ठेका नौकरी : रोजगार की सीढ़ी या असुरक्षा की सुरंग?

Contract job: Ladder of employment or tunnel of insecurity?

सत्य भूषण शर्मा

रोजगार किसी भी व्यक्ति के लिए केवल मासिक वेतन पाने का माध्यम नहीं होता। उसके साथ परिवार का भविष्य, बच्चों की शिक्षा, घर का सपना, सामाजिक सम्मान और बुढ़ापे की सुरक्षा जुड़ी होती है। इसलिए जब किसी युवा को नौकरी मिलती है तो उसके चेहरे पर केवल वेतन की खुशी नहीं, बल्कि भविष्य के सुरक्षित होने का विश्वास भी दिखाई देता है। लेकिन ठेका नौकरी ने रोजगार की इसी पारंपरिक अवधारणा के सामने एक बड़ा प्रश्न खड़ा कर दिया है—क्या काम मिल जाना ही पर्याप्त है, या काम के साथ भविष्य की सुरक्षा भी आवश्यक है?

बेरोजगारी से जूझते युवा के लिए ठेका नौकरी निश्चित रूप से एक अवसर है। वह घर बैठने के बजाय अपनी योग्यता और श्रम का उपयोग कर सकता है। उसे आय प्राप्त होती है और कार्यानुभव मिलता है। अनेक संस्थानों और उद्योगों के लिए भी ठेका व्यवस्था बदलती आवश्यकताओं के अनुरूप मानव संसाधन उपलब्ध कराने का व्यावहारिक माध्यम है। समस्या व्यवस्था के अस्तित्व में नहीं, बल्कि तब पैदा होती है जब ठेका व्यवस्था स्थायी जरूरतों को अस्थायी कर्मचारियों से पूरा करने का स्थायी तरीका बन जाती है।

कल्पना कीजिए उस कर्मचारी की, जो वर्षों से किसी संस्था में पूरी निष्ठा से काम कर रहा है। उसकी उपस्थिति नियमित है, जिम्मेदारियां निश्चित हैं और काम भी स्थायी प्रकृति का है। वह संस्था के नियमों का पालन करता है, लक्ष्य पूरे करता है और अपने वरिष्ठों के निर्देशों के अनुसार कार्य करता है। फिर भी उसके हाथ में भविष्य की कोई ठोस गारंटी नहीं होती। अनुबंध की अवधि समाप्त होने का भय उसके सिर पर लगातार मंडराता रहता है।

सबसे बड़ी विडंबना यही है कि कर्मचारी का काम स्थायी हो सकता है, लेकिन उसकी नौकरी स्थायी नहीं होती।

यही स्थिति ठेका कर्मचारी के मानसिक संसार को प्रभावित करती है। वह भविष्य की योजना बनाने से पहले कई बार यह सोचता है कि अगले वर्ष उसका रोजगार रहेगा भी या नहीं। मकान का ऋण, बच्चों की फीस, परिवार का चिकित्सा खर्च, विवाह और वृद्धावस्था की तैयारी—हर निर्णय के पीछे नौकरी की अनिश्चितता खड़ी रहती है।

युवा पीढ़ी के सामने यह समस्या और गंभीर है। वर्षों की शिक्षा के बाद जब स्थायी सरकारी या संगठित क्षेत्र की नौकरी नहीं मिलती, तो ठेका रोजगार तत्काल राहत देता है। लेकिन धीरे-धीरे यही राहत मजबूरी में बदल सकती है। कर्मचारी अनुभव प्राप्त करता रहता है, उम्र बढ़ती रहती है और स्थायित्व की संभावना दूर होती जाती है। कई बार वह एक ऐसी स्थिति में पहुंच जाता है जहां न वह नई शुरुआत करने की उम्र में रहता है और न ही वर्तमान रोजगार को सुरक्षित मान सकता है।

क्या यह रोजगार है या रोजगार की प्रतीक्षा का लंबा पड़ाव?

इस प्रश्न का उत्तर आसान नहीं है। आधुनिक अर्थव्यवस्था में हर संस्था को कुछ स्तर तक लचीलापन चाहिए। परियोजना आधारित कार्य, मौसमी आवश्यकताएं, तकनीकी सेवाएं और अल्पकालिक विशेषज्ञता के लिए अनुबंध आधारित नियुक्तियां उपयोगी हो सकती हैं। लेकिन यदि किसी संस्था को वर्षों तक लगातार उसी पद पर कर्मचारी की आवश्यकता है, तो केवल नियुक्ति के स्वरूप के आधार पर उसकी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा को अनिश्चित बनाए रखना गंभीर विचार का विषय है।

यहां सरकार, नियोक्ता और समाज—तीनों की जिम्मेदारी सामने आती है।

सरकार को ऐसी स्पष्ट और प्रभावी श्रम नीतियां बनानी चाहिए जिनमें ठेका कर्मचारियों के अधिकारों की पर्याप्त सुरक्षा हो। समान प्रकृति के कार्य के लिए उचित एवं न्यायसंगत पारिश्रमिक, समय पर वेतन, सुरक्षित कार्यस्थल, सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधा और पारदर्शी सेवा-शर्तें सुनिश्चित की जानी चाहिए। लंबे समय तक लगातार सेवा देने वाले कर्मचारियों के लिए अनुभव और योग्यता आधारित स्थायित्व अथवा प्राथमिकता की व्यवस्था पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए।

नियोक्ताओं को भी यह समझना होगा कि कर्मचारी केवल ‘मानव संसाधन’ नहीं, बल्कि संस्था की सफलता का जीवंत आधार है। किसी कर्मचारी को असुरक्षा में रखकर उससे दीर्घकालिक समर्पण की अपेक्षा करना मानवीय दृष्टि से उचित नहीं है। कर्मचारी को सम्मान देने से संस्था की उत्पादकता घटती नहीं, बल्कि विश्वास बढ़ता है।

ठेका कर्मचारियों के लिए एक और बड़ी चुनौती सामाजिक सुरक्षा की है। आज का युवा केवल आज का वेतन नहीं चाहता; वह भविष्य का भरोसा भी चाहता है। उसे पता होना चाहिए कि बीमारी, दुर्घटना, बेरोजगारी या वृद्धावस्था की स्थिति में उसके और उसके परिवार के लिए कोई सुरक्षा कवच मौजूद है।

हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि हर ठेका कर्मचारी स्थायी नौकरी की मांग नहीं कर रहा। बहुत से लोग अनुबंध आधारित कार्य को अपनी पसंद से चुनते हैं। उनकी स्वतंत्रता और रोजगार के विकल्प भी सुरक्षित रहने चाहिए। इसलिए समाधान ठेका व्यवस्था को समाप्त करना नहीं, बल्कि उसे न्यायपूर्ण, पारदर्शी और मानवीय बनाना है।

रोजगार नीति का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कितने लोगों को नौकरी मिली। यह भी देखा जाना चाहिए कि उन नौकरियों से कितने परिवारों को स्थिरता, सम्मान और भविष्य का विश्वास मिला।

देश की अर्थव्यवस्था तब मजबूत होगी जब उसके श्रमिक और कर्मचारी भी आर्थिक रूप से मजबूत होंगे। विकास की ऊंची इमारत उन हाथों पर खड़ी होती है जो अक्सर उसके आंकड़ों में दिखाई नहीं देते।

आज जरूरत है कि ठेका कर्मचारी को ‘अस्थायी आदमी’ समझने की मानसिकता बदली जाए। वह भी उसी संस्था के विकास में अपना समय, श्रम और प्रतिभा लगा रहा है। उसके सपने भी उतने ही वास्तविक हैं, उसके परिवार की जरूरतें भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं और उसके भविष्य की चिंता भी उतनी ही गंभीर है।

रोजगार का अर्थ केवल महीने के अंत में वेतन मिलना नहीं है। रोजगार का वास्तविक अर्थ है—आज काम, कल का विश्वास और आने वाले कल की सुरक्षा।

यदि ठेका नौकरी युवाओं को अवसर देती है तो उसे रोजगार की सीढ़ी बनाया जाए; लेकिन यदि वही व्यवस्था उन्हें वर्षों तक असुरक्षा की सुरंग में धकेलती रहे, तो नीति-निर्माताओं को ठहरकर सोचना ही होगा।

किसी राष्ट्र की प्रगति का सबसे सुंदर प्रमाण उसकी ऊंची इमारतें या बड़े आर्थिक आंकड़े नहीं, बल्कि वह विश्वास है जिसके साथ उसका सामान्य कर्मचारी अपने घर लौटकर अपने बच्चों से कह सके—“तुम्हारा भविष्य सुरक्षित है।”

यही विश्वास भारत के श्रम संसार की अगली बड़ी आवश्यकता है।