जर्मनी में कट्टरपंथी एएफडी की छोटी जीत के बड़े मायने

The significant implications of the hardline AfD's small victory in Germany

संजय सक्सेना

आजकल जर्मनी में अल्टरनेटिव फॉर डॉयचलैंड (एएफडी) की एक छोटी-सी जीत की बड़ी चर्चा हो रही है। एएफडी की छोटी-सी जीत से पूरे यूरोप और खासकर इस्लामी जगत में बेचैनी नजर आ रही है। यह जर्मनी की एक ऐसी धुर दक्षिणपंथी राजनीतिक पार्टी है, जिसने हाल के वर्षों में जर्मन राजनीति में भूचाल ला दिया है। 2013 में स्थापित हुई इस पार्टी ने प्रवासियों के विरोध, यूरोपीय संघ (ईयू) के प्रति अविश्वास और जर्मन राष्ट्रवाद के दम पर देश के चुनावी परिदृश्य को बदलकर रख दिया है। अल्टरनेटिव फॉर डॉयचलैंड की स्थापना 6 फरवरी 2013 को हुई थी। शुरुआत में, इस पार्टी का गठन अर्थशास्त्रियों और बुद्धिजीवियों द्वारा किया गया था, जो मुख्य रूप से यूरोपीय संघ की आर्थिक नीतियों, विशेष रूप से यूरो क्षेत्र के आर्थिक सहायता पैकेज के खिलाफ थे। हालांकि, 2015 के यूरोपीय शरणार्थी संकट के दौरान पार्टी की विचारधारा में एक बड़ा बदलाव आया। पार्टी ने अपना रुख पूरी तरह से धुर दक्षिणपंथी और लोकलुभावन बना लिया। इस विचारधारा के तहत पार्टी का सबसे प्रमुख एजेंडा देश में शरणार्थियों और प्रवासियों के आने पर पूर्ण विराम लगाना है। पार्टी अवैध शरणार्थियों को तेजी से निर्वासित करने की वकालत करती है। उनका मानना है कि प्रवासियों के आने से जर्मनी की पारंपरिक और सांस्कृतिक पहचान खतरे में है। वे स्कूलों में राष्ट्रीय ध्वज फहराने और राष्ट्रगान गाने जैसी नीतियों को बढ़ावा देते हैं। इसके साथ ही पार्टी खुले तौर पर जर्मनी में बढ़ते इस्लामीकरण और बहुसंस्कृतिवाद का विरोध करती है। जर्मनी की खुफिया एजेंसी की रिपोर्टों के अनुसार, इसके नेताओं द्वारा कई बार जनविरोधी और नस्लवादी बयान दिए गए हैं। पार्टी यूरोपीय संघ की मौजूदा व्यवस्था में बड़े बदलाव या उससे पूरी तरह बाहर निकलने की बात भी करती है।

धार्मिक रुख की बात करें तो आधिकारिक तौर पर एएफडी स्वयं को ईसाई-यहूदी संस्कृति और पश्चिमी सभ्यता का रक्षक मानती है। पार्टी का राजनीतिक दर्शन पारंपरिक यूरोपीय ईसाई मूल्यों पर आधारित है। पार्टी पारंपरिक पारिवारिक संरचनाओं, जैसे एक पुरुष और एक महिला का विवाह, और रूढ़िवादी ईसाई सामाजिक मूल्यों का पुरजोर समर्थन करती है। वे प्रगतिशील या आधुनिक उदारवादी विचारों, जैसे स्कूलों में इंद्रधनुषी झंडे लगाने, का विरोध करते हैं। इसके विपरीत, पार्टी का रुख इस्लाम के प्रति बेहद सख्त है। पार्टी का स्पष्ट मानना है कि इस्लाम जर्मनी का हिस्सा नहीं है और वे मस्जिदों के मीनारों तथा अजान के सार्वजनिक लाउडस्पीकरों पर प्रतिबंध लगाने की मांग करते रहे हैं। हालांकि पार्टी ईसाई धर्म की रक्षक बनती है, लेकिन जर्मनी के मुख्यधारा के चर्च, जिनमें कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट दोनों शामिल हैं, अक्सर एएफडी की नस्लवादी और विभाजनकारी नीतियों की सार्वजनिक रूप से निंदा करते हैं। इसके बावजूद, देश के पारंपरिक ईसाई और रूढ़िवादी मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग इस पार्टी की तरफ आकर्षित हुआ है।जर्मनी की पारंपरिक राजनीतिक व्यवस्था के विपरीत एएफडी में कोई एक अकेला सर्वोच्च नेता नहीं है। यह पार्टी सह-नेतृत्व के मॉडल पर चलती है। वर्तमान में ऐलिस विडेल पार्टी की सबसे प्रमुख और प्रभावशाली चेहरा हैं। वे संसद में पार्टी की संसदीय समूह की नेता और राष्ट्रीय सह-अध्यक्ष हैं। एक पूर्व निवेश बैंकर होने के नाते, वे पार्टी को एक आधुनिक और आर्थिक रूप से सक्षम छवि देने का प्रयास करती हैं। उनके साथ टिनो क्रुपाल्ला पार्टी के राष्ट्रीय सह-अध्यक्ष के रूप में कार्य करते हैं। क्रुपाल्ला मुख्य रूप से पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं और पूर्वी जर्मनी के कामकाजी वर्ग के बीच मजबूत पकड़ रखते हैं। प्रांतीय स्तर पर उलरिच सीगमंड का नाम बेहद तेजी से उभरा है, जिन्होंने सैक्सनी-अनहाल्ट के चुनावों में पार्टी का नेतृत्व करते हुए ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। इन नेताओं के अलावा ब्योर्न होके थुरिंगिया राज्य में एएफडी के नेता हैं। इन्हें पार्टी के भीतर सबसे कट्टरपंथी और विवादित धड़े का जनक माना जाता है, और जर्मन खुफिया एजेंसियां इन्हें आधिकारिक तौर पर एक दक्षिणपंथी चरमपंथी मानती हैं।

जर्मनी के संघवाद में 16 राज्य हैं, और एएफडी की विस्तारवादी नीति देश के भीतर बेहद आक्रामक रही है। भूतपूर्व पूर्वी जर्मनी के राज्यों जैसे सैक्सनी-अनहाल्ट, थुरिंगिया, सैक्सनी और ब्रांडेनबर्ग में एएफडी इस समय सबसे बड़ी और सबसे शक्तिशाली राजनीतिक शक्ति बनकर उभरी है। सैक्सनी-अनहाल्ट के हालिया चुनावों में पार्टी ने करीब 44 प्रतिशत वोट हासिल कर मुख्यधारा की सभी पार्टियों को पछाड़ दिया है। शुरुआत में पश्चिमी राज्यों के अमीर और उदारवादी मतदाता इस पार्टी से दूर थे, लेकिन हालिया औद्योगिक मंदी, ऊर्जा संकट और बढ़ती महंगाई के कारण पार्टी ने पश्चिमी जर्मनी के राज्यों में भी अपनी पैठ मजबूत की है। वर्तमान में, जर्मनी के 16 में से 15 राज्यों की विधानसभाओं में पार्टी के प्रतिनिधि मौजूद हैं। जर्मनी की राष्ट्रीय संसद में यह मुख्य विपक्षी दलों में से एक है। इसके अलावा, यूरोपीय संसद के चुनावों में भी यह जर्मनी की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, जिससे साबित होता है कि इसका प्रभाव केवल कुछ राज्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश में फैल चुका है।अल्टरनेटिव फॉर डॉयचलैंड यानी एएफडी आज जर्मनी की राजनीति में उस मोड़ पर आ खड़ी हुई है, जहां उसे नजरअंदाज करना नामुमकिन है। जहां इसके समर्थक इसे देश की संस्कृति, सुरक्षा और अर्थव्यवस्था को बचाने वाला एकमात्र विकल्प मानते हैं, वहीं जर्मनी की मुख्यधारा की पार्टियां और खुफिया एजेंसियां इसे देश के लोकतांत्रिक ढांचे और सामाजिक ताने-बाने के लिए एक गंभीर खतरा मानती हैं। जर्मनी की राजनीति में इस पार्टी का उभार आने वाले समय में पूरे यूरोप की दिशा तय करेगा।

जर्मनी को हमेशा से यूरोपीय संघ को एक सूत्र में पिरोकर रखने वाली धुरी माना गया है। यदि जर्मनी के भीतर एएफडी जैसी यूरो-संदेहवादी पार्टी सत्ता में या उसके करीब आती है, तो बर्लिन की घरेलू राजनीति पूरी तरह बिखर जाएगी। इसके परिणामस्वरूप यूरोपीय संघ के केंद्रीय मुख्यालय (ब्रसेल्स) में सामूहिक निर्णय लेना बेहद कठिन हो जाएगा। जलवायु परिवर्तन की नीतियों (हरित समझौते) और वित्तीय सुधारों पर सहमति बनाना लगभग नामुमकिन हो जाएगा, जिससे पूरा यूरोपीय संघ नीतिगत रूप से पंगु हो सकता है।इसके अलावा यूरोप के अन्य देश, जो वर्तमान में प्रवासियों की समस्या से जूझ रहे हैं, अपनी सीमाओं को पूरी तरह सील करने पर मजबूर हो जाएंगे। एएफडी की कट्टर आव्रजन-विरोधी नीतियों को देखते हुए पड़ोसी देश (जैसे ऑस्ट्रिया, पोलैंड, फ्रांस और डेनमार्क) भी अपनी आंतरिक सुरक्षा को कड़ा करेंगे। इससे यूरोपीय संघ के भीतर बिना वीजा या पासपोर्ट के स्वतंत्र रूप से आने-जाने की जो ‘शेंगेन व्यवस्था’ है, वह खतरे में पड़ जाएगी और देशों के बीच आपसी मतभेद और सीमा विवाद बढ़ेंगे।