राज्यसभा के लिये तीसरा प्रत्याशी न उतार अखिलेश ने दिया बड़ा सियासी संदेश

Akhilesh gave a big political message by not fielding a third candidate for Rajya Sabha.

स्वदेश कुमार

उत्तर प्रदेश की सियासत में जब भी कोई हलचल होती है, तो उसके मायने सिर्फ तात्कालिक नहीं होते, बल्कि वे दूरगामी राजनीतिक बिसात का हिस्सा होते हैं। राज्यसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की सभी 10 सीटों पर निर्विरोध निर्वाचन तय हो जाना और समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव द्वारा 06 सितंबर 2026 को तीसरा प्रत्याशी न उतारने की घोषणा करना, राज्य की राजनीति में एक बेहद सोची-समझी और रणनीतिक चाल का हिस्सा नजर आता है। भाजपा के आठ और सपा के दो प्रत्याशियों का निर्विरोध सांसद बनना अब लगभग तय हो चुका है। सपा के दोनों उम्मीदवार पहले ही अपना नामांकन दाखिल कर चुके हैं, जबकि भाजपा के सभी आठ प्रत्याशी भी मैदान में उतर चुके हैं। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक ध्यान अखिलेश यादव के उस सोशल मीडिया पोस्ट ने खींचा है, जिसमें उन्होंने लिखा कि तीन नहीं, हमारी निगाह 403 पर है। सपा प्रमुख का बयान सिर्फ एक पंक्ति नहीं, एक राजनीतिक बयान भी है, बल्कि यह सपा की आगामी चुनावी रणनीति, सांगठनिक समझ और भविष्य की राजनीतिक बिसात का एक बड़ा दस्तावेज़ है। इस फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों में यह सवाल तैर रहा है कि क्या सपा प्रमुख भाजपा के साथ सीधे टकराव से बच रहे हैं या फिर वह किसी बड़ी लड़ाई के लिए अपनी ऊर्जा और संसाधनों को बचा रहे हैं।

इस पूरे घटनाक्रम का गहन विश्लेषण करने पर सबसे पहली बात जो सामने आती है, वह है अखिलेश यादव का व्यावहारिक और यथार्थवादी राजनीतिक दृष्टिकोण। राज्यसभा चुनावों में गणित सबसे महत्वपूर्ण होता है। उत्तर प्रदेश विधानसभा में विधायकों की मौजूदा संख्या के हिसाब से भाजपा और उसके सहयोगी दल आसानी से आठ सीटें जीतने की स्थिति में थे, जबकि समाजवादी पार्टी के पास अपने दम पर दो सीटें जिताने के लिए पर्याप्त विधायक मौजूद थे। तीसरे प्रत्याशी को मैदान में उतारने का सीधा मतलब होता क्रॉस वोटिंग को बढ़ावा देना और एक ऐसी अनिश्चित लड़ाई में कूदना, जहां जीत की गारंटी बेहद कम थी। अतीत के अनुभवों, विशेषकर पिछले राज्यसभा चुनावों से सबक लेते हुए, जहां छोटे दलों की भूमिका और विधायकों की वफादारी में उतार-चढ़ाव ने सपा के समीकरण बिगाड़े थे, अखिलेश यादव ने इस बार कोई जोखिम न लेने का फैसला किया। इसे भाजपा से डरना या टकराव से बचना कहना राजनीतिक रूप से अपरिपक्वता होगी; वास्तव में यह एक रणनीतिक कदम है। राजनीति में हर लड़ाई लड़ने के लिए नहीं होती, कुछ लड़ाइयों से पीछे हटकर बड़ी जंग की तैयारी की जाती है। अखिलेश यादव ने तीसरे उम्मीदवार को न उतारकर यह संदेश दिया है कि वे अपनी ऊर्जा को किसी ऐसे मोर्चे पर ज़ाया नहीं करना चाहते, जहां परिणाम उनके नियंत्रण से बाहर हों।

अखिलेश यादव का यह बयान कि तीन नहीं, हमारी निगाह 403 पर है, सीधे तौर पर उत्तर प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर होने वाले आगामी आम चुनाव की ओर इशारा करता है। सपा प्रमुख यह भली-भांति जानते हैं कि राज्यसभा की एक अतिरिक्त सीट जीतना या उसके लिए जोड़-तोड़ करना एक अल्पकालिक सफलता हो सकती है, लेकिन असली सत्ता का रास्ता 403 विधानसभा सीटों से होकर ही गुजरता है। इस फैसले के जरिए वे अपने विधायकों और कार्यकर्ताओं को एक स्पष्ट संदेश दे रहे हैं कि उनका पूरा ध्यान राज्य की सत्ता में वापसी पर केंद्रित होना चाहिए, न कि राज्यसभा के संख्या बल के खेल में उलझने पर। यदि सपा तीसरा प्रत्याशी उतारती, तो उसे अपने सहयोगियों को एकजुट रखने, असंतुष्ट विधायकों को मनाने और भाजपा के साम-दाम-दंड-भेद के चक्रव्यूह से पार पाने में अपनी पूरी ताकत झोंकनी पड़ती। इससे पार्टी के भीतर आंतरिक असंतोष और गुटबाजी बढ़ने का खतरा भी रहता। निर्विरोध निर्वाचन का रास्ता साफ करके अखिलेश ने पार्टी के भीतर किसी भी संभावित अंतर्कलह को जन्म लेने से पहले ही खत्म कर दिया है, जिससे पार्टी की एकजुटता बनी रहे।

इसके अतिरिक्त, इस फैसले का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि सपा इस समय किसी भी तरह के नकारात्मक प्रचार से बचना चाहती है। यदि सपा तीसरा उम्मीदवार उतारती और चुनाव में हार जाती, तो भाजपा इसे अखिलेश यादव की संगठनात्मक विफलता और उनके गठबंधन की कमजोरी के रूप में प्रचारित करती। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले इस तरह की हार से कार्यकर्ताओं का मनोबल टूट सकता था और जनता के बीच यह संदेश जाता कि विपक्ष अभी भी भाजपा का मुकाबला करने में अक्षम है। इसके विपरीत, अपनी सीटों को सुरक्षित रखकर और भाजपा को उनकी वास्तविक संख्या बल के अनुसार सीटें दे देने से सपा ने खुद को एक परिपक्व और ज़िम्मेदार राजनीतिक दल के रूप में पेश किया है। यह कदम यह भी दर्शाता है कि अखिलेश यादव अब प्रतीकात्मक लड़ाइयों के बजाय केवल उन्हीं मोर्चों पर हाथ डालना चाहते हैं, जहां उनकी जीत की ठोस संभावना हो।

क्या अखिलेश यादव भाजपा के साथ सीधी टक्कर से बच रहे हैं? इस सवाल का जवाब हां में देना जल्दबाजी होगी। इसे टक्कर से बचना नहीं, बल्कि टक्कर के मैदान और समय का चुनाव खुद करना कहा जाएगा। राजनीति का एक बुनियादी नियम है कि दुश्मन के चुने हुए मैदान पर कभी नहीं लड़ना चाहिए। राज्यसभा का मैदान फिलहाल भाजपा के अनुकूल था, क्योंकि सत्ता और संसाधनों के बल पर वह निर्दलीयों या छोटे दलों के विधायकों को अपने पाले में करने में सक्षम थी। अखिलेश यादव ने इस मैदान को छोड़कर सीधे जनता की अदालत यानी विधानसभा चुनाव के मैदान को चुना है, जहां वे भाजपा को घेरने की बेहतर स्थिति में होंगे। इस निर्णय से समाजवादी पार्टी ने अपने कोर वोट बैंक और सहयोगियों को भी एक सकारात्मक संदेश दिया है।