अशोक भाटिया
हर साल चौदह सितंबर आते ही देश के प्रशासनिक और अकादमिक गलियारों में एक चिर-परिचित हलचल शुरू हो जाती है। हिंदी पखवाड़े के नाम पर दफ्तरों में फाइलों का रंग बदलने लगता है, भाषणों की पुरानी पेटियां खोल दी जाती हैं और ‘राष्ट्रभाषा’ के नाम पर वही घिसे-पिटे नारे दोहराए जाने लगते हैं जो पिछले सात दशकों से सुने जा रहे हैं। लेकिन समकालीन भारत के बदलते सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक यथार्थ के बीच अब समय आ गया है कि हम इस रस्मी औपचारिकता के आवरण को हटाकर उस कड़वे सच का सामना करें जिसे अक्सर सरकारी विज्ञापनों के शोर में दबा दिया जाता है। आज का भाषाई परिदृश्य केवल इस बात तक सीमित नहीं है कि हिंदी का विकास कितना हुआ, बल्कि यह इस बात का आत्मनिरीक्षण करने का समय है कि आखिर देश का एक बहुत बड़ा और आर्थिक रूप से समृद्ध हिस्सा, जिसे हम दक्षिण भारत कहते हैं, आज भी हिंदी को लेकर इतना आशंकित और प्रतिरोधी क्यों है। ऐतिहासिक रूप से इस प्रतिरोध को केवल ‘राजनीतिक रूप से प्रेरित’ या ‘हिंदी विरोध’ का नाम देकर खारिज किया जाता रहा है, जो कि न केवल एक सतही दृष्टिकोण है बल्कि दक्षिण भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और उनके तार्किक सरोकारों का अपमान भी है। हमें यह समझना होगा कि भाषा केवल संवाद का एक माध्यम भर नहीं होती, बल्कि वह किसी भी समाज की अस्मिता, उसके इतिहास, उसकी सोच और उसके अस्तित्व की संवाहक होती है। जब तक हम उत्तर और दक्षिण के बीच की इस भाषाई खाई को नीतिगत और मनोवैज्ञानिक स्तर पर नहीं समझेंगे, तब तक हर साल चौदह सितंबर को मनाया जाने वाला यह उत्सव देश की विविधता में एकता के सिद्धांत पर एक अनकहा प्रश्नचिह्न लगाता रहेगा।
दक्षिण भारत के राज्यों—विशेषकर तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल और आंध्र प्रदेश—में हिंदी को लेकर जो झिझक या प्रतिरोध दिखाई देता है, उसकी जड़ें उनके गौरवशाली इतिहास और भाषाई स्वाभिमान में समाहित हैं। उदाहरण के लिए, तमिल भाषा दुनिया की सबसे पुरानी जीवित भाषाओं में से एक है, जिसका अपना एक समृद्ध संगम साहित्य है जो संस्कृत या हिंदी से प्रभावित हुए बिना स्वतंत्र रूप से फला-फूला है। यही बात कन्नड़, तेलुगु और मलयालम पर भी लागू होती है जिनका अपना एक अलग व्याकरण, दर्शन और सांस्कृतिक परिवेश है। ऐसे में जब उत्तर भारत के राजनेताओं या केंद्र सरकार की नीतियों द्वारा यह संदेश दिया जाता है कि हिंदी ही भारत की असली पहचान है या हिंदी सीखे बिना कोई व्यक्ति ‘सच्चा भारतीय’ नहीं हो सकता, तो दक्षिण के समाज में एक स्वाभाविक आक्रोश का जन्म होता है। उन्हें लगता है कि उनकी भाषाई पहचान को दोयम दर्जे का बनाने की कोशिश की जा रही है। आजादी के बाद जब संविधान सभा में भाषा के प्रश्न पर बहस हो रही थी, तब भी दक्षिण के नेताओं ने स्पष्ट कर दिया था कि वे किसी भी ऐसी व्यवस्था को स्वीकार नहीं करेंगे जो उन पर जबरन कोई भाषा थोपे। यही कारण था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने आश्वासन दिया था कि जब तक गैर-हिंदी भाषी राज्य चाहेंगे, तब तक अंग्रेजी एक सह-राजभाषा के रूप में बनी रहेगी। लेकिन हाल के वर्षों में, चाहे वह राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत त्रि-भाषा सूत्र का क्रियान्वयन हो, या केंद्रीय नौकरियों की परीक्षाओं में हिंदी को प्राथमिकता देने का मामला हो, दक्षिण को यह महसूस होने लगा है कि उस पुराने ऐतिहासिक वादे को धीरे-धीरे कमजोर किया जा रहा है। इसी ‘भाषाई थोपने’ या ‘अधिग्रहण’ के डर ने वहां के राजनीतिक और सामाजिक विमर्श को हमेशा सतर्क और आक्रामक बनाए रखा है।
इस सांस्कृतिक संघर्ष के समानांतर, आज के वैश्विक और पूंजीवादी दौर में एक बहुत बड़ा आर्थिक यथार्थ भी काम कर रहा है जो दक्षिण भारत के युवाओं के दृष्टिकोण को निर्धारित करता है। आज का युवा अत्यंत व्यावहारिक है और वह किसी भी भाषा को उसकी उपयोगिता और रोजगार की संभावनाओं के तराजू पर तौलता है। यदि हम दक्षिण भारत के आर्थिक मॉडल को देखें, तो वहां सूचना प्रौद्योगिकी, जैव-प्रौद्योगिकी, विनिर्माण और सेवा क्षेत्र का अभूतपूर्व विकास हुआ है। बेंगलुरु, हैदराबाद, चेन्नई और कोच्चि जैसे शहर आज वैश्विक अर्थव्यवस्था के केंद्र बन चुके हैं। इन शहरों में रहने वाले किसी भी नौजवान के लिए तरक्की की सीढ़ी अंग्रेजी भाषा से होकर गुजरती है, जो उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अवसरों से जोड़ती है। वहीं दूसरी ओर, उसका स्थानीय सामाजिक और व्यापारिक जीवन उसकी अपनी मातृभाषा में चलता है। ऐसे में उसके सामने यह एक बहुत बड़ा यक्ष प्रश्न खड़ा होता है कि वह अपने पाठ्यक्रम या जीवन में तीसरी भाषा के रूप में हिंदी को क्यों शामिल करे। क्या हिंदी सीखने से उसे कोई नया आर्थिक लाभ या रोजगार का अवसर मिलने वाला है। यथार्थ इसके बिल्कुल विपरीत है। आज उत्तर भारत के पिछड़े राज्यों से बड़े पैमाने पर श्रमिक और पेशेवर रोजगार की तलाश में दक्षिण के राज्यों की ओर पलायन कर रहे हैं। बाजार का यह नियम है कि जो व्यक्ति बेचने आता है या जिसे काम की जरूरत होती है, वह स्थानीय ग्राहक की भाषा सीखता है। इसलिए, दक्षिण के बाजारों में काम करने वाले उत्तर भारतीय प्रवासियों को वहां की स्थानीय भाषाएं सीखनी पड़ रही हैं, न कि दक्षिण के लोगों को हिंदी सीखने की कोई तात्कालिक आवश्यकता महसूस हो रही है। इस आर्थिक समीकरण ने हिंदी की उस कथित अनिवार्यता को पूरी तरह से अप्रासंगिक बना दिया है जिसे प्रशासनिक आदेशों के जरिए लागू करने की कोशिश की जाती है।
इसके अलावा, इस भाषाई विवाद के पीछे एक और गहरा और संवेदनशील राजनीतिक-वित्तीय आयाम है जो हाल के वर्षों में देश के संघीय ढांचे के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। दक्षिण भारत के राज्यों ने पिछले कुछ दशकों में जनसंख्या नियंत्रण, साक्षरता, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण के मानकों पर असाधारण प्रदर्शन किया है। लेकिन देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोकसभा सीटों का निर्धारण जनसंख्या के आधार पर होता है। आगामी वर्षों में होने वाले संभावित परिसीमन को लेकर दक्षिण के राज्यों में यह गंभीर चिंता है कि अपनी जनसंख्या को नियंत्रित करने और विकास करने की उन्हें एक राजनीतिक सजा मिलने वाली है, क्योंकि उत्तर भारत के राज्य अपनी बेकाबू आबादी के कारण संसद में अधिक सीटें पा जाएंगे और दक्षिण का राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा। इसी तरह, केंद्रीय करों के वितरण में भी यह देखा गया है कि दक्षिण के राज्यों द्वारा कमाए गए राजस्व का एक बड़ा हिस्सा उत्तर के हिंदी भाषी राज्यों के विकास पर खर्च किया जा रहा है। इस राजनीतिक और वित्तीय असंतुलन के माहौल में, जब केंद्र की ओर से हिंदी को बढ़ावा देने या उसे राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोने वाली एकमात्र भाषा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो दक्षिण के राज्यों को लगता है कि उनके अधिकारों, उनकी स्वायत्तता और उनकी भाषाई समानता की जानबूझकर उपेक्षा की जा रही है। यह डर केवल भाषा का नहीं है, बल्कि यह देश के संघीय ढांचे में अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता को बचाए रखने का एक अस्तित्वगत संघर्ष है।
लेकिन इस पूरे परिदृश्य का सबसे अनूठा और विरोधाभासी पहलू यह है कि जहां एक तरफ राजनीतिक, प्रशासनिक और नीतिगत स्तर पर हिंदी को थोपे जाने का कड़ा विरोध होता है, वहीं दूसरी तरफ दक्षिण भारत का ‘बाजार’ और वहां की आम जनता बिना किसी दबाव के, अपनी मर्जी से हिंदी को अपना रही है। यह इस बात का जीवंत प्रमाण है कि ‘थोपनी’ हमेशा हारती है लेकिन ‘बाजार’ हमेशा जीतता है। आज बेंगलुरु के आईटी पार्कों, हैदराबाद के वित्तीय जिलों या चेन्नई के बहुराष्ट्रीय कार्यालयों में उत्तर और दक्षिण भारत के पेशेवर एक साथ काम कर रहे हैं, जिससे एक सहज और मिश्रित संस्कृति का जन्म हो रहा है। इस सह-अस्तित्व ने आम बोलचाल की व्यावहारिक हिंदी को दक्षिण के महानगरों में एक स्वाभाविक स्थान दे दिया है। इसके साथ ही, डिजिटल मनोरंजन, ओटीटी प्लेटफॉर्म और सिनेमा की दुनिया ने भाषाई सीमाओं को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है। हाल के वर्षों में ‘पैन-इंडिया’ सिनेमा के उदय ने, जिसमें दक्षिण की फिल्मों को हिंदी पट्टी में रिकॉर्डतोड़ कामयाबी मिली और हिंदी की फिल्मों तथा वेब सीरीज को दक्षिण के दर्शकों ने चाव से देखा, यह साबित कर दिया है कि कला और संस्कृति किसी भौगोलिक या भाषाई बंधन को नहीं मानतीं। दक्षिण का युवा आज हिंदी गाने सुन रहा है, हिंदी शो देख रहा है, लेकिन वह ऐसा अपनी पसंद से कर रहा है, किसी कानून के डर से नहीं। जब भाषा एक विकल्प बनकर, एक पुल बनकर आती है, तो उसका स्वागत बाहें फैलाकर किया जाता है, लेकिन जब वही भाषा एक आदेश बनकर, एक दीवार बनकर खड़ी होती है, तो उसका विरोध होना निश्चित है।
यदि हमें वास्तव में हिंदी को देश की एक गौरवशाली संपर्क भाषा के रूप में स्थापित करना है, तो हमें ‘हिंदी के नाम पर राजनीति’ करने की प्रवृत्ति को छोड़ना होगा। हिंदी का विकास किसी अन्य भारतीय भाषा को दबाकर, उसे मिटाकर या उसे कमतर आंककर कभी नहीं हो सकता। भारत कोई एकरूपी राष्ट्र नहीं है, बल्कि यह विभिन्न संस्कृतियों, इतिहासों और भाषाओं का एक बेहद खूबसूरत और संवेदनशील गुलदस्ता है। इस गुलदस्ते की खूबसूरती तभी तक बनी रह सकती है जब तक हर फूल को खिलने की पूरी आजादी और सम्मान मिले। हिंदी दिवस मनाने का तरीका अब केवल हिंदी भाषी राज्यों तक सीमित रहने या गैर-हिंदी भाषियों को उपदेश देने का नहीं होना चाहिए। सच्ची प्रगति तब होगी जब उत्तर भारत के लोग, वहां के शैक्षणिक संस्थान और वहां का समाज भी दक्षिण की समृद्ध भाषाओं, जैसे तमिल, तेलुगु, कन्नड़ या मलयालम को सीखने की दिशा में कदम बढ़ाएगा। जब तक यह संवाद और सम्मान एकतरफा रहेगा, तब तक भाषाई तनाव की यह आंच सुलगती रहेगी। केंद्रीय स्तर पर भी नीति-नियंताओं को यह समझना होगा कि भारत को एकजुट रखने वाली शक्ति कोई एक भाषा नहीं बल्कि हमारा साझा लोकतांत्रिक मूल्य और एक-दूसरे के प्रति सम्मान की भावना है। हिंदी को एक शासक की भाषा के रूप में नहीं, बल्कि एक सखी के रूप में आगे बढ़ना होगा जो सभी भारतीय भाषाओं का हाथ थामकर चल सके। तभी हम एक अखंड, समरस और सच्चे अर्थों में विविधता से परिपूर्ण भारत का निर्माण कर पाएंगे, जहाँ हर नागरिक अपनी मातृभाषा में बोलते हुए भी गर्व से भारतीय कहलाने का हकदार होगा।





