बंद करो राष्ट्रवाद का प्रमाण पत्र बांटना?

Stop distributing certificates of nationalism?

तनवीर जाफ़री

दिल्ली के जंतर-मंतर पर पिछले दिनों नीट पेपर लीक मामले के ख़िलाफ़ 36 दिनों तक चला छात्र आंदोलन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद समाप्त हुआ। इस आंदोलन के राष्ट्रव्यापी होने से पहले ही सरकार ने आंदोलनकारियों की मुख्य मांगें स्वीकार करते हुये यह साबित कर दिया कि यदि छात्र व युवा संगठित हों और उनकी मांगें भी जायज़ हों तो बहुमत वाली सरकार को भी झुकाया जा सकता है और ‘हमारी सरकार में इस्तीफ़े नहीं होते ‘ जैसे सत्ता के अहंकारी मिथक को तोड़ा जा सकता है। परन्तु इस आंदोलन के दौरान और आंदोलन समाप्त होने के बाद भी मीडिया से लेकर सत्ता समर्थक नेताओं व तथाकथित सेलेब्रिटीज़ द्वारा आंदोलनकारी युवाओं के प्रति अत्यंत अभद्र व आपत्तिजनक भाषाओँ का इस्तेमाल किया जाता रहा। निश्चित रूप से लगभग नेतृत्वविहीन से समझे जाने वाले इस आंदोलन में कुछ छात्र छात्राएं ऐसे भी थे जिन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से कई ऐसी अभद्र बातें कीं जिन्हें शिक्षित छात्रों की भाषा क़तई नहीं कहा जा सकता। कुछ युवाओं द्वारा तो प्रधानमंत्री मोदी व उनकी दिवंगत माताजी के विरुद्ध आपत्तिजनक व अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया गया। हालांकि नरेंद्र मोदी ने एक वीडिओ जारी कर उन्हें मुआफ़ भी कर दिया। प्रधानमंत्री ने कहा कि ‘कभी-कभी ग़ल्ती से दांतों के बीच जीभ आ जाती है और ख़ून निकल आता है, लेकिन हम दांत नहीं तोड़ते क्योंकि दांत और जीभ दोनों हमारे अपने हैं।’ परन्तु यह भी सच है कि गिनती के ऐसे युवाओं की गाली गलौज वाली भाषा के आधार पर पूरे आंदोलन,उसके विचारों व उसकी आत्मा का गला भी नहीं घोंटा जा सकता। उनके बहाने समस्त आंदोलनकारी युवाओं को अपमानित नहीं किया जा सकता। परन्तु ऐसा ही किया जा रहा है।

भाजपा सांसद व अभिनेत्री कंगना रानावत जिन्होंने स्वयं अपने एक साक्षात्कार में अपने ही अतीत को लेकर कुछ ऐसे रहस्योद्घाटन किये थे जिन्हें सुनकर किसी भी व्यक्ति का सिर शर्म से झुक जाये,वही कंगना, छात्र आंदोलन में शामिल युवाओं के ख़िलाफ़ पहले तो अपने सोशल मीडिया इंस्टाग्राम पर और बाद में संसद परिसर में मीडिया के सामने बेहद आपत्तिजनक बयान देती हैं? वे आंदोलनकारी छात्रों को ‘गटर जनरेशन’ ” और ‘गटर छाप’ “गंदगी” और “बदसूरत” कहकर संबोधित करती हैं। वे कहती हैं कि जंतर-मंतर आंदोलन के वायरल वीडियो को देखकर उन्हें ‘उबकाई’ आती है। वे इस पूरे प्रदर्शन को ‘कचरा तथा भद्देपन का प्रदर्शन’ बताती हैं। वे कहती हैं कि प्रदर्शन करने वाले युवाओं को नीट का फ़ुल फ़ॉर्म भी नहीं पता होगा। गोया कंगना युवाओं की वैध नाराज़गी को समझने के बजाय चंद बेहूदगी दिखाने वाले छात्रों को सम्बोधित करने के बजाये उन्हीं की आड़ में पूरे आंदोलन व आंदोलनकारी युवाओं का तिरस्कार कर उन्हें नीचा दिखाने की कोशिश करती हैं।

आंदोलनकारी युवाओं को अपमानित करने उन्हें धमकाने व नीचा दिखाने की ऐसी ही कोशिश टी. जी. मोहनदास नामक एक ऐसे व्यक्ति द्वारा की गयी जो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़ा केरल का एक प्रमुख दक्षिणपंथी राजनीतिक विश्लेषक, हिंदुत्व विचारक और भारतीय जनता पार्टी का राज्य बौद्धिक सेल का पूर्व प्रमुख है। इस व्यक्ति ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों के ख़िलाफ़ अपने यूट्यूब चैनल ‘पत्रिका’ पर एक अत्यंत आपत्तिजनक,विवादित और हिंसक बयान दिया था। इस ने अपने वीडियो में प्रदर्शनकारियों को निशाना बनाते हुए कहा कि “अगर मैं ज़िम्मेदार (अधिकार) में होता, तो जंतर-मंतर के चार वर्ग किलोमीटर के इलाक़े में कर्फ़्यू लगा देता। मैं लोगों से तीन बार वहां से हटने के लिए कहता और इसके बाद सीधे गोली चलवा देता। कुछ लोग भाग जाते, कुछ मर जाते, कुछ बच जाते और चार घंटे के भीतर स्थिति शांत हो जाती।” इसी तरह उसने प्रदर्शन में शामिल छात्राओं व महिलाओं के ख़िलाफ़ भी बेहद शर्मनाक टिप्पणी करते हुए कहा कि “प्रदर्शनकारियों में ऐसी महिलाएं शामिल हैं जिन्हें बलात्कार पसंद है” उसने वामपंथी महिलाओं को निशाना बनाकर कई अभद्र बातें कहीं। उसने प्रदर्शनकारी छात्रों पर पुलिस बल प्रयोग और उन्हें पीटने का भी समर्थन किया। देश भर में भारी राजनीतिक और सामाजिक आक्रोश देखने के बाद केरल की तिरुवनंतपुरम साइबर पुलिस ने उसके ख़िलाफ़ भारतीय न्याय संहिता की धारा 192 (दंगा भड़काने का इरादा) और 353(1)(b) (सार्वजनिक शांति भंग करना), आईटी एक्ट और केरल पुलिस एक्ट की विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया। उधर विवाद बढ़ने पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने आधिकारिक तौर पर उसके बयानों से यह कहकर दूरी बना ली कि ‘यह मोहनदास के “निजी विचार” हैं और संगठन इनकी कड़ी निंदा करता है’। विवादों से बचने के लिये भले ही संघ ऐसे व्यक्ति से दूरी क्यों न बनाये परन्तु इसतरह के ज़हरीले विचार कहाँ से आये कहाँ पनपे और किन संस्कारों में फले फूले इस बात से संघ अपने को नहीं बचा सकता।

इसी तरह गोदी मीडिया के कई चैनल्स सत्ता के कई प्रवक्ता व सत्ता समर्थक लोगों द्वारा आंदोलन पर वामपंथी,पकिस्तान समर्थक,चीन द्वारा फ़ंडिंग प्राप्त यहाँ तक कि भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक तक को चीनी एजेंट बताने की कोशिश की गयी। यह वही जाना पहचाना पैटर्न था जोकि विवादित कृषि क़ानूनों के विरुद्ध हुये किसान आंदोलन के समय भी सत्ता पक्ष व उसके समर्थकों की ओर से देखा गया था। परन्तु जिस तरह किसान आंदोलन को ख़ालिस्तान समर्थक आंदोलन प्रचारित करने के बावजूद सरकार को किसानों के सामने घुटने टेकते हुये तीनों विवादित कृषि क़ानूनों वापस लेने पड़े थे ठीक उसी तरह युवाओं ने भी पिछले दिनों शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का त्यागपत्र लेने के बाद ही अपना आंदोलन समाप्त किया। गोया यहाँ भी सरकार को आंदोलन के सामने घुटने टेकने पड़े।

ऐसे में सवाल उन सत्ता समर्थक मीडिया,नेताओं व चाटुकारों से है कि क्या स्वयं को मज़बूत बताने वाली सरकार ने शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा लेकर एक बार फिर पाकिस्तानी,चीनी व राष्ट्रविरोधी मंसूबों पर चलने वाले छात्र आंदोलन के सामने समर्पण कर दिया ? संघ विचारक जिन्हें गोली मारने व बलात्कार का पात्र मानते हों, सांसद कंगना रानौत जिन्हें गटर,बदबूदार,उबकाई भरा,बदसूरत और न जाने क्या क्या बताती हो, क्या सरकार ने ऐसे लोगों के सामने घुटने टेक दिये ? और क्या यह सरकार किसान आंदोलन के समय भी खालिस्तानी इरादों के सामने इसी तरह नतमस्तक हो गयी थी ? सत्ता से जुड़े लोगों,समर्थकों और सत्ता की चाटुकारिता को ही देशभक्ति समझने वालों को राष्ट्रवाद का प्रमाण पत्र बांटना बंद कर देना चाहिये अन्यथा जब जब सरकार आंदोलनकारियों के सामने नतमस्तक होगी तब तब यह सवाल भी पूछे जाते रहेंगे।