डॉ.अशोक कुमार भार्गव
14 सितंबर को हिन्दी दिवस का आगमन हिन्दी जगत के लिए उमंग उत्साह और ऊर्जा से भरा हुआ
उत्सव होता है जिसका समापन हिन्दी सप्ताह और हिन्दी पखवाड़े में आयोजित विभिन्न प्रतिस्पर्धाओं के विजेताओं
को पुरस्कृत करने और हिन्दी सेवियों हिंदी प्रेमियों तथा हिंदी साधकों के श्रेष्ठतम कार्यों के सम्मान के साथ एक
कर्मकांड के रूप में होता है। हिन्दी दिवस पर हम बड़े ही आत्मविश्वास के साथ हिन्दी की गरिमा, उसकी महिमा
और उसके अप्रतिम गौरव का गुणगान तो करते हैं किंतु वास्तव में हम हिंदी की दशा को लेकर अपेक्षित गंभीर
नहीं होते जबकि यह दिन हमारे आत्म मूल्यांकन का आत्मविश्लेषण का होता है कि हमने हिन्दी के भविष्य को
स्वर्णिम बनाने की दिशा में क्या महतीअवदान दिया है।
यह सही है कि हिंदी हमारी अस्मिता की पहचान और भारत की आत्मा है।यह हमारी सांस्कृतिक चेतना को
सूक्ष्मता सेअभिव्यक्त करने की संपदा है। यह हमारे सार्वभौमिक मूल्यों की विधायिका है जो समग्र राष्ट्र को एकता
के सूत्र में बांधती है,यह केवल संवाद की भाषा ही नहीं है,बल्कि यह एक समृद्ध,सांस्कृतिक, नैतिक और
आध्यात्मिक विरासत की संवाहिका है। वसुधैव कुटुम्बकम की भावना अर्थात वैश्विक भाईचारे और एकता की
भावना जाग्रत कर जन जन में आत्माभिमान स्वाभिमान का भाव उत्पन्न करती है। परस्पर सम्मान जुड़ाव
विनम्रता सहिष्णुता संवेदनशीलता और समरसता का भाव हिन्दी की अंतर्निहित प्रकृति है। इसीलिए हिन्दी जन जन
की अभिलाषा के अनुरूप समग्र राष्ट्र में संपर्क की भाषा बनीहै।
मध्यकाल में हिन्दी भक्ति आंदोलन के धार्मिक और सामाजिक सुधारों की भाषा बनी और स्वाधीनता संग्राम के
राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले आदर्शों को हिन्दी ने मुखरता के साथ सशक्त किया। हिन्दी को राष्ट्रभाषा
बनाने के लम्बे संघर्ष के बाद 14 सितंबर,1949 को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 में प्रावधान किया गया
कि संघ की सरकारी भाषा देवनागरी लिपि में हिंदी होगी और संविधान के लागू होने के समय से 15 वर्ष की अवधि
तक संघ के उन सभी प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी का प्रयोग होता रहेगा।अनुच्छेद की धारा 3 में व्यवस्था की गई कि
संसद 15 वर्ष की कालावधि के पश्चात विधि द्वारा अंग्रेजी भाषा के प्रयोग को उपबंधित कर सकेगी।किंतु ऐसा हो
ना सका। राष्ट्रभाषा के संदर्भ में गठित खेर आयोग और पंत समिति के प्रतिवेदनों के आधार पर 1963 में बनाए
गए राजभाषा अधिनियम के अनुसार ऐसी व्यवस्था कर दी गई कि26जनवरी1965 के पश्चात भी अंग्रेजी राजकाज
की भाषा बनी रहेगी यद्यपि हिंदी ही संघ की राज भाषा होगी किंतु अंग्रेजी के प्रयोग की छूट तब तक बनी रहेगी
जब तक हिंदी को राजभाषा के रूप में अपनाने वाले सभी राज्यों के विधानमंडल अंग्रेजी को समाप्त करने के लिए
संकल्प ना पारित करें। स्पष्ट है कि विधेयक के अनुसार अंग्रेजी का प्रयोग अनंत काल तक किया जा सकेगा।
किसी निश्चित अवधि का उल्लेख वहां नहीं है यदि एक भी राज्य हिंदी का प्रयोग ना चाहे तब भी हिंदी राजकाज
की अनिवार्य भाषा नहीं हो सकेगी। इस प्रकार हिन्दी राष्ट्रभाषा के गौरव से वंचित हो गई।
डॉ.भीमराव अंबेडकर ने भाषा के प्रश्न को केवल भावुकता की दृष्टि से नहीं देखा बल्कि भाषा के प्रति उनका
दृष्टिकोण राष्ट्रीय था। संस्कृत हो या हिन्दी दोनों के प्रति उनकी धारणा थी कि ये भाषाएँ भारत को एकता के सूत्र
में बांधकर संगठित रख सकती हैं और किसी भी प्रकार के भाषायी विवाद से बचा सकती है। डॉ.अंबेडकर के पास
विभिन्न विषयों में 32 उपाधियाँ थीं और वे 9 भाषाओं के ज्ञाता थे। फिर भी उन्होंने अंग्रेजी अखबार नहीं निकाला
वरन हिन्दी में अखबार निकाले।यदि अंग्रेजी में अखबार निकाला होता तो संभवतः वे मूक समाज के महानायक नहीं
बन पाते। वे क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों के विकास के पक्षधर थे, लेकिन राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी को ही
प्रतिस्थापित करने के समर्थक थे। वे भाषाई आधार पर प्रांतों के गठन के पक्षधर नहीं थे।डॉ. अंबेडकर ने एक भाषा
एक राज्य के स्थान पर एक राज्य एक भाषा का समर्थन किया था।
हमारे राष्ट्र निर्माताओं ने बहुत ही सोच समझ कर हिन्दी को राष्ट्रभाषा स्वीकार किया था। महात्मा गांधी
ने कहा था,अगर हम भारत को राष्ट्र बनाना चाहते हैं तो हिंदी ही हमारी राष्ट्रभाषा हो सकती है। अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय
भाषा है लेकिन वह हमारी राष्ट्रभाषा नहीं हो सकती। वे मानते थे कि राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है। नेताजी
सुभाष चंद्र बोस का कहना था कि प्रांतीय ईर्ष्या द्वेष को दूर करने में जितनी सहायता हिंदी प्रचार से मिलेगी उतनी
दूसरी किसी चीज़ से नहीं मिल सकती। यदि हम लोगों ने तन मन धन से प्रयत्न किया तो वह दिन दूर नहीं जब
भारत स्वाधीन होगा और उसकी राष्ट्रभाषा होगी हिंदी।आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद ने भी कहा था हिंदी
के द्वारा सारे भारत को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है। जबकि के एम मुंशी का कहना था कि हिंदी को
राष्ट्रभाषा बनाना नहीं है। वह तो है ही।
भारतेन्दु जी ने कभी बड़ी गहराई में उतरकर लिखा था” निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। पै
निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिय को सूल।” इस मूल मंत्र को नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में रेखांकित करते हुए
मातृभाषाओं, लोकभाषाओं को समान अवसर दिया गया है। प्रारंभिक विद्यालयीन पठन पाठन से लेकर उच्च शिक्षा
तक में लोकभाषाओं का महत्व बढ़ा है जो आने वाले वर्षों में भारत को वैश्विक ज्ञान के नए क्षितिजों में स्थापित
करेगा। यद्यपि मातृ भाषा में शिक्षा की वकालत करना बहुत सहज है,किंतु इस हेतु क्रियान्वयन के स्तर पर
समग्रतः मानवीय और भौतिक संसाधनों की पर्याप्त उपलब्धता अपरिहार्य है। और वास्तव में हिन्दी की सबसे बड़ी
चुनौती यही है कि वह केवल प्राथमिक शिक्षा की भाषा बनकर न रह जाए वरन् वह वैश्विक विश्वविद्यालयों में भी
उच्चतम शोध और ज्ञान की बुनियाद बनना चाहिए।
किसी भी भाषा का भविष्य सरकारी आदेशों से उज्जवल नहीं होता और ना ही यह किसी एक व्यक्ति संस्था
या शासकीय तन्त्र पर निर्भर होता है। भाषा का भविष्य तो उस भाषा के प्रति सृजनात्मक समर्पण भाव से होता
है,उसके बोलने जानने समझने और लिखने वालों की निस्वार्थ संकल्प शक्ति, अपनी भाषा के प्रति अपनत्व और
निश्छल ममत्व से होता है। यदि हिन्दी के प्रति हमारा जुड़ाव केवल हिन्दी दिवस को एक वार्षिक उत्सव मनाने तक
ही सीमित है तब ऐसा प्रतीत होता है कि वास्तव में हम हिन्दी के समर्थक हैं या हम ऐसा होने का मात्र आडंबर
कर रहे हैं। “धर्म एव हतो हन्ति, धर्मो रक्षति रक्षिताः।”अर्थात् जो धर्म की हत्या करता है वह स्वयं मारा जाता है
और जो धर्म की रक्षा करता है धर्म उसकी रक्षा करता है। यदि यहां हम धर्म के स्थान पर भाषा रख दें तो स्थिति
वही रहती है कि जो जाति भाषा की उपेक्षा करती है वह स्वयं उपेक्षित हो जाती है और जो अपनी भाषा की रक्षा
करती है भाषा भी उसकी रक्षा करती है। इसलिए भाषायी उपेक्षा सांस्कृतिक क्षरण का कारण बनती है।
गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर ने कहा था कि अन्य भारतीय भाषाएं नदी है और हिन्दी महानदी। अतःवैश्विक स्तर पर
हिन्दी की बढ़ती स्वीकार्यता के परिप्रेक्ष्य में हिन्दी का दायित्व और अधिक बढ़ जाता है। हिन्दी को अन्य भारतीय
भाषाओं के प्रति सम्मान और परस्पर समन्वय का संबंध रखते हुए सहेलियों जैसा व्यवहार करना चाहिए। जहां
अपनी अपनी श्रेष्ठताओं और विशिष्टताओं का आदान-प्रदान परस्पर विश्वास समन्वय और सहयोग के आधार पर
होता हो। अन्यथा भाषायी सौहार्द निर्मित नहीं हो सकता।
सोशल मीडिया में सूचनाओं के विस्फोट की क्रांति ने नए डिजिटल युग को जन्म दिया है जहां कृत्रिम
बुद्धिमत्ता के साथ भाषा के समक्ष विकास की अनंत संभावनाओं के द्वार खुल रहे हैं। एक और सूचनाओं का अनंत
साम्राज्य है तो वहीं दूसरी ओर फर्जी झूठी काल्पनिक बनावटी नकलीऔर असत्य जानकारियों से बचते हुए
गुणवत्तापूर्ण सही सामग्री और ज्ञान के असली मोतियों का चुनाव बहुत कठिन है। डिजिटल दुनिया के प्रतिस्पर्धी
संसार में हिन्दी की उपादेयता और स्वीकार्यता को विस्तार देने के लिए हिन्दी में डिजिटली ज्ञान के कौशल को
समृद्ध और सशक्त बनाना हिन्दी के अस्तित्व के लिए बहुत जरूरी है।
हिन्दी के सर्वतोन्मुखी विकास के लिए एकपक्षीय दृष्टिकोण का परित्याग आवश्यक करते हुए सरकारी
और गैर सरकारी सभी साधनों के एकत्रीकरण एवं सम्मिलित प्रयास की आवश्यकता है और उच्च कोटि की ध्येय
निष्ठा के साथ अनवरत साधना की भावना ही हिन्दी के वांगमय को समृद्ध बना सकती है। हिन्दी में आधुनिक
ज्ञान विज्ञान भूगोल, खगोल चिकित्सा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इंजीनियरिंग,कृषि, अर्थशास्त्र,दर्शन अध्यात्म,गणित आदि की
सभी शाखाओं में आधुनिकतम वैश्विक स्तर के मौलिक और प्रामाणिक ग्रंथों का सृजन,वैश्विक स्तर के शब्द
भंडार,डिजिटल संपदा का निर्माण और आधुनिक ढंग से उत्कृष्टतम शोध कार्य युद्ध स्तर पर करने की आवश्यकता
है।
जिस दिन हिंदी रोजगार की कुंजी और अंतर्राष्ट्रीय ज्ञान का प्रवेश द्वार बनने की क्षमता अर्जित कर
लेगी उस दिन हिंदी दिवस सार्थक हो जाएगा। “कोटि कोटि कंठों की भाषा, जनगणना की मुखरित अभिलाषा, हिन्दी
है पहचान हमारी, हिन्दी है हम सबकी परिभाषा।”





