डॉ वंदना शर्मा
भारत आज दुनिया का सबसे युवा देश है। 140 करोड़ की आबादी में 65 प्रतिशत लोग 35 साल से कम उम्र के हैं। यह हमारी सबसे बड़ी ताकत है। लेकिन यही ताकत आज सबसे बड़ी चुनौती भी बन गई है। हर गली, हर चाय की दुकान और हर घर में एक ही सवाल गूंज रहा है – रोजगार कहाँ है?
बढ़ती बेरोजगारी केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं है, यह सामाजिक अशांति की जड़ है। खाली हाथ और खाली दिमाग ही अपराध को जन्म देता है। यह कटु सत्य है कि आज देश में बढ़ रहे अपराध, नशा और हताशा के पीछे कहीं न कहीं रोजगार का अभाव एक बहुत बड़ा कारण है। जब एक पढ़ा-लिखा नौजवान सालों तक नौकरी के लिए भटकता है, तो उसका व्यवस्था से विश्वास उठने लगता है।
इस समस्या की जड़ में हमें अपनी शिक्षा व्यवस्था को ईमानदारी से देखना होगा। आज हमारी शिक्षा का उद्देश्य क्या रह गया है? केवल एक अच्छी नौकरी पा लेना। शिक्षा का असली अर्थ – चरित्र निर्माण, सर्वांगीण विकास, नैतिक मूल्यों का विकास – कहीं पीछे छूट गया है। हम बच्चे को इसलिए नहीं पढ़ा रहे कि वो एक अच्छा और आत्मनिर्भर इंसान बने, हम उसे इसलिए पढ़ा रहे हैं ताकि उसे एक सुरक्षित नौकरी मिल जाए। हम डिग्री तो दे रहे हैं, हुनर नहीं दे रहे।
इसी सोच को बदलने की जरूरत है। नई शिक्षा नीति 2020 में भी इसी बात पर जोर दिया गया है। मेरा मानना है कि पांचवीं कक्षा के बाद से ही बच्चों को उनकी रुचि के अनुसार शिक्षा दी जानी चाहिए। हर बच्चे को जबरदस्ती डॉक्टर-इंजीनियर बनाने की दौड़ से निकालना होगा। यदि किसी बच्चे की रुचि बढ़ईगिरी में है, किसी की खेती में, किसी की संगीत में, किसी की कोडिंग या मशीनरी में, तो उसे उसी क्षेत्र की शिक्षा दी जाए।
कल्पना कीजिए, यदि हमारे स्कूलों में शिल्प कला, जैविक कृषि तकनीक, लघु उद्योग, इलेक्ट्रॉनिक रिपेयरिंग, प्लंबिंग, डिजिटल मार्केटिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे विषयों की व्यावहारिक शिक्षा छठी कक्षा से ही शुरू हो जाए, तो क्या होगा? बच्चा दसवीं तक आते-आते अपने हुनर में माहिर हो जाएगा। उसे रोजगार के लिए किसी डिग्री का मोहताज नहीं होना पड़ेगा। वह स्वयं रोजगार का निर्माता बन सकता है। सरकार की स्किल इंडिया और प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना इसी दिशा में अच्छा कदम है, पर इसे स्कूल के पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाना होगा।
आज पूरी दुनिया भारत की ओर देख रही है। विदेशी कंपनियां भारत में निवेश करने के लिए उत्सुक हैं। वे यहाँ कारखाने लगाना चाहती हैं क्योंकि भारत में श्रम और संसाधन हैं, और भारतीय युवा ऊर्जावान है। यह हमारे लिए सुनहरा अवसर है।
लेकिन दुर्भाग्य यह है कि हम अपनी ताकत को पहचान नहीं पा रहे। हम सिर्फ नौकरी के पीछे भाग रहे हैं। हर युवा के मन में एक ही सपना है – कहीं सरकारी नौकरी लग जाए। मेरा सवाल है, नौकरी करनी ही क्यों है? मालिक बनो, अपना रोजगार स्वयं बनाओ और दूसरों को भी रोजगार दो। यह मानसिकता जब तक नहीं बदलेगी, तब तक बेरोजगारी की समस्या हल नहीं होगी। स्टार्टअप इंडिया ने यह दिखाया है कि एक छोटा सा आइडिया भी सैकड़ों लोगों को रोजगार दे सकता है।
हमें चीन, जापान और जर्मनी से सीखना चाहिए। चीन की जनसंख्या हमसे अधिक थी, लेकिन वहां कोई काम छोटा नहीं समझा जाता। वहां अमीरों के बच्चे भी वेटर, डिलीवरी बॉय या फैक्ट्री में काम करते हैं। जर्मनी में 60% बच्चे हाई स्कूल के बाद वोकेशनल ट्रेनिंग में जाते हैं, सीधे कंपनी में काम सीखते हैं। उनके मन में श्रम को लेकर कोई हीन भावना नहीं है। वहाँ कार्य का सम्मान करना सिखाया जाता है।
मेरी व्यक्तिगत राय है कि भारत में भी बच्चों को कार्य का सम्मान करना सिखाना चाहिए। 16 वर्ष की उम्र से ही उन्हें अपना पॉकेटमनी खुद कमाना सिखाना चाहिए। इससे दो फायदे होंगे। पहला, बच्चा पैसे की कीमत समझेगा। दूसरा, उसमें आत्मनिर्भरता आएगी। भारतीय अभिभावकों को बच्चों को 25-26 साल तक केवल किताबी पढ़ाई करवाकर घर में बिठाए रखना प्यार नहीं, बल्कि उनके भविष्य के साथ अन्याय
मेरे चार ठोस सुझाव हैं:
- हर जिले में कम से कम एक ऐसा मॉडल स्कूल हो जहां पढ़ाई के साथ-साथ 10-12 तरह के लघु उद्योगों की ट्रेनिंग दी जाए।
- बी.ए., एम.ए. की भीड़ बढ़ाने से बेहतर है कि कॉलेज के अंतिम वर्ष में 6 महीने की अनिवार्य अप्रेंटिसशिप किसी कंपनी, खेत या वर्कशॉप में की जाए।
- उच्च शिक्षा को सीमित और गुणवत्तापूर्ण बनाना: उच्च शिक्षा में वही बच्चे जाएं जिन्हें वास्तव में इंजीनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक या टीचर बनना है। बाकी युवाओं के लिए स्किल यूनिवर्सिटी का रास्ता खोला जाए।
- अभिभावकों की काउंसलिंग भी की जाए।स्कूलों में बच्चों के साथ-साथ माता-पिता की भी काउंसलिंग हो कि हर बच्चा टॉपर नहीं बन सकता, पर हर बच्चा हुनरमंद जरूर बन सकता है।
सरकार क्या कर सकती है? ये महत्वपूर्ण नहीं ये महत्वपूर्ण है प्रत्येक व्यक्ति क्या योगदान दे सकता है देश के विकास के लिए।सरकार सिर्फ कानून, योजना और संसाधन दे सकती है। लेकिन जागरूक जनता और सभ्य नागरिक ही राष्ट्र निर्माण कर सकते हैं। सिर्फ आंदोलन और विरोध करने से देश की तस्वीर नहीं बदलेगी। देश का हर नागरिक स्वयं को बदलने की जिम्मेदारी ले, देश को स्वच्छ रखे और स्वयं को सशक्त बनाने का प्रयास करे तो देश का विकास स्वतः ही हो जाएगा।
अंत में हिंदी के महान कवि दुष्यंत कुमार की एक पंक्ति याद आती है जो इस पूरे लेख के सार को समेटती है –
“सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।”
हमें हंगामा नहीं करना ,सूरत बदलनी है। और सूरत तब बदलेगी जब शिक्षा का अर्थ नौकरी नहीं, हुनर होगा और युवा का लक्ष्य नौकरी पाना नहीं, बल्कि रोजगार देना होगा।





