ललित गर्ग
भारत के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जो अपने समय की सीमाओं को लांघकर आने वाली पीढ़ियों के लिए विचार, आदर्श और प्रेरणा के शाश्वत स्रोत बन जाते हैं। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ऐसे ही महान जननायक थे, जिन्होंने सत्ता के शिखरों पर पहुंचने की अपेक्षा जनसेवा के रास्ते पर चलना पसंद किया। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में विदेशी सत्ता को चुनौती दी और स्वतंत्र भारत में जब सत्ता निरंकुशता, भ्रष्टाचार तथा लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण की ओर बढ़ती दिखाई दी, तब उसके विरुद्ध जनचेतना का शंखनाद किया। उनका जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि राजनीति की वास्तविक शक्ति पद, प्रतिष्ठा और सत्ता में नहीं, बल्कि नैतिक साहस, जनविश्वास और सिद्धांतों के प्रति अटूट प्रतिबद्धता में निहित होती है। आज जब भारतीय राजनीति में सत्ता की आकांक्षा, आरोप-प्रत्यारोप और विरोध के लिए विरोध की प्रवृत्ति दिखाई देती है, तब जयप्रकाश नारायण की जयंती हमें आत्ममंथन का अवसर देती है। उनके विचारों को स्मरण करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें वर्तमान राजनीतिक व्यवहार में उतारना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। जयप्रकाश नारायण की जीवनयात्रा संघर्ष, त्याग और वैचारिक परिवर्तन की विलक्षण गाथा है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्होंने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष किया, जेल की यातनाएं सहीं और हजारीबाग जेल से साहसिक पलायन कर क्रांतिकारी युवाओं के लिए प्रेरणा बने। स्वतंत्रता के बाद उनके सामने सत्ता और पद प्राप्त करने के अनेक अवसर थे, लेकिन उन्होंने सत्ता की राजनीति के बजाय समाज परिवर्तन का मार्ग चुना। समाजवादी विचारधारा से जुड़े रहने के बाद वे विनोबा भावे के भूदान आंदोलन से जुड़े और ग्राम स्वराज, सामाजिक समानता तथा नैतिक पुनर्जागरण के पक्षधर बने। उनका विश्वास था कि केवल सरकार बदलने से समाज की समस्याएं समाप्त नहीं होतीं, बल्कि इसके लिए व्यक्ति, समाज और व्यवस्था के चरित्र में परिवर्तन आवश्यक है।
जयप्रकाश नारायण के व्यक्तित्व का सबसे उज्ज्वल पक्ष उनकी सत्ता-निरपेक्षता थी। वे सत्ता पर अधिकार करने के बजाय सत्ता को जनता के प्रति जवाबदेह बनाना चाहते थे। उनका राजनीतिक दर्शन इस विचार पर आधारित था कि लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव कराना और बहुमत के आधार पर सरकार बना लेना नहीं है। लोकतंत्र की वास्तविक सार्थकता तब है, जब नागरिकों को न्याय मिले, शासन पारदर्शी हो, सत्ता जनहित के प्रति उत्तरदायी रहे और आम आदमी की आवाज का सम्मान किया जाए। वे राजनीति को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं की सीढ़ी नहीं, बल्कि लोककल्याण का माध्यम मानते थे। यही कारण है कि उनके नेतृत्व में सत्ता परिवर्तन का आंदोलन भी केवल सरकार बदलने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने राजनीतिक व्यवस्था की नैतिकता पर व्यापक बहस को जन्म दिया। सन् 1974 में बिहार से आरंभ हुआ उनका संपूर्ण क्रांति आंदोलन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का निर्णायक अध्याय बना। भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी और शिक्षा व्यवस्था की विसंगतियों के विरुद्ध उठी युवाओं की आवाज को उन्होंने व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन का स्वर दिया। 25 जून 1975 को देश में आपातकाल लागू होने के बाद लोकतांत्रिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं पर लगे प्रतिबंधों के विरुद्ध उनका संघर्ष और अधिक प्रासंगिक हो गया। वे स्वयं गिरफ्तार किए गए, लेकिन उनका विचार और लोकतंत्र के प्रति उनकी प्रतिबद्धता जनमानस में जीवित रही। वर्ष 1977 में जनता पार्टी की जीत और केंद्र में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार के गठन में उनकी निर्णायक भूमिका रही। उन्होंने यह सिद्ध किया कि संगठित जनशक्ति और नैतिक नेतृत्व के सामने बड़ी से बड़ी सत्ता को भी चुनौती दी जा सकती है। हालांकि, उनका सपना केवल एक सरकार को हटाना नहीं, बल्कि ऐसी राजनीतिक संस्कृति विकसित करना था, जिसमें सत्ता सेवा का पर्याय बने।
संपूर्ण क्रांति का दर्शन उनकी दूरदर्शिता का सबसे महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। वे राजनीतिक परिवर्तन को व्यापक सामाजिक पुनर्निर्माण से जोड़ते थे। उनकी संपूर्ण क्रांति के सात आयाम थे-राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक और आध्यात्मिक। इनका उद्देश्य केवल शासन की संरचना बदलना नहीं, बल्कि मनुष्य की सोच, व्यवहार और जीवनमूल्यों में परिवर्तन लाना था। वे जानते थे कि भ्रष्टाचार केवल सरकारी कार्यालयों में नहीं पनपता, उसकी जड़ें व्यक्ति की लालचपूर्ण मानसिकता में भी होती हैं। सामाजिक असमानता केवल कानून बनाने से समाप्त नहीं होती, उसके लिए समाज की चेतना में समानता और संवेदनशीलता का विकास भी जरूरी है। इसी तरह शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि विवेकशील, जिम्मेदार और चरित्रवान नागरिक तैयार करना भी है। इस दृष्टि से संपूर्ण क्रांति आज भी एक प्रासंगिक विचार है। इसका पहला संदेश है कि व्यवस्था परिवर्तन की शुरुआत व्यक्ति के आत्मपरिवर्तन से होनी चाहिए। जब तक राजनीतिक नेतृत्व अपने आचरण में ईमानदारी, पारदर्शिता और जवाबदेही नहीं अपनाएगा, तब तक भ्रष्टाचार के विरुद्ध अभियान अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकते। दूसरा संदेश है कि लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष दोनों की भूमिका रचनात्मक होनी चाहिए। सत्ता का दायित्व विकास, सुशासन और जनकल्याण सुनिश्चित करना है, जबकि विपक्ष का कर्तव्य सरकार की गलतियों को उजागर करने के साथ-साथ बेहतर नीतियों और विश्वसनीय विकल्प प्रस्तुत करना भी है। केवल विरोध करना विपक्ष की सक्रियता का प्रमाण नहीं हो सकता। उसे यह बताना होगा कि वह देश की अर्थव्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कृषि और सामाजिक समरसता के लिए कौन-सी वैकल्पिक रूपरेखा प्रस्तुत करता है।
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अपनी भूमिका को केवल सत्ता प्राप्त करने की आकांक्षा तक सीमित न रखे। यदि विपक्ष का समूचा विमर्श आरोपों, व्यक्तिगत आक्षेपों और राजनीतिक विरोध तक सिमट जाता है, तो वह जनता के विश्वास को मजबूत करने के बजाय कमजोर करता है। लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन की संभावना जितनी आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है कि जनता के सामने विश्वसनीय विकल्प भी मौजूद हो। जयप्रकाश नारायण ने तत्कालीन सत्ता को चुनौती इसलिए दी थी कि उन्हें व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता महसूस हुई थी। उनके आंदोलन के केंद्र में भ्रष्टाचार, नागरिक अधिकार, लोकतांत्रिक मर्यादा और जनहित के प्रश्न थे। आज उनके नाम और नारों का उपयोग करने वाले राजनीतिक दलों को भी अपने आचरण की कसौटी इन्हीं मूल्यों को बनाना चाहिए। यह अपेक्षा केवल विपक्ष से नहीं, सत्तारूढ़ दलों और समूचे राजनीतिक वर्ग से है। लोकनायक का एक और महत्त्वपूर्ण संदेश सत्ता के विकेंद्रीकरण और जनभागीदारी से संबंधित है। वे चाहते थे कि लोकतंत्र केवल संसद और विधानसभाओं तक सीमित न रहे, बल्कि ग्रामसभाओं, स्थानीय संस्थाओं और सामान्य नागरिकों के जीवन में भी उसकी सक्रिय उपस्थिति हो। आज जब तकनीक, संचार और प्रशासनिक संसाधनों का विस्तार हुआ है, तब जनता की भागीदारी बढ़ाने की संभावनाएं पहले से अधिक हैं। युवाओं को केवल चुनावी भीड़ या राजनीतिक नारों का हिस्सा बनाने के बजाय नीति निर्माण, सामाजिक सुधार और राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रियाओं से जोड़ना चाहिए। यही संपूर्ण क्रांति की भावना को व्यवहार में उतारना होगा।
जयप्रकाश नारायण के आदर्शों से मेरा पारिवारिक संबंध भी रहा है। मैंने उन्हें प्रत्यक्ष रूप से नहीं देखा, लेकिन मेरे पिता स्व. श्री रामस्वरूपजी गर्ग उनके अनन्य भक्त थे और राजस्थान में जेपी आंदोलन के प्रमुख कार्यकर्ताओं में अग्रणी स्थान रखते थे। माताजी सत्यभामाजी गर्ग राजस्थान की यात्रा के दौरान उनकी खाने-पीने आदि की व्यवस्थाओं को देखती थी। उनके जीवन और विचारों में जयप्रकाश नारायण के प्रति समर्पण तथा उनके आदर्शों की गहरी छाप थी। इस पारिवारिक परिवेश ने मुझे यह समझने की प्रेरणा दी कि किसी महान व्यक्तित्व के प्रति सच्ची श्रद्धा उसके विचारों को जीवन में अपनाने से ही प्रकट होती है। मेरे आध्यात्मिक गुरु आचार्य श्री तुलसी की चर्चित पुस्तक ‘अग्निपरीक्षा’ को लेकर जब देश में विरोध का वातावरण बना, तब जयप्रकाश नारायण ने संवाद और सद्भाव की दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके हस्तक्षेप और आह्वान से तनाव कम करने तथा शांति स्थापित करने में सहायता मिली। यह प्रसंग उनके व्यक्तित्व के उस पक्ष को सामने लाता है, जिसमें वैचारिक मतभेदों के बीच भी संवाद, सहिष्णुता और सामाजिक सौहार्द को सर्वोच्च महत्त्व दिया जाता था। जयप्रकाश नारायण की जयंती पर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम संपूर्ण क्रांति को इतिहास के एक आंदोलन के बजाय वर्तमान भारत के पुनर्निर्माण का संकल्प बनाएं। आज देश को ऐसी राजनीतिक संस्कृति की आवश्यकता है, जिसमें सत्ता के प्रति जवाबदेही हो, विपक्ष के पास स्पष्ट वैकल्पिक दृष्टि हो, युवाओं में रचनात्मक ऊर्जा हो और सार्वजनिक जीवन में नैतिकता का सम्मान हो।





