दो स्कूलों की कहानी नहीं, दो भारतों की कहानी!

Not a story of two schools, but a story of two Indias!

सी एम जैन

सुबह का समय है। एक माँ अपने बच्चे के टिफिन में फल, जूस और पसंदीदा नाश्ता रख रही है। दूसरी माँ भी उसी समय अपने बच्चे को स्कूल भेजने की तैयारी कर रही है, लेकिन उसकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि घर का राशन महीने के अंत तक चलेगा या नहीं। पहली माँ अपने बच्चे के भविष्य को लेकर सपने देख रही है, दूसरी माँ भी सपने देख रही है। दोनों की आँखों में फर्क नहीं है। दोनों चाहती हैं कि उनका बच्चा उनसे बेहतर जीवन जिए। दोनों चाहती हैं कि उनका बच्चा सम्मान, सुरक्षा और अवसरों से भरा भविष्य पाए। लेकिन शायद यहीं से एक ऐसा अंतर शुरू हो जाता है जिसे बच्चे पैदा नहीं करते, बल्कि समाज उनके लिए तैयार करता है।

हम अक्सर कहते हैं कि हर बच्चा बराबर पैदा होता है। यह बात नैतिक रूप से सही है। संविधान की भावना भी यही कहती है। लेकिन क्या हर बच्चे को जीवन की दौड़ समान स्थान से शुरू करने का अवसर मिलता है? यही वह प्रश्न है जिससे हम अक्सर बच निकलते हैं। क्योंकि इस प्रश्न का उत्तर केवल शिक्षा व्यवस्था पर नहीं, बल्कि पूरे समाज के चरित्र पर सवाल खड़ा करता है। एक बच्चा ऐसे विद्यालय में प्रवेश करता है जहाँ पुस्तकालय केवल एक कमरा नहीं, बल्कि अवसरों की खिड़की है; जहाँ विज्ञान प्रयोगशाला जिज्ञासा को पंख देती है; जहाँ भाषा आत्मविश्वास बन जाती है; जहाँ खेल मैदान नेतृत्व सिखाता है और जहाँ करियर मार्गदर्शन भविष्य की दिशा तय करता है। वहीं दूसरा बच्चा ऐसे विद्यालय में बैठा हो सकता है जहाँ शिक्षक अपनी पूरी निष्ठा से पढ़ा रहे हों, लेकिन संसाधन सीमित हों; जहाँ सपनों की कमी नहीं, लेकिन उन्हें उड़ान देने वाली व्यवस्था कमजोर हो।

यह केवल स्कूलों का अंतर नहीं है। यह अवसरों का अंतर है। और अवसरों का अंतर धीरे-धीरे जीवन के हर क्षेत्र में फैल जाता है। शिक्षा केवल गणित, विज्ञान और भाषा सिखाने का माध्यम नहीं होती; शिक्षा समाज में अवसरों का वितरण भी करती है। एक बच्चा जब बेहतर संसाधनों के बीच बड़ा होता है तो उसके लिए दुनिया का नक्शा बड़ा होता जाता है। उसे यह विश्वास मिलता है कि वह कहीं भी पहुँच सकता है। दूसरा बच्चा कई बार उतनी ही प्रतिभा रखने के बावजूद अपने सपनों की सीमा परिस्थितियों से तय होते हुए देखता है। वह प्रतियोगिता से पहले ही संसाधनों की कमी से लड़ रहा होता है। ऐसे में जब दोनों एक ही परीक्षा कक्ष में बैठते हैं, तो प्रश्न केवल योग्यता का नहीं रह जाता; प्रश्न यह भी बन जाता है कि क्या हमने दोनों को समान तैयारी का अवसर दिया था?

यहाँ चर्चा केवल सरकारी और निजी स्कूलों की नहीं है। देश में अनेक सरकारी विद्यालय उत्कृष्ट कार्य कर रहे हैं और अनेक निजी विद्यालय भी औसत स्तर के हैं। वास्तविक मुद्दा किसी एक व्यवस्था को दोषी ठहराने का नहीं, बल्कि उस बढ़ती हुई खाई को समझने का है जो अवसरों के बीच बनती जा रही है। जब समाज का एक वर्ग ऐसी शिक्षा खरीद सकता है जो उसे अतिरिक्त लाभ देती है, और दूसरा वर्ग केवल उपलब्ध विकल्पों पर निर्भर रहने को मजबूर होता है, तब शिक्षा धीरे-धीरे सामाजिक गतिशीलता का साधन होने के साथ-साथ सामाजिक विभाजन का दर्पण भी बन जाती है। यही वह क्षण है जहाँ एक लोकतंत्र को स्वयं से कठिन प्रश्न पूछने चाहिए।

कल्पना कीजिए कि किसी देश के सबसे प्रभावशाली लोग, नीति निर्माता, अधिकारी, पेशेवर और आर्थिक रूप से सक्षम परिवार बड़ी संख्या में सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था से बाहर चले जाएँ। तब सार्वजनिक विद्यालयों की समस्याएँ किसकी प्राथमिकता बनेंगी? जिन बच्चों की आवाज़ सबसे कम सुनी जाती है, उनकी समस्याएँ भी अक्सर सबसे कम सुनी जाने लगती हैं। धीरे-धीरे सरकारी स्कूल केवल शिक्षा संस्थान नहीं रहते; वे समाज के आर्थिक विभाजन का प्रतीक बन जाते हैं। और जब किसी लोकतंत्र में साझा संस्थाएँ कमजोर होने लगती हैं, तब उसका प्रभाव केवल वर्तमान पर नहीं, भविष्य पर भी पड़ता है।

क्योंकि सरकारी स्कूल केवल गरीबों के स्कूल नहीं होते। वे किसी राष्ट्र की सामूहिक आकांक्षाओं के घर होते हैं। वहीं किसी खेत में काम करने वाले किसान का बेटा बैठा होता है। वहीं किसी निर्माण स्थल पर मजदूरी करने वाली महिला की बेटी बैठी होती है। वहीं वह बच्चा भी बैठा होता है जिसकी प्रतिभा को अभी तक किसी ने पहचाना नहीं। इतिहास बार-बार यह साबित करता है कि प्रतिभा किसी विशेष आय वर्ग, किसी विशेष शहर या किसी विशेष भाषा की जागीर नहीं होती। प्रतिभा झोपड़ी में भी जन्म लेती है और महलों में भी। फर्क अक्सर इस बात से पड़ता है कि उसे अवसर मिला या नहीं।

और शायद यहीं इस पूरे प्रश्न का सबसे मार्मिक पक्ष छिपा है। जब किसी बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिलती, तो केवल उसका भविष्य प्रभावित नहीं होता। उस बच्चे के साथ देश भी कुछ खो देता है। शायद कोई वैज्ञानिक खो जाता है जो किसी बीमारी का इलाज खोज सकता था। शायद कोई शिक्षक खो जाता है जो हजारों बच्चों का जीवन बदल सकता था। शायद कोई लेखक, न्यायाधीश, पत्रकार, इंजीनियर या उद्यमी अवसरों की कमी के कारण अपने पूरे सामर्थ्य तक पहुँच ही नहीं पाता। किसी राष्ट्र की सबसे बड़ी बर्बादी केवल धन की बर्बादी नहीं होती; उसकी सबसे बड़ी बर्बादी वह प्रतिभा होती है जो जन्म तो लेती है, लेकिन विकसित नहीं हो पाती।

यहाँ प्रश्न निजी विद्यालयों के अस्तित्व का नहीं है और न ही किसी एक मॉडल को समाप्त करने का है। प्रश्न इससे कहीं अधिक मूलभूत है। क्या किसी बच्चे की संभावनाएँ उसके जन्म से निर्धारित होंगी या उसकी प्रतिभा से? क्या भविष्य उस परिवार की आय से तय होगा जिसमें वह पैदा हुआ, या उस क्षमता से जो उसके भीतर मौजूद है? किसी भी लोकतंत्र की नैतिक शक्ति इसी प्रश्न के उत्तर में छिपी होती है। क्योंकि लोकतंत्र केवल मतदान की समानता नहीं है; लोकतंत्र अवसरों की समानता की दिशा में निरंतर प्रयास का भी नाम है।

जब हम शिक्षा की बात करते हैं तो हम वास्तव में राष्ट्र के भविष्य की बात कर रहे होते हैं। सड़कें, पुल, इमारतें और उद्योग किसी देश की प्रगति दिखा सकते हैं, लेकिन उसके विद्यालय उसके भविष्य को गढ़ते हैं। कोई भी देश अपनी प्रतिभा के बड़े हिस्से को पीछे छोड़कर महान नहीं बन सकता। और कोई भी समाज तब तक पूरी तरह न्यायपूर्ण नहीं कहलाएगा जब तक किसी बच्चे के सपनों की ऊँचाई उसके माता-पिता की आय से कम और उसकी क्षमता से अधिक निर्धारित होने लगे।

शायद इसलिए शिक्षा का सबसे बड़ा प्रश्न पाठ्यक्रम, परीक्षा या भवनों का नहीं है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हम अपने बच्चों को एक जैसा भविष्य नहीं, तो कम से कम एक जैसा अवसर देने को तैयार हैं? क्योंकि इतिहास अंततः यह याद नहीं रखता कि किसी देश के सबसे महंगे स्कूल कितने भव्य थे। इतिहास यह याद रखता है कि उस देश ने अपने सबसे साधारण बच्चे के साथ कितना न्याय किया था।

और किसी राष्ट्र की वास्तविक महानता उसके सबसे सफल बच्चों से नहीं मापी जाती; वह उसके उन बच्चों से मापी जाती है जिनके पास सफलता तक पहुँचने के लिए केवल प्रतिभा थी—और समाज ने उन्हें अवसर भी दिया।