स्वदेश कुमार
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में मीडिया की भूमिका समाज को आईना दिखाने, सत्ता से तीखे सवाल करने और देशहित सर्वोपरि रखने की होती है। लेकिन वर्तमान समय में जनता के बीच यह गंभीर चिंता और विमर्श का विषय बन चुका है कि क्या आज का मीडिया अपनी इस मूल जिम्मेदारी को समझ पा रहा है। अक्सर यह देखा जाता है कि जिन नेताओं या शख्सियतों को जनता ने चुनावों में ठुकरा दिया है या जो जनभावनाओं पर खरे नहीं उतरे, उन्हें भी समाचार माध्यमों पर लगातार बड़ी सुर्खियां और विशेष कवरेज दी जाती है। इस विमर्श के केंद्र में यह सवाल खड़ा होता है कि क्या मीडिया जानबूझकर देशहित की अनदेखी कर किसी व्यक्ति विशेष को प्रमोट कर रहा है या फिर इसके पीछे कुछ गहरे व्यावसायिक और राजनीतिक समीकरण काम कर रहे हैं।इस पूरी स्थिति को समझने के लिए सबसे पहले हमें मीडिया के आधुनिक ढाँचे और उसके राजस्व मॉडल को देखना होगा। आज की पत्रकारिता केवल सूचना के आदान-प्रदान का माध्यम नहीं रह गई है, बल्कि वह एक बड़े उद्योग में तब्दील हो चुकी है। इस कॉर्पोरेट ढाँचे में टीआरपी (टेलीविज़न रेटिंग पॉइंट) और डिजिटल क्लिक्स ही सब कुछ तय करते हैं। जब कोई न्यूज़ चैनल या डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म किसी सनसनीखेज व्यक्तित्व, भले ही वह जनता द्वारा नकारा गया हो, को बार-बार स्क्रीन पर लाता है, तो उसके पीछे मुख्य उद्देश्य दर्शकों का ध्यान खींचना होता है। विवाद, तीखे बयान और राजनीतिक ड्रामा दर्शकों को आकर्षित करते हैं, जिससे चैनलों की रेटिंग बढ़ती है और उन्हें विज्ञापन मिलते हैं। इस प्रक्रिया में देशहित के गंभीर मुद्दे, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोज़गारी और बुनियादी विकास, पीछे छूट जाते हैं और मीडिया का झुकाव केवल उन चेहरों की तरफ हो जाता है, जो व्यावसायिक रूप से फायदेमंद होते हैं।
इसके अलावा, आज के मीडिया परिदृश्य में एजेंडा सेटिंग और मीडिया के मालिकाना हक की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण हो गई है। कई बड़े मीडिया घरानों का स्वामित्व सीधे या परोक्ष रूप से उन कॉर्पोरेट समूहों या प्रभावशाली लोगों के हाथों में है, जिनके अपने विशिष्ट व्यावसायिक या राजनीतिक हित होते हैं। जब मीडिया का ढाँचा कुछ चुनिंदा हाथों में सिमट जाता है, तो निष्पक्षता की उम्मीद करना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में किसी खास राजनेता या दल को बढ़ावा देना, चाहे वह सत्ता में हो या विपक्ष में और चाहे जनता ने उसे कितना भी नकारा हो, उस मीडिया घराने के दीर्घकालिक हितों का हिस्सा हो सकता है। यह स्थिति सीधे तौर पर देशहित से समझौता करती है, क्योंकि जनता को वह सच नहीं दिखाया जाता, जो उनके लिए ज़रूरी है, बल्कि वह नैरेटिव परोसा जाता है, जो किसी व्यक्ति या संगठन के अनुकूल हो।इस प्रवृत्ति को क्या देश के साथ बड़ी बेईमानी कहा जा सकता है, इसे विश्लेषणात्मक दृष्टि से देखना होगा। जब मीडिया प्रशासन और जनता के बीच एक ईमानदार पुल का काम करने के बजाय किसी व्यक्ति विशेष की पीआर (पब्लिक रिलेशंस) एजेंसी की तरह व्यवहार करने लगता है, तो यह निश्चित रूप से लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों के साथ एक बड़ा विश्वासघात है। जनता समाचारों को सत्य मानकर अपने लोकतांत्रिक निर्णय लेती है। यदि उसे बार-बार केवल एक ही पक्ष या किसी खास अप्रासंगिक चेहरे को ही सबसे बड़े मसीहा या मुख्य बिंदु के रूप में दिखाया जाएगा, तो जनमानस की सोचने-समझने की क्षमता प्रभावित होती है। यह देशहित के साथ इसलिए बेईमानी है, क्योंकि यह वास्तविक मुद्दों से जनता का ध्यान भटका कर देश के विकास की गति को धीमा करता है।
हालाँकि, इस सिक्के का एक दूसरा पहलू भी है। लोकतंत्र में विपक्ष और असहमत आवाज़ों की मौजूदगी अनिवार्य है। कई बार मीडिया उन नेताओं को भी मंच देता है, जो चुनाव हार चुके होते हैं या जनता के एक बड़े वर्ग द्वारा नापसंद किए जाते हैं, ताकि सत्ता पक्ष की नीतियों पर एक वैकल्पिक दृष्टिकोण सामने आ सके। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है, जब यह संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाता है और जनसरोकार के मुद्दों को पूरी तरह दरकिनार करके केवल राजनीतिक नूराकुश्ती और व्यक्ति-केंद्रित बहसों को ही चौबीसों घंटे प्रसारित किया जाता है। यह स्थिति इस बात का संकेत है कि मीडिया अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से विमुख हो रहा है।लब्बोलुआब यह है कि ऐसी स्थिति केवल मीडिया की ही नहीं, बल्कि दर्शकों के रूप में समाज की भी परीक्षा लेती है। जब तक दर्शक सनसनीखेज खबरों और व्यक्ति-विशेष के प्रचार को देखना बंद नहीं करेंगे, तब तक व्यावसायिक कारणों से मीडिया अपनी इस कार्यशैली को नहीं बदलेगा। आज की पत्रकारिता में विश्वसनीयता और तटस्थता की जो कमी दिख रही है, उसे दूर करने के लिए मीडिया घरानों को आत्ममंथन करने और देशहित को अपने व्यावसायिक लाभ से ऊपर रखने की सख्त आवश्यकता है, ताकि लोकतंत्र का यह चौथा स्तंभ अपनी पवित्रता और जनता का विश्वास बनाए रख सके।





