रेहड़ी वाली पर कार्रवाई, शोरूमों पर भी नजर हो

Action taken against the street vendor; showrooms should also be under scrutiny

डॉ. प्रियंका सौरभ

हिसार में अतिक्रमण हटाने के नाम पर एक रेहड़ी वाली महिला का सामान फेंके जाने का दृश्य सामने आता है तो सवाल केवल एक महिला की रेहड़ी का नहीं रह जाता, बल्कि पूरे प्रशासनिक रवैये पर उठता है। शहर को अतिक्रमण मुक्त करना नगर निगम की जिम्मेदारी है और सार्वजनिक सड़कों, फुटपाथों तथा रास्तों पर कब्जे हटाए जाने चाहिए। लेकिन कानून की असली परीक्षा तब होती है, जब उसके सामने कोई प्रभावशाली व्यक्ति नहीं, बल्कि रोज कमाकर परिवार चलाने वाली गरीब महिला खड़ी हो। नियम सबके लिए समान हैं तो कार्रवाई का तरीका और पैमाना भी सबके लिए समान होना चाहिए।

अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई यदि जरूरी है तो वह दुकानदार, रेहड़ी वाला, शोरूम मालिक या किसी भी अन्य व्यक्ति के लिए समान रूप से होनी चाहिए। सड़क पर कुछ फीट तक सामान फैलाकर बैठी रेहड़ी को अतिक्रमण मानना उचित है तो दुकान के बाहर फुटपाथ और सड़क तक फैलाया गया सामान भी उसी कसौटी पर परखा जाना चाहिए। शोरूमों के बाहर लगे बड़े बोर्ड, अस्थायी ढांचे, सामान रखने के लिए घेरा गया स्थान और सड़क की सीमा तक फैला व्यापार भी शहर की सार्वजनिक जगह को प्रभावित करता है। सवाल यह नहीं कि किसके खिलाफ कार्रवाई हुई; सवाल यह है कि क्या हर अतिक्रमण के खिलाफ समान कार्रवाई हो रही है?

गरीब की रेहड़ी दिखाई देना आसान है, लेकिन बड़े प्रतिष्ठानों का कब्जा अक्सर व्यवस्था की आंखों के सामने भी सामान्य मान लिया जाता है। यदि ऐसा कहीं हो रहा है तो यह प्रशासन की निष्पक्षता के लिए गंभीर प्रश्न है। नगर निगम को बाजारवार सर्वे कर यह सार्वजनिक करना चाहिए कि निर्धारित सीमा से बाहर कौन-कौन से कब्जे हैं और उनके खिलाफ क्या कार्रवाई की गई। इससे किसी भी कार्रवाई पर पक्षपात का सवाल उठने की गुंजाइश कम होगी।

रेहड़ी-पटरी पर कारोबार करने वाले लोग शहर की अर्थव्यवस्था का भी हिस्सा हैं। सब्जी, फल, कपड़े, खाने-पीने की वस्तुएं या छोटे घरेलू सामान बेचने वाले अनेक लोग अपनी छोटी-सी पूंजी से परिवार चलाते हैं। इनमें बड़ी संख्या महिलाओं की भी है। उनके लिए रेहड़ी केवल व्यापार का साधन नहीं, बल्कि घर की आय का महत्वपूर्ण स्रोत होती है। इसलिए यदि कोई रेहड़ी निर्धारित स्थान पर नहीं लग सकती तो उसे हटाने से पहले नियमों के अनुरूप वैकल्पिक व्यवस्था की दिशा में भी सोचना चाहिए।

हरियाणा में स्ट्रीट वेंडरों के लिए कानूनी व्यवस्था मौजूद है। सर्वे, पंजीकरण, वेंडिंग जोन और टाउन वेंडिंग कमेटी जैसी व्यवस्थाओं का उद्देश्य यही है कि सड़क किनारे होने वाले छोटे कारोबार को पूरी तरह अनियंत्रित भी न छोड़ा जाए और गरीब विक्रेताओं की आजीविका भी अनावश्यक रूप से न छीनी जाए। इसलिए प्रशासन को अतिक्रमण और वैध स्ट्रीट वेंडिंग के बीच स्पष्ट अंतर करना होगा।

सबसे महत्वपूर्ण बात है व्यवहार की भाषा। नियम तोड़े जाने पर सामान हटाया जा सकता है, चालान किया जा सकता है और कानून के अनुसार जब्ती की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। लेकिन किसी महिला के साथ अपमानजनक भाषा, धक्का-मुक्की या अमानवीय व्यवहार किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता। प्रशासनिक अधिकार नागरिक के सम्मान से बड़ा नहीं हो सकता।

यदि सामने आए वीडियो में दिखाई दे रहा व्यवहार वास्तविक घटना का हिस्सा है, तो पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। वीडियो के एक हिस्से के आधार पर अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा, लेकिन वीडियो सामने आने के बाद जांच से बचना भी उचित नहीं होगा। नगर निगम को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उस दिन क्या कार्रवाई हुई, किस अधिकारी या कर्मचारी की ड्यूटी थी, महिला को पहले कोई सूचना दी गई थी या नहीं, सामान जब्त करने की क्या प्रक्रिया अपनाई गई और बाद में उसे सामान वापस लेने का अवसर दिया गया या नहीं।

यदि जांच में किसी अधिकारी या कर्मचारी द्वारा नियमों का उल्लंघन या अभद्र व्यवहार सिद्ध होता है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। कार्रवाई का उद्देश्य अधिकारियों का मनोबल गिराना नहीं, बल्कि प्रशासनिक अधिकारों के जिम्मेदार इस्तेमाल का संदेश देना होना चाहिए। जिस प्रकार अतिक्रमण करने वाले से नियमों का पालन अपेक्षित है, उसी प्रकार कार्रवाई करने वाले अधिकारी से भी कानून और मर्यादा का पालन अपेक्षित है।

सवाल यह भी है कि क्या अतिक्रमण हटाने के अभियान की शुरुआत केवल छोटी रेहड़ियों से होनी चाहिए? यदि शहर को वास्तव में व्यवस्थित करना है तो नगर निगम को एक व्यापक और पारदर्शी अभियान चलाना चाहिए। फुटपाथों पर बने स्थायी-अस्थायी कब्जे, दुकानों के बाहर फैला सामान, सड़क तक निकले बोर्ड, अस्थायी निर्माण और अन्य व्यावसायिक अतिक्रमण—सबकी एक समान जांच हो। कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक की जाए ताकि नागरिकों को भी पता चले कि नियम केवल कमजोर पर लागू नहीं होते।

शहर की सुंदरता का अर्थ केवल चमकते शोरूम नहीं है। जिस फुटपाथ पर किसी बड़े ब्रांड का सामान फैलता है, वह भी जनता का है और जिस फुटपाथ पर कोई गरीब महिला छोटी-सी रेहड़ी लगाती है, वह भी जनता का है। सार्वजनिक स्थान पर अधिकार का निर्धारण आर्थिक हैसियत से नहीं, कानून से होना चाहिए।

नगर निगम चाहे तो इस पूरे विवाद को एक अवसर में बदल सकता है। शहर के सभी बाजारों का डिजिटल सर्वे कराया जाए। प्रत्येक दुकान और शोरूम की स्वीकृत सीमा स्पष्ट की जाए। रेहड़ी-पटरी वालों के लिए निर्धारित वेंडिंग जोन बनाए जाएं। पैदल यात्रियों के लिए फुटपाथ खाली रखे जाएं। नियमों का उल्लंघन करने वालों को पहले स्पष्ट सूचना दी जाए और फिर निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार कार्रवाई हो। महिलाओं और कमजोर वर्गों के मामलों में मानवीय व्यवहार सुनिश्चित किया जाए।

अतिक्रमण हटाना जरूरी है, लेकिन अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया स्वयं अन्याय का कारण नहीं बननी चाहिए। शहर में व्यवस्था चाहिए, मगर ऐसी व्यवस्था नहीं जिसमें गरीब की रोजी सड़क पर बिखरी दिखाई दे और बड़े कब्जे नजरअंदाज होते रहें।

हिसार प्रशासन और नगर निगम को यह संदेश स्पष्ट रूप से देना चाहिए कि कानून की नजर में रेहड़ी और शोरूम अलग-अलग नागरिक नहीं हैं। नियम अलग-अलग नहीं हो सकते।

यदि किसी गरीब महिला से गलती हुई है तो उसे कानून के अनुसार समझाया और दंडित किया जा सकता है; लेकिन उसका अपमान नहीं किया जा सकता। और यदि किसी बड़े प्रतिष्ठान ने सार्वजनिक स्थान पर कब्जा किया है तो उसके खिलाफ भी वही दृढ़ता दिखाई जानी चाहिए।

शहर को अतिक्रमण मुक्त करना है तो पहले कार्रवाई का पैमाना समान कीजिए।
सड़क खाली कराइए, लेकिन किसी गरीब की गरिमा मत कुचलिए।
हिसार को व्यवस्थित भी बनाइए और संवेदनशील भी।