नेपाल की यह त्रासदी केवल एक देश की विपदा नहीं, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए प्रकृति की गंभीर चेतावनी
गोपेन्द्र नाथ भट्ट
नेपाल इस समय आधुनिक इतिहास की सबसे भीषण प्राकृतिक त्रासदियों में से एक से जूझ रहा है। 26 अगस्त को नेपाल-चीन सीमा के निकट ग्लेशियस (हिमनद) के टूटने और भारी मात्रा में बर्फ, चट्टान तथा मलबा नदियों में आने से अचानक आई अप्रत्याशित बाढ़ ने भोटेकोशी और त्रिशूली नदी घाटियों में विध्वंसक और व्यापक तबाही मचा दी। देखते ही देखते बस्तियां, सड़कें, पुल और महत्वपूर्ण संपर्क मार्ग जल और मलबे की चपेट में आ गए।
त्रासदी की भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 28 अगस्त तक नेपाल और तिब्बत में मृतकों की संख्या 550 से अधिक बताई गई थी, जबकि बड़ी संख्या में लोग अब भी लापता हैं। मौत और लापता लोगों का बढ़ता आंकड़ा इस त्रासदी की भयावहकता के प्रमाण है। नेपाल में अकेले करीब 93 हजार लोगों को तत्काल मानवीय सहायता की जरूरत बताई गई है। हजारों लोग विस्थापित होकर अस्थायी शिविरों में रहने को मजबूर हैं। सबसे बड़ी चुनौती उन लोगों तक पहुंचना है, जिनके गांव और संपर्क मार्ग मलबे में तब्दील हो चुके हैं। नेपाल की सेना, पुलिस और सशस्त्र पुलिस बल के हजारों जवान बचाव अभियान में जुटे हैं। हेलीकॉप्टरों और ड्रोन के माध्यम से दुर्गम इलाकों की निगरानी की जा रही है। अनेक लोगों को सुरक्षित निकालकर अस्पतालों और राहत शिविरों तक पहुंचाया गया है। भारत सरकार की ओर से भी बाढ़ प्रभावित लोगों के लिए नेपाल सरकार को हर संभव सहायता उपलब्ध कराई जा रही हैं।
इस त्रासदी को केवल एक बार आई बाढ़ मानना गंभीर भूल होगी। क्योंकि खतरा अभी टला नहीं है। ग्लेशियस के टूटने के बाद बने मलबे और पानी के अवरोध से नए जलाशय बनने तथा उनके अचानक टूटने का खतरा अभी भी बना हुआ है। पड़ौसी देश चीन की ओर से भी ऐसी चेतावनियाँ दी जा रही है m यही कारण है कि बचाव अभियान के साथ-साथ नदियों के जलस्तर और संभावित नए जलप्रवाह पर लगातार निगरानी रखी जा रही है। राहतकर्मियों के सामने एक ओर मलबे में दबे लोगों को खोजने की चुनौती है, तो दूसरी ओर नए भूस्खलन और बाढ़ का खतरा भी मौजूद है।
आपदा ने नेपाल के परिवहन और आर्थिक ढांचे को भी गहरा झटका दिया है। क्योंकि नेपाल के बाढ़ प्रभावित इलाकों में आधारभूत ढांचा तहस नहस और ढह गया है। कई सड़कें और पुल बह गए हैं। हाइड्रो पावर स्टेशन तबाह हो गए है। चीन के साथ व्यापार और आवागमन का महत्वपूर्ण सीमा संपर्क भी प्रभावित हुआ है। जलविद्युत परियोजनाओं और बिजली व्यवस्था को नुकसान पहुंचने से पुनर्निर्माण की चुनौती और बढ़ गई है। पर्यटन के लिए प्रसिद्ध पूरा हिमालयी क्षेत्र भी इससे प्रभावित हुआ है।
नेपाल की वर्तमान त्रासदी हिमालयी क्षेत्र में तेजी से बदलते पर्यावरण की एक गंभीर चेतावनी भी है। जलवायु परिवर्तन की चेतावनी के चलते बढ़ते तापमान से ग्लेशियरों और ग्लेशियस झीलों पर दबाव बढ़ रहा है। ऐसी परिस्थितियों में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी हिमनद झील के अचानक फटने की घटनाएं भविष्य में अधिक गंभीर खतरा बन सकती हैं। इसलिए इन परिस्थितियों में केवल राहत और पुनर्वास पर्याप्त नहीं होंगे। हिमालयी क्षेत्र में साझा निगरानी, पूर्व चेतावनी प्रणाली, वैज्ञानिक अध्ययन और सीमापार आपदा प्रबंधन को और अधिक मजबूत करना होगा ताकि ऐसी दुखदायी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के पुख्ता उपाय सुनिश्चित किए जा सकें।
नेपाल की इस त्रासदी में पड़ोसी भारत समेत अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी सहायता के लिए आगे आया है। लेकिन फिलहाल सबसे बड़ी प्राथमिकता मलबे में जिंदगी तलाशना, विस्थापितों को भोजन-पानी और चिकित्सा उपलब्ध कराना तथा संभावित दूसरी आपदा से लोगों को बचाना है।नेपाल की यह त्रासदी केवल एक देश की विपदा नहीं, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए प्रकृति की गंभीर चेतावनी है। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन अब विकल्प नहीं, एक अनिवार्यता बन चुका है।





