तब बढ़ती है जब नियम बनाने और लागू करने वाली संस्थाओं की निष्पक्षता पर ही सवाल उठने लगें। तब विवाद किसी नीति तक सीमित नहीं रहता—व्यवस्था की विश्वसनीयता कटघरे में आ जाती है। सहमति बनी हुई है, लेकिन उसके नीचे अविश्वास गहराता जा रहा है।

जब युवा परीक्षा की निष्पक्षता पर भरोसा खोता है, तो उसकी चोट सीधे व्यवस्था की विश्वसनीयता पर पड़ती है। उनके लिए संस्था का अर्थ परीक्षा केंद्र, भर्ती बोर्ड और नौकरी का रास्ता है। नीट पेपर लीक के खिलाफ जंतर-मंतर का आंदोलन शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग तक पहुंचा। झारखंड और बिहार में भर्ती परीक्षाओं को लेकर भी युवाओं का असंतोष सामने आया। सवाल साफ है—जब योग्यता की परीक्षा ही निष्पक्ष न हो, तो मेहनत पर भरोसा कैसे रहे? सर्वेक्षण में 67 प्रतिशत लोगों ने प्रवेश और सरकारी भर्ती परीक्षाओं की निष्पक्षता पर कम या बिल्कुल भरोसा नहीं जताया। परीक्षा व्यवस्था आगे बढ़ने का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक रास्ता है; उसके संदिग्ध होते ही सवाल अभ्यर्थी के भविष्य से आगे व्यवस्था की वैधता तक पहुंचता है। गरीब और छोटे शहर का युवा पूछ रहा है—क्या बिना सिफारिश, पैसे और प्रभाव के भी मेरे लिए दरवाजा खुला है?

चुनाव की निष्पक्षता पर भरोसा घटे, तो चुनाव कराने वाली संस्था भी सवालों से बच नहीं सकती। सर्वेक्षण में 43.3 प्रतिशत लोगों ने कहा कि पिछले एक साल में चुनाव आयोग पर उनका भरोसा बढ़ा, जबकि 38 प्रतिशत ने भरोसा घटने की बात कही। विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को 60 प्रतिशत समर्थन मिला और 76 प्रतिशत ने अवैध प्रवासन को खतरा माना। इसके बावजूद चुनावों की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर भरोसा कम हुआ है। नागरिक मतदाता सूची से फर्जी और दोहरी प्रविष्टियां हटाने तथा चुनावी व्यवस्था मजबूत करने के पक्ष में है, लेकिन प्रक्रिया में पारदर्शिता, स्पष्ट नियम और सबके लिए समान पैमाने की भी अपेक्षा करता है। संस्था का फैसला ही नहीं, फैसले तक पहुंचने की प्रक्रिया भी भरोसे की कसौटी है।

अर्थव्यवस्था के आंकड़े चाहे जितनी बड़ी तस्वीर दिखाएं, नागरिक की जेब उसका सबसे सच्चा हिसाब बताती है। सर्वेक्षण में 23 प्रतिशत लोगों ने बेरोजगारी को सरकार की सबसे बड़ी असफलता माना; 15.9 प्रतिशत ने महंगाई और 13.9 प्रतिशत ने आर्थिक वृद्धि को। करीब आधे (लगभग 47 प्रतिशत) लोग सरकार के आर्थिक प्रबंधन को औसत, खराब या बहुत खराब मानते हैं। महंगाई, असमानता और बढ़ते रोजमर्रा के खर्च ने परिवारों पर कर्ज का दबाव बढ़ाया है। यहीं सरकारी आंकड़े और नागरिक अनुभव अलग दिखाई देते हैं। जब विकास के आंकड़े बढ़ें, लेकिन नौकरी और घरेलू बजट राहत न दें, तो सवाल सिर्फ आर्थिक नीति पर नहीं, उन संस्थाओं पर भी उठता है जो ये फैसले लेती हैं।

भ्रष्टाचार का सवाल उठे तो निशाना केवल व्यवस्था पर नहीं, उसके भरोसे पर लगता है। सर्वेक्षण में 43 प्रतिशत लोगों को लगता है कि मौजूदा सरकार में भ्रष्टाचार बढ़ा है। परीक्षा लीक, भर्ती विवाद, प्रशासनिक देरी और संस्थागत फैसलों पर उठते सवाल इस धारणा को मजबूत करते हैं। न्यायपालिका, प्रशासन और चुनाव तंत्र से नागरिकों की अपेक्षाएं बढ़ी हैं; लेकिन फैसला देर से मिले, प्रक्रिया अस्पष्ट हो या जवाबदेही नजर न आए तो संदेह गहराता है। यह फर्क जरूरी है कि किसी संस्था पर आरोप लगना और आरोप सिद्ध होना अलग बातें हैं, फिर भी लगातार उठते आरोप सार्वजनिक भरोसे को कमजोर करते हैं। संस्थाओं की विश्वसनीयता केवल सही निर्णय से नहीं बनती; निर्णय की पारदर्शिता, प्रक्रिया की स्पष्टता और जवाबदेही ही उसे टिकाऊ बनाती है।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी दरार तब पड़ती है, जब नागरिक सवाल पूछे, लेकिन जवाब पर भरोसा न करे। इसे लोकतंत्र का पतन कहना जल्दबाजी होगी, पर इस चेतावनी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। राजनीतिक सहमति कायम है और प्रधानमंत्री की लोकप्रियता ऊंची है, फिर भी लोकतंत्र की कसौटी लोकप्रियता नहीं, संस्थाओं पर नागरिक का भरोसा है। क्या चुनाव निष्पक्ष हैं? क्या युवा अपनी मेहनत का उचित परिणाम पा सकता है? क्या आम नागरिक को प्रशासन और न्यायपालिका से समय पर न्याय मिलता है? लोकतंत्र बहुमत की ताकत नहीं, हर नागरिक को निष्पक्ष व्यवस्था का भरोसा है। इसलिए परीक्षा में पारदर्शिता, चुनाव में स्पष्टता, प्रशासन में जवाबदेही, न्याय में तेजी और भ्रष्टाचार के आरोपों की निष्पक्ष जांच जरूरी है। आंकड़े, सरकारें और मुद्दे बदलेंगे, लेकिन नागरिक का सवाल वही रहेगा—क्या व्यवस्था मेरे साथ निष्पक्ष है? इसी जवाब में लोकतंत्र की असली ताकत है।