डॉ. प्रियंका सौरभ
वन्यजीव किसी देश की प्राकृतिक संपदा भर नहीं होते, बल्कि वे उसके पारिस्थितिक तंत्र की जीवंत कड़ियाँ हैं। जंगल, घासभूमि, आर्द्रभूमि, नदियाँ और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र तभी संतुलित रह सकते हैं, जब उनमें रहने वाली विभिन्न प्रजातियाँ सुरक्षित रहें। भारत जैव-विविधता की दृष्टि से दुनिया के महत्वपूर्ण देशों में शामिल है। यहाँ हिमालय से लेकर पश्चिमी घाट, थार के मरुस्थल से लेकर सुंदरबन और अंडमान-निकोबार तक विविध प्रकार के आवास पाए जाते हैं। ऐसे में वन्यजीव संरक्षण केवल कुछ दुर्लभ प्रजातियों को बचाने का प्रयास नहीं, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों और मानव जीवन की सुरक्षा का भी प्रश्न है। राजस्थान में कैद में पाले गए ग्रेट इंडियन बस्टर्ड यानी गोडावण को वैज्ञानिक तरीके से पुनः प्राकृतिक आवास में स्थापित करने के प्रयास इस बात का उदाहरण हैं कि भारत अब संरक्षण में पारंपरिक उपायों के साथ वैज्ञानिक हस्तक्षेपों को भी महत्व दे रहा है।
वन्यजीव संरक्षण का पहला और सबसे स्पष्ट महत्व जैव-विविधता की रक्षा है। प्रत्येक प्रजाति पारिस्थितिक तंत्र में किसी न किसी भूमिका का निर्वहन करती है। किसी प्रजाति का विलुप्त होना केवल एक जीव के समाप्त होने की घटना नहीं होती, बल्कि उसके साथ जुड़ी अनेक जैविक प्रक्रियाएँ भी प्रभावित हो सकती हैं। ग्रेट इंडियन बस्टर्ड जैसी गंभीर रूप से संकटग्रस्त प्रजाति का संरक्षण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके अस्तित्व के साथ उसके पूरे घासभूमि आवास का संरक्षण जुड़ा हुआ है। इसी प्रकार बाघ के संरक्षण ने भारत में बड़े वन क्षेत्रों, शिकार प्रजातियों और संपूर्ण खाद्य-श्रृंखला की सुरक्षा को बढ़ावा दिया है। इसलिए किसी ‘छत्र प्रजाति’ का संरक्षण अनेक अन्य प्रजातियों के लिए भी सुरक्षा कवच बन सकता है।
वन्यजीव पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। शिकारी प्रजातियाँ शाकाहारी जीवों की संख्या को नियंत्रित करती हैं, परागणकर्ता पौधों के प्रजनन में सहायता करते हैं और अनेक पक्षी तथा छोटे जीव बीजों के प्रसार में योगदान देते हैं। यदि खाद्य-श्रृंखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी कमजोर हो जाए तो उसका प्रभाव पूरे पारिस्थितिक तंत्र पर पड़ सकता है। स्वस्थ वन और घासभूमियाँ जल संरक्षण, मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने और कार्बन को अवशोषित करने में भी योगदान देती हैं। इस प्रकार वन्यजीव संरक्षण जलवायु और पर्यावरणीय सुरक्षा से भी सीधे जुड़ा हुआ है।
वन्यजीवों का संरक्षण मानव समाज के लिए अनेक पारिस्थितिकी सेवाएँ भी सुनिश्चित करता है। वनों और आर्द्रभूमियों का संरक्षण जल को संचित करने, भूजल पुनर्भरण, बाढ़ नियंत्रण और तापमान को संतुलित करने में सहायता करता है। मधुमक्खियों, तितलियों और अन्य परागणकर्ताओं का संरक्षण कृषि उत्पादकता से जुड़ा है। इसी प्रकार प्राकृतिक आवास कार्बन भंडारण में योगदान देकर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में सहायता करते हैं। इसलिए प्रकृति की रक्षा को केवल पर्यावरणीय दायित्व समझना पर्याप्त नहीं; यह खाद्य, जल और आजीविका की सुरक्षा का भी आधार है।
वन्यजीव संरक्षण का आर्थिक महत्व भी कम नहीं है। राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य और टाइगर रिजर्व प्रकृति-आधारित पर्यटन को बढ़ावा देते हैं, जिससे स्थानीय समुदायों के लिए रोजगार और आय के अवसर पैदा होते हैं। यदि पर्यटन का विकास स्थानीय लोगों की भागीदारी और पर्यावरणीय सीमाओं के अनुरूप किया जाए तो संरक्षण और आजीविका एक-दूसरे के पूरक बन सकते हैं। इसके अतिरिक्त वन्यजीव भारत की सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत का हिस्सा हैं। आने वाली पीढ़ियों को बाघ, हाथी, गोडावण, गैंडा, सिंह और अनेक पक्षी-प्रजातियाँ उसी प्राकृतिक परिवेश में दिखाई दें, यह हमारी पीढ़ी की जिम्मेदारी है।
हालाँकि वन्यजीव संरक्षण के सामने चुनौतियाँ गंभीर हैं। सबसे बड़ी चुनौती आवासों का क्षरण और विखंडन है। बढ़ती आबादी, कृषि विस्तार, खनन, सड़क, रेल, उद्योग और अन्य आधारभूत परियोजनाओं के कारण वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास सिकुड़ रहे हैं। अलग-अलग हिस्सों में बँट चुके जंगल जानवरों की आवाजाही और प्रजनन को प्रभावित करते हैं। विशेष रूप से हाथी, बाघ और तेंदुए जैसी बड़ी प्रजातियों के लिए वन्यजीव गलियारों का सुरक्षित रहना आवश्यक है।
आधुनिक आधारभूत ढाँचा विकास के साथ एक नई चुनौती भी सामने आई है। सड़क और रेल दुर्घटनाएँ, विद्युत लाइनों से टकराव तथा ऊर्जा अवसंरचना कई पक्षी और अन्य वन्यजीव प्रजातियों के लिए खतरा बन सकती है। ग्रेट इंडियन बस्टर्ड इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। इसके संरक्षण के लिए केवल पक्षियों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा; उसके प्राकृतिक आवास में मौजूद खतरों को भी कम करना होगा। इससे स्पष्ट होता है कि संरक्षण नीति को प्रजाति-केंद्रित होने के साथ-साथ लैंडस्केप-केंद्रित भी होना चाहिए।
मानव-वन्यजीव संघर्ष भी संरक्षण के सामने बड़ी चुनौती है। जब हाथी खेतों में प्रवेश करते हैं, तेंदुए आबादी के निकट दिखाई देते हैं या जंगली जानवर फसलों को नुकसान पहुँचाते हैं, तो स्थानीय लोगों के सामने वास्तविक आर्थिक और सुरक्षा संबंधी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। यदि संरक्षण का लाभ स्थानीय समुदायों तक नहीं पहुँचता, तो संरक्षण के प्रति असंतोष पैदा हो सकता है। इसी तरह अवैध शिकार और वन्यजीवों की तस्करी कुछ प्रजातियों के लिए लगातार खतरा बनी हुई है। जलवायु परिवर्तन इस चुनौती को और जटिल बनाता है क्योंकि तापमान और वर्षा के बदलते पैटर्न से कई प्रजातियों के पारंपरिक आवास प्रभावित हो रहे हैं।
ऐसे में आगे की रणनीति बहुआयामी होनी चाहिए। सबसे पहले प्राकृतिक आवासों की रक्षा के साथ-साथ क्षतिग्रस्त आवासों का पुनर्स्थापन किया जाए। वन्यजीव गलियारों की वैज्ञानिक पहचान कर उन्हें सुरक्षित किया जाना चाहिए। विकास परियोजनाओं की पर्यावरणीय स्वीकृति में केवल किसी एक संरक्षित क्षेत्र को नहीं, बल्कि पूरे लैंडस्केप और वन्यजीवों की आवाजाही को ध्यान में रखा जाना आवश्यक है। जहाँ वैज्ञानिक रूप से उपयुक्त हो, वहाँ कैप्टिव ब्रीडिंग, जीन बैंक, रेडियो-टैगिंग, कैमरा ट्रैप और अन्य आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जाए। गोडावण जैसे संकटग्रस्त पक्षियों के लिए प्रजनन और पुनर्स्थापन कार्यक्रम तभी सफल होंगे, जब उनके प्राकृतिक आवास को भी सुरक्षित रखा जाए।
स्थानीय समुदायों की भागीदारी संरक्षण की सबसे महत्वपूर्ण शर्तों में से एक है। ग्रामीणों को केवल संरक्षण नियमों का पालन करने वाला समूह मानने के बजाय उन्हें संरक्षण का भागीदार बनाया जाना चाहिए। इको-टूरिज्म, स्थानीय हस्तशिल्प, प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित टिकाऊ आजीविका और संरक्षण से जुड़े रोजगार के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं। मानव-वन्यजीव संघर्ष की स्थिति में त्वरित और पारदर्शी मुआवजा व्यवस्था तथा स्थानीय स्तर पर त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र भी आवश्यक है।
अंततः वन्यजीव संरक्षण को ‘जानवर बचाने’ की सीमित अवधारणा से आगे ले जाने की आवश्यकता है। असल लक्ष्य उन जंगलों, घासभूमियों, आर्द्रभूमियों और जैविक गलियारों को सुरक्षित रखना है, जिन पर असंख्य प्रजातियों और मनुष्य का भविष्य निर्भर है। वैज्ञानिक अनुसंधान, आधुनिक तकनीक, कठोर कानून, सुरक्षित आवास और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी—इन सभी को एक साथ लेकर चलना होगा। भारत की विकास यात्रा तभी टिकाऊ कही जाएगी, जब उसमें प्रकृति के लिए भी पर्याप्त स्थान हो। वन्यजीवों को बचाना वास्तव में उस पारिस्थितिक व्यवस्था को बचाना है, जो अंततः मनुष्य के अस्तित्व की भी आधारशिला है।





