ललित गर्ग
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत की अगस्त 2026 की अमेरिका यात्रा को केवल प्रवासी भारतीयों के एक कार्यक्रम तक सीमित करके देखना उसके व्यापक अर्थ को छोटा करना होगा। न्यूयार्क में 29 अगस्त को आयोजित ‘एक विश्व, एक मानवता’ कार्यक्रम में उनका संबोधन ऐसे समय हुआ, जब संघ को लेकर भारत ही नहीं, विदेशों में भी अनेक धारणाएं, आरोप और पूर्वाग्रह सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बने हुए हैं। ऐसे वातावरण में भागवत ने जिस प्रकार विविधता, संवाद, सेवा, सह-अस्तित्व और मानवीय एकात्मता को केंद्र में रखा, उसने संघ की विचारधारा को उसके समर्थकों के लिए ही नहीं, बल्कि वैश्विक समाज के सामने भी एक अलग दृष्टि से प्रस्तुत किया। यह यात्रा इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि संघ अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है और उसके विचार अब भारत की सीमाओं से बाहर भी व्यापक चर्चा का विषय बन रहे हैं। भागवत का अमेरिका जाना वस्तुतः संघ के विचार को प्रत्यक्ष संवाद के माध्यम से समझाने का अवसर बना। संघ के बारे में भारत में लंबे समय से दो विपरीत धारणाएं दिखाई देती रही हैं। एक पक्ष उसे भारतीय संस्कृति, राष्ट्रभावना, सेवा और सामाजिक संगठन की विराट शक्ति मानता है, जबकि दूसरा पक्ष उसके विचारों को संकीर्ण धार्मिक राजनीति से जोड़कर देखता है। कांग्रेस सहित विभिन्न विपक्षी दलों ने समय-समय पर संघ और उसके विचारों पर गंभीर राजनीतिक प्रश्न उठाए हैं। अमेरिका में भी कार्यक्रम से पहले कुछ संगठनों और राजनीतिक व्यक्तियों ने भागवत की यात्रा और संघ की विचारधारा पर आपत्तियां व्यक्त कीं। ऐसे माहौल में किसी संस्था की वास्तविक छवि केवल आरोप-प्रत्यारोप से नहीं बनती, वह संवाद से बनती है। यही इस यात्रा का सबसे बड़ा महत्व है। भागवत ने अपने विचार विरोधियों पर आक्रमण करके नहीं, बल्कि भारतीय चिंतन की व्याख्या करके सामने रखे। इससे संघ को लेकर बनी धारणाओं पर बहस का एक नया आधार तैयार हुआ।
न्यूयार्क में भागवत के वक्तव्य का सबसे अधिक चर्चित पक्ष उनका हिंदू-मुस्लिम संबंधों पर स्पष्ट कथन रहा। उन्होंने कहा कि यदि कोई हिंदू यह मानता है कि भारत में मुसलमानों के लिए स्थान नहीं होना चाहिए, तो वह हिंदू नहीं रह सकता। यह कथन राजनीतिक नारे से अधिक महत्वपूर्ण इसलिए है कि इसमें हिंदुत्व की उनकी व्याख्या को सामाजिक समावेश के साथ जोड़ा गया है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि सत्य एक है और उसे समझने तथा व्यक्त करने के मार्ग अलग-अलग हो सकते हैं। भारतीय परंपरा की यही विशेषता है कि वह मतभिन्नता को अस्तित्व के संकट के रूप में नहीं, बल्कि सत्य की विविध अभिव्यक्तियों के रूप में देखने की क्षमता रखती है। यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है-यदि हिंदुत्व का अर्थ भारत की सांस्कृतिक चेतना है, तो क्या वह किसी समुदाय को भारत से बाहर कर सकता है? भागवत का उत्तर स्पष्ट रूप से नकारात्मक दिखाई देता है। उनका कथन हिंदुत्व की उस व्याख्या को सामने रखता है, जिसमें भारतीयता किसी एक पूजा-पद्धति की बपौती नहीं, बल्कि साझा सांस्कृतिक विरासत है।
भागवत ने अमेरिका में भारत की विविधता को उसकी कमजोरी नहीं, शक्ति बताया। उनके अनुसार विविधता और एकता भारत के स्वभाव में ही अंतर्निहित हैं। भारत में भाषा, जाति, पंथ, पूजा-पद्धति और परंपराओं की असंख्य धाराएं हैं, फिर भी इन्हें एक साझा सभ्यतागत चेतना जोड़ती रही है। यह संदेश आज के विश्व के लिए अत्यंत प्रासंगिक है। अनेक देशों में धार्मिक पहचान, नस्लीय भेद, सांस्कृतिक असहमति और राजनीतिक ध्रुवीकरण सामाजिक तनाव बढ़ा रहे हैं। ऐसे समय भारत का अनुभव यह बताता है कि भिन्नताओं को मिटाना आवश्यक नहीं, उन्हें सम्मान देकर भी एकता स्थापित की जा सकती है। यही विचार भागवत के संबोधन को सामान्य राजनीतिक भाषण से ऊपर उठाता है। उनका आग्रह था कि विविधता को स्वीकार ही नहीं, सम्मान और संरक्षण भी मिलना चाहिए।
संघ की सार्वजनिक छवि का एक बड़ा हिस्सा राजनीतिक विमर्श से निर्मित हुआ है, जबकि संघ स्वयं को सामाजिक संगठन और सेवा-आधारित सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में प्रस्तुत करता रहा है। भागवत ने अमेरिका में भी सेवा, सामाजिक समरसता और संवाद को परिवर्तन का आधार बताया। यही वह बिंदु है जहां संघ की छवि को केवल चुनावी राजनीति के चश्मे से देखने की सीमा सामने आती है। किसी संगठन को समझने के लिए उसके राजनीतिक प्रभाव के साथ उसकी सामाजिक गतिविधियों, सेवा-कार्य, संगठनात्मक संस्कृति और वैचारिक आधार को भी देखना आवश्यक है। भागवत की यात्रा ने कम से कम इतना अवसर अवश्य दिया कि संघ को उसके अपने शब्दों और उसके सरसंघचालक की प्रत्यक्ष व्याख्या के आधार पर सुना जाए।
अमेरिका में बसे भारतीयों से भागवत ने एक संतुलित संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जिस देश में वे रह रहे हैं, वह उनकी कर्मभूमि है और वहां के प्रति उनकी निष्ठा तथा दायित्व सर्वोपरि हैं। साथ ही भारत उनकी जन्मभूमि है, जिससे उन्हें मानवीय मूल्यों और सांस्कृतिक संस्कारों की विरासत मिली है। यह दृष्टि प्रवासी भारतीयों के सामने पहचान के संघर्ष के बजाय पहचान के समन्वय का मार्ग रखती है। अपनी जड़ों से जुड़े रहना और जिस समाज में रह रहे हैं उसके प्रति पूर्ण निष्ठा रखना-दोनों एक साथ संभव हैं। यही भारतीय संस्कृति की उदारता है। यह भी तथ्य है कि भागवत के कार्यक्रम का अमेरिका में विरोध हुआ और संघ की विचारधारा को लेकर तीखी आलोचनाएं सामने आईं। लेकिन लोकतांत्रिक समाज में किसी विचार का उत्तर उसे दबाकर नहीं, उसके साथ संवाद करके दिया जाता है। इस दृष्टि से यह यात्रा संघ के लिए भी एक परीक्षा थी। भागवत ने विरोध का उत्तर आक्रामक भाषा में देने के बजाय एकात्मता, मानवता और सह-अस्तित्व की बात की। यही इस यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है। आलोचक उनके शब्दों और संघ के व्यवहार के बीच अंतर का प्रश्न उठा रहे हैं, समर्थक इसे संघ के मूल विचारों की स्पष्ट अभिव्यक्ति मान रहे हैं। इस बहस का अंतिम निर्णय समय और व्यवहार करेगा, लेकिन इतना निश्चित है कि बहस अब अधिक प्रत्यक्ष और वैश्विक हो गई है।
मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा को संघ की छवि पर वर्षों से चले आ रहे विवाद का अंतिम उत्तर मानना अतिशयोक्ति होगी। किंतु इसे एक महत्वपूर्ण मोड़ अवश्य कहा जा सकता है। जिन लोगों ने संघ को केवल राजनीतिक आरोपों और विरोधी व्याख्याओं के माध्यम से जाना है, उन्हें पहली बार इतने बड़े वैश्विक मंच पर उसके शीर्ष नेतृत्व की विचार-दृष्टि को सीधे सुनने का अवसर मिला। यह यात्रा संघ के लिए एक उजाला इसलिए बनी है कि इसमें प्रतिरक्षा की भाषा कम और आत्मविश्वास की भाषा अधिक दिखाई दी। इसमें यह कहने का प्रयास था कि भारतीयता किसी के निषेध से नहीं, सबके सम्मान से मजबूत होती है, हिंदुत्व किसी समुदाय के बहिष्कार से नहीं, मानवता की एकात्म दृष्टि से सार्थक होता है और भारत की शक्ति उसकी समानता में नहीं, उसकी विविधताओं के बीच बनी रहने वाली सांस्कृतिक एकता में है।
आज विश्व को केवल आर्थिक शक्ति, सैन्य शक्ति और तकनीकी प्रगति की आवश्यकता नहीं है। उसे ऐसा जीवन-दर्शन भी चाहिए जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़ सके। भागवत के अमेरिकी संबोधन में भारत की इसी भूमिका की कल्पना दिखाई दी-एक ऐसा भारत जो अपनी परंपरा के बल पर विश्व को सह-अस्तित्व, संवाद और एकात्मता का रास्ता दिखा सके। मोहन भागवत की यह यात्रा इसलिए स्मरणीय रहेगी कि उसने संघ के बारे में चल रही बहस को भारत की सीमाओं से निकालकर विश्व के सार्वजनिक विमर्श में पहुंचा दिया। अब संघ की पहचान केवल उसके विरोधियों के आरोपों या समर्थकों के दावों से नहीं, बल्कि उसके विचार, उसके व्यवहार और समाज के साथ उसके संवाद से तय होगी। अंततः किसी विचारधारा की सबसे बड़ी शक्ति उसका प्रचार नहीं, उसका आचरण होता है। अमेरिका की धरती से भागवत ने जो संदेश दिया है, उसकी वास्तविक कसौटी भारत की धरती पर सामाजिक समरसता, सेवा, संवाद और सह-अस्तित्व के रूप में दिखाई देगी। यदि यह संदेश व्यवहार में उतरता है, तो यह केवल संघ की छवि को नहीं, भारत की वैश्विक सांस्कृतिक प्रतिष्ठा को भी नई ऊंचाई दे सकता है।





