गोपेन्द्र नाथ भट्ट
भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था ने 7.8 प्रतिशत की विकास दर दर्ज कर एक बार फिर अपनी आर्थिक क्षमता का संकेत दिया है। बिश्केक से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का देशवासियों से आत्मनिर्भरता, स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देने और घरेलू मांग को मजबूत करने का आह्वान इसी आर्थिक आत्मविश्वास को व्यापक जनभागीदारी से जोड़ने का प्रयास है। प्रधानमंत्री ने विपक्ष पर टिप्पणी करते हुए कहा कि कुछ लोग देश की उपलब्धियों पर सवाल उठाने और निराशा फैलाने में लगे रहते हैं, जबकि भारत के नागरिक अपनी मेहनत से विकास की नई कहानी लिख रहे हैं। इस प्रकार भारत की 7.8 प्रतिशत की विकास दर देश और दुनिया के लिए एक आईना है। हालांकि, महत्वपूर्ण प्रश्न केवल यह नहीं है कि अर्थव्यवस्था कितनी तेज गति से बढ़ रही है, बल्कि यह भी है कि इस विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक किस हद तक पहुंच रहा है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था इस समय अनेक अनिश्चितताओं से गुजर रही है। ऐसे में भारत का मजबूत विकास प्रदर्शन निश्चित रूप से भरोसा और आश्वासन पैदा करता है। हालांकि, किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए लंबे समय तक उच्च विकास दर बनाए रखना आसान नहीं होता। इसके लिए निवेश, रोजगार, उत्पादन और खपत—इन सभी क्षेत्रों में निरंतर गति आवश्यक है। इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री का घरेलू मांग पर जोर महत्वपूर्ण हो जाता है। विपक्ष पर उनकी टिप्पणी को भी इस दृष्टिकोण से देखा जा सकता है कि आलोचना के बजाय देशहित में सकारात्मक योगदान और रचनात्मक सुझावों की आवश्यकता है।
भारत की सबसे बड़ी आर्थिक शक्तियों में उसका विशाल घरेलू बाजार शामिल है। करोड़ों उपभोक्ताओं की बढ़ती आवश्यकताएं उद्योगों के लिए व्यापक अवसर पैदा करती हैं। यदि भारतीय नागरिक स्थानीय स्तर पर निर्मित उत्पादों को प्राथमिकता देते हैं, तो इसका सीधा सकारात्मक प्रभाव देश के उद्योगों, छोटे कारोबारों, कुटीर इकाइयों और रोजगार पर पड़ सकता है। स्थानीय उत्पाद की खरीद केवल किसी वस्तु का उपभोग नहीं है; इसके पीछे कच्चे माल से लेकर उत्पादन, परिवहन, व्यापार और रोजगार तक की पूरी मूल्य शृंखला जुड़ी होती है।
हालांकि, आत्मनिर्भरता का अर्थ यह कतई नहीं होना चाहिए कि भारत दुनिया से अलग-थलग हो जाए। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में कोई भी बड़ी अर्थव्यवस्था पूरी तरह आत्मनिर्भर होकर संचालित नहीं हो सकती। तकनीक, पूंजी, ऊर्जा और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं के स्तर पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग आवश्यक है। इसलिए आत्मनिर्भर भारत की वास्तविक कसौटी आयात पर रोक लगाना नहीं, बल्कि अपनी उत्पादन क्षमता को इतना मजबूत बनाना है कि भारत आवश्यक वस्तुओं का निर्माण प्रतिस्पर्धी कीमत और बेहतर गुणवत्ता के साथ स्वयं कर सके तथा वैश्विक बाजार में भी प्रभावी स्थान बना सके।
स्वदेशी अभियान की सफलता भी इसी कसौटी पर निर्भर करेगी। केवल भावनात्मक अपील के आधार पर उपभोक्ता लंबे समय तक किसी उत्पाद को नहीं अपनाते। भारतीय उत्पादों को गुणवत्ता, कीमत, डिजाइन और तकनीक—हर स्तर पर वैश्विक मानकों पर खरा उतरना होगा। इसके लिए छोटे और मझोले उद्योगों को सस्ती पूंजी, आधुनिक तकनीक और व्यापक बाजार तक पहुंच उपलब्ध कराना आवश्यक है।
सबसे बड़ी चुनौती रोजगार और आय में वृद्धि की है। घरेलू मांग तभी टिकाऊ बन सकती है, जब लोगों के पास खर्च करने योग्य पर्याप्त आय हो। इसलिए 7.8 प्रतिशत की विकास दर को वास्तविक सफलता तभी माना जाएगा, जब इसका प्रभाव रोजगार के अवसरों, किसानों की आय, छोटे कारोबारियों की स्थिति और आम परिवारों की क्रयशक्ति पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे।
वास्तव में, 7.8 प्रतिशत की विकास दर भारत के लिए केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि आगे बढ़ने का महत्वपूर्ण अवसर है। अब चुनौती इस गति को व्यापक और टिकाऊ आर्थिक मजबूती में बदलने की है। सरकार की नीतियां, उद्योगों की क्षमता और नागरिकों की उपभोग संबंधी प्राथमिकताएं—इन तीनों का समन्वय भारत की अगली आर्थिक छलांग की दिशा तय कर सकता है। प्रधानमंत्री की विपक्ष पर टिप्पणी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा हो सकती है, लेकिन आर्थिक विकास को टिकाऊ बनाने के लिए सरकार और विपक्ष दोनों को मिलकर नीतिगत मुद्दों पर गंभीरता से कार्य करना होगा।
आत्मनिर्भरता का अर्थ दुनिया से मुंह मोड़ना नहीं, बल्कि वैश्विक मंच पर अपने पैरों पर मजबूती से खड़ा होना है। यदि भारत अपनी घरेलू मांग को उत्पादन और रोजगार से प्रभावी रूप से जोड़ने में सफल रहता है, तो 7.8 प्रतिशत की यह विकास दर आने वाले वर्षों की एक बड़ी आर्थिक उपलब्धि की नींव बन सकती है.





