तार-तार होती मर्यादा: परिसरों में असुरक्षा का संकट

Dignity Shattered: The Crisis of Insecurity on Campuses

अशोक भाटिया

आज देश के सामने सबसे बड़ा और अनुत्तरित सवाल यह है कि शिक्षा के जिन परिसरों को हम ‘ज्ञान का मंदिर’ और सुरक्षित भविष्य की पौधशाला मानते थे, वे अचानक भय, असुरक्षा और मानसिक संताप के केंद्र कैसे बनते जा रहे हैं? देश की राजधानी दिल्ली की चकाचौंध हो या बिहार के ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों के स्कूल व कॉलेज—हर तरफ से छात्राओं के साथ छेड़छाड़, मानसिक उत्पीड़न और यौन शोषण की खबरें लगातार सुर्खियां बन रही हैं। यह केवल कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं है, बल्कि यह हमारे सामाजिक मूल्यों के पतन, प्रशासनिक संवेदनहीनता और पूरी शैक्षणिक व्यवस्था की नैतिक कंगाली का एक भयावह प्रमाण है। जब देश की बेटियों की मर्यादा देश के सबसे प्रतिष्ठित परिसरों में तार-तार होने लगे, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि राष्ट्र के रूप में हम कहीं बहुत बड़ी भूल कर रहे हैं।

अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि महानगरों की संस्कृति और ग्रामीण अंचलों की व्यवस्था में बड़ा अंतर होता है। लेकिन जब बात छात्राओं के खिलाफ होने वाले अपराधों की आती है, तो दिल्ली और बिहार की घटनाओं में एक डरावनी समानता दिखाई देती है। दिल्ली जैसे महानगरों में, जहाँ देश के सबसे महंगे और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय मौजूद हैं, वहाँ भी छात्राएं सुरक्षित नहीं हैं। यहाँ फेस्ट के दौरान बाहरी तत्वों द्वारा कैंपस में घुसकर छात्राओं के साथ बदसलूकी करना, मेट्रो या बसों में आते-जाते समय फब्तियां कसना और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के जरिए स्टॉकिंग आम बात हो चुकी है। तकनीकी रूप से उन्नत होने के बावजूद यहाँ का माहौल महिलाओं के लिए पूरी तरह अनुकूल नहीं बन पाया है। दूसरी ओर, बिहार के कई जिलों से आने वाली खबरें स्थिति के एक अलग और अधिक संवेदनशील पहलू को उजागर करती हैं। यहाँ बुनियादी ढांचे की भारी कमी है और कई स्कूलों में छात्राओं के लिए अलग व सुरक्षित शौचालय तक नहीं हैं। सुदूर इलाकों से स्कूल-कॉलेज आने वाली छात्राओं को रास्तों में मनचलों के आतंक का सामना करना पड़ता है। यहाँ सामाजिक लोकलाज और जागरूकता की कमी के कारण बहुत से मामले पुलिस स्टेशन तक पहुँच ही नहीं पाते। यह विरोधाभास दर्शाता है कि समस्या किसी क्षेत्र विशेष की नहीं, बल्कि उस पुरुषवादी और विकृत मानसिकता की है जो महिलाओं को एक स्वतंत्र नागरिक या छात्रा के रूप में देखने के बजाय केवल उपभोग या उत्पीड़न की वस्तु समझती है।

इन घटनाओं के लगातार सामने आने का सबसे बड़ा कारण शैक्षणिक संस्थानों के प्रशासन की आपराधिक लापरवाही है। किसी भी संस्थान की पहली जिम्मेदारी अपने परिसर के भीतर प्रत्येक छात्र को एक सुरक्षित और भयमुक्त वातावरण प्रदान करना है। परंतु वर्तमान परिदृश्य में संस्थागत विफलता के कई स्तर देखने को मिलते हैं। सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों और विशाखा गाइडलाइंस के बाद हर संस्थान में आंतरिक शिकायत समिति का गठन अनिवार्य किया गया था। बच्चों के मामलों के लिए पोक्सो कानून के तहत कड़े प्रावधान हैं। लेकिन हकीकत यह है कि अधिकांश स्कूलों और कॉलेजों में ये समितियां केवल कागजों पर चल रही हैं। छात्राओं को यह तक मालूम नहीं होता कि यदि उनके साथ कोई अभद्रता हुई है, तो उन्हें कहाँ और किससे शिकायत करनी है। जब कोई छात्रा अपनी शिकायत लेकर प्रबंधन के पास जाती है, तो पहली कोशिश मामले को रफा-दफा करने की होती है। प्रशासन को पीड़ित की सुरक्षा या न्याय से ज्यादा चिंता संस्थान की प्रतिष्ठा की होती है। छात्राओं को यह कहकर चुप रहने की सलाह दी जाती है कि “बात बढ़ेगी तो तुम्हारा ही करियर खराब होगा।” यह रवैया अपराधियों के हौसलों को सातवें आसमान पर पहुँचा देता है। जब तक स्कूल के प्रधानाचार्यों, कॉलेज के कुलपतियों और वार्डनों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक सुरक्षा व्यवस्था को गंभीरता से नहीं लिया जाएगा।

सुरक्षा केवल कड़े कानूनों से नहीं आती, उसके लिए जमीन पर एक ठोस और प्रभावी बुनियादी ढांचा भी जरूरी होता है। देश के अधिकांश शैक्षणिक परिसरों का अगर आज सुरक्षा ऑडिट किया जाए, तो चौंकाने वाली कमियाँ सामने आएंगी। परिसरों के कई हिस्से, जैसे लाइब्रेरी के पीछे का इलाका, खेल के मैदान के कोने या हॉस्टल की तरफ जाने वाले रास्ते, पर्याप्त रोशनी से महरूम रहते हैं। सीसीटीवी कैमरों की संख्या या तो बहुत कम होती है या जो कैमरे लगे होते हैं, वे खराब पड़े रहते हैं। स्कूलों और कॉलेजों में सुरक्षा के नाम पर निजी एजेंसियों से बेहद कम वेतन पर गार्ड रख लिए जाते हैं। इन गार्डों को न तो भीड़ नियंत्रण का कोई प्रशिक्षण होता है और न ही वे लैंगिक संवेदनशीलता से वाकिफ होते हैं। इसके अतिरिक्त दिल्ली के कॉलेजों के फेस्ट हो या बिहार के ग्रामीण इलाकों के स्कूल, बाहरी असामाजिक तत्वों का परिसरों में प्रवेश बेहद आसान होता है। पहचान पत्रों की सघन चेकिंग न होना और बाउंड्री वॉल का टूटा-फूटा होना इन अपराधियों को खुला आमंत्रण देता है।

इस संकट की जड़ें हमारे समाज के उस दोहरे मापदंड में भी धंसी हुई हैं, जो हमेशा अपराधी के बजाय पीड़ित को ही कटघरे में खड़ा कर देता है। जब भी किसी छात्रा के साथ छेड़छाड़ या उत्पीड़न की घटना होती है, तो समाज का एक बड़ा हिस्सा तुरंत यह पूछने लगता है कि वह इतनी देर रात बाहर क्या कर रही थी, उसने किस तरह के कपड़े पहने थे, या वह उस लड़के से बात ही क्यों कर रही थी। यह ‘विक्टिम ब्लेमिंग’ की संस्कृति पीड़ित को दोबारा मानसिक रूप से प्रताड़ित करती है। इसका परिणाम यह होता है कि समाज के डर से पीड़ित लड़कियां और उनके परिवार चुप रह जाते हैं। जब समाज अपराधियों का सामाजिक बहिष्कार करने के बजाय पीड़ित परिवार पर ही उंगलियां उठाने लगे, तो मर्यादा का तार-तार होना स्वाभाविक है। बिहार और उत्तर भारत के कई ग्रामीण इलाकों में तो स्थिति इतनी बदतर हो जाती है कि छेड़छाड़ की घटना के बाद लड़कियों की पढ़ाई ही छुड़वा दी जाती है। यह अपराधियों को सजा देने के बजाय पीड़ित को सजा देने जैसा है। इंटरनेट और स्मार्टफोन के इस युग में छात्राओं को एक नए खतरे का सामना करना पड़ रहा है जिसे हम साइबर उत्पीड़न कहते हैं। वॉट्सऐप, इंस्टाग्राम और फेसबुक के जरिए छात्राओं की तस्वीरों से छेड़छाड़ करना या फर्जी प्रोफाइल बनाकर अश्लील बातें लिखना अब आम हो गया है। तकनीक ने इस खतरे को सौ गुना बढ़ा दिया है, जबकि स्कूलों के पास इसे संभालने की कोई नीति या विशेषज्ञता नहीं है।

यदि हम वास्तव में अपनी आने वाली पीढ़ी को एक सुरक्षित और गरिमापूर्ण भविष्य देना चाहते हैं, तो हमें तात्कालिक प्रतिक्रियाओं से आगे बढ़कर एक दीर्घकालिक और बहुआयामी रणनीति अपनानी होगी। कानूनी और प्रशासनिक मोर्चे पर सख्त कदम उठाते हुए छेड़छाड़ या किसी भी तरह के यौन उत्पीड़न की शिकायत मिलने पर २४ घंटे के भीतर प्राथमिकी दर्ज होनी चाहिए। इन मामलों की सुनवाई के लिए फास्ट-ट्रैक अदालतों का प्रभावी उपयोग हो, ताकि दोषियों को हफ्तों या महीनों के भीतर सजा मिले, न कि सालों बाद। यदि कोई स्कूल या कॉलेज प्रशासन शिकायत को दबाने या पीड़ित पर दबाव बनाने की कोशिश करता है, तो उस संस्थान की मान्यता रद्द की जानी चाहिए और संबंधित अधिकारियों पर आपराधिक मुकदमा चलना चाहिए। हर छह महीने में पुलिस और नागरिक समाज के सहयोग से हर स्कूल-कॉलेज का ‘सेफ्टी ऑडिट’ होना अनिवार्य किया जाए। पूरे परिसर को सीसीटीवी की निगरानी में लाया जाए और पर्याप्त रोशनी की व्यवस्था हो।

शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्रियां बांटना या रोजगार के लिए युवाओं को तैयार करना नहीं है। शिक्षा का मूल उद्देश्य एक सभ्य, संवेदनशील और मर्यादित समाज का निर्माण करना है। यदि हमारी बेटियां देश की राजधानी दिल्ली की सड़कों पर या बिहार के ज्ञान-पूरित अंचलों में खुद को असुरक्षित महसूस करती हैं, तो यह मान लेना चाहिए कि हमारी पूरी विकास यात्रा खोखली है। अब समय आ गया है कि सरकारें राजनीतिक नफा-नुकसान से ऊपर उठकर, प्रशासन अपनी सुस्ती को त्यागकर और समाज अपने मौन को तोड़कर इस संकट के खिलाफ एकजुट हो। जब तक हर छात्रा बिना किसी डर के, सिर उठाकर और सुरक्षित माहौल में शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाएगी, तब तक ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे नारे केवल दीवारों पर लिखे स्लोगन मात्र ही बने रहेंगे। मर्यादा की रक्षा किसी एक संस्था का नहीं, बल्कि हम सभी का साझा और परम कर्तव्य है।