विदेशी विश्वविद्यालय : अवसरों का नया दौर या चुनौतियों की शुरुआत होगी

Foreign Universities: A New Era of Opportunities or the Onset of Challenges?

देश में विदेशी विश्वविद्यालयों की एंट्री उच्च शिक्षा के लिए बड़ा मौका है। इससे छात्रों को घर बैठे ग्लोबल डिग्री, बेहतर रिसर्च और इंटरनेशनल एक्सपोजर मिल सकता है। लेकिन यह बदलाव तभी सार्थक होगा, जब इसका फायदा सिर्फ चुनिंदा छात्रों तक सीमित न रह जाए, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र को मजबूत बनाए। भारत को सिर्फ विदेशी कैंपस नहीं, बल्कि ऐसे विश्वविद्यालय चाहिए जो दुनिया के लिए भी आकर्षण का केंद्र बनें।

राजेश जैन

देश की उच्च शिक्षा एक नए मोड़ पर खड़ी है। पहली बार दुनिया के नामी विदेशी विश्वविद्यालय भारत में अपने कैंपस खोल रहे हैं। केंद्र सरकार अब तक 15 विदेशी विश्वविद्यालयों को लेटर ऑफ इंटेंट जारी कर चुकी है। इनमें से अधिकांश अगस्त से अपना पहला बैच शुरू करेंगे। यानी अब विदेशी डिग्री पाने के लिए हर छात्र को विदेश जाने की जरूरत नहीं होगी।

सुनने में यह बदलाव किसी गेम चेंजर से कम नहीं लगता। ग्लोबल डिग्री, इंटरनेशनल फैकल्टी, वर्ल्ड क्लास सिलेबस, आधुनिक लैब, रिसर्च का माहौल और विदेश से कम खर्च। लेकिन हर चमकती चीज़ सोना नहीं होती। असली सवाल यह है कि क्या इससे भारत की पूरी उच्च शिक्षा व्यवस्था बदलेगी, या यह सुविधा सिर्फ एक नए प्रीमियम एजुकेशन मार्केट तक सिमट जाएगी?

नई शिक्षा नीति-2020 ने भारत को ग्लोबल स्टडी डेस्टिनेशन बनाने का सपना देखा है। विदेशी विश्वविद्यालयों का आगमन उसी विज़न का हिस्सा है। सवाल सिर्फ इतना नहीं कि विदेशी विश्वविद्यालय आएंगे, बल्कि यह भी है कि उनके आने से भारत कितना बदलेगा।

मौका बड़ा है

हमारा देश दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में है। हर साल लाखों छात्र बेहतर पढ़ाई के लिए विदेश जाते हैं। केवल 2023 में लगभग नौ लाख भारतीय छात्रों ने विदेश में दाखिला लिया। इस पर हर साल अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा खर्च होती है। अगर वही गुणवत्ता भारत में मिल जाए तो देश का पैसा भी बचेगा और प्रतिभा का पलायन भी कम होगा।

विदेशी विश्वविद्यालयों का सबसे बड़ा फायदा उनकी क्वालिटी है। अगर भारत में वही पाठ्यक्रम, वही परीक्षा प्रणाली, वही डिग्री और वही अकादमिक संस्कृति मिले, जो उनके मूल कैंपस में है, तो लाखों छात्रों का सपना घर बैठे पूरा हो सकता है।

दूसरा बड़ा फायदा प्रतिस्पर्धा का होगा। सच यह है कि भारत के अधिकांश विश्वविद्यालय आज भी पुराने सिलेबस, कमजोर रिसर्च, सीमित इंडस्ट्री कनेक्ट और भारी-भरकम नौकरशाही से जूझ रहे हैं। विदेशी विश्वविद्यालयों की मौजूदगी भारतीय संस्थानों को अपनी गुणवत्ता सुधारने के लिए मजबूर करेगी। शिक्षा में कॉम्पिटिशन आएगा और कॉम्पिटिशन हमेशा सुधार लेकर आता है।

तीसरा फायदा रिसर्च का है। भारत लंबे समय से कहता रहा है कि उसे नॉलेज इकोनॉमी बनना है। लेकिन यह सपना सिर्फ क्लासरूम से पूरा नहीं होगा। इसके लिए मजबूत रिसर्च, इनोवेशन और इंडस्ट्री के साथ साझेदारी चाहिए। विदेशी विश्वविद्यालय यही संस्कृति लेकर आते हैं।

आज भारत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर, बायोटेक्नोलॉजी, क्लीन एनर्जी और क्वांटम टेक्नोलॉजी में दुनिया का नेतृत्व करना चाहता है। इन क्षेत्रों में केवल डिग्री नहीं, बल्कि विश्वस्तरीय रिसर्च की जरूरत है।

चौथा फायदा रोजगार से जुड़ा है। देश की कंपनियां वर्षों से कहती रही हैं कि बड़ी संख्या में डिग्रीधारी छात्र नौकरी के लिए पूरी तरह तैयार नहीं होते। विदेशी विश्वविद्यालय स्किल बेस्ड लर्निंग, इंटर्नशिप, लाइव प्रोजेक्ट और इंडस्ट्री एक्सपोजर पर जोर देते हैं। इससे छात्रों की एम्प्लॉयबिलिटी बेहतर हो सकती है। अगर यह मॉडल सफल होता है तो भारतीय उच्च शिक्षा की दिशा बदल सकती है।

लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है

हर बदलाव अपने साथ जोखिम भी लेकर आता है। सबसे बड़ा सवाल समान अवसर का है। विदेशी विश्वविद्यालयों की फीस सरकारी विश्वविद्यालयों जैसी नहीं होगी। विदेश की तुलना में खर्च कम जरूर होगा, लेकिन भारतीय मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों के लिए यह अब भी भारी पड़ सकता है। ऐसे में डर यह है कि कहीं यह व्यवस्था सिर्फ आर्थिक रूप से मजबूत परिवारों का नया विकल्प बनकर न रह जाए। अगर ऐसा हुआ तो शिक्षा में बराबरी का सपना और दूर चला जाएगा। इसलिए सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि स्कॉलरशिप केवल विज्ञापन का हिस्सा न बने, बल्कि वास्तव में प्रतिभाशाली और जरूरतमंद छात्रों तक पहुंचे।

दूसरी चिंता भारतीय विश्वविद्यालयों को लेकर है। अगर विदेशी विश्वविद्यालय बेहतर वेतन देंगे तो अच्छे शिक्षक स्वाभाविक रूप से उनकी ओर आकर्षित होंगे। इससे सरकारी विश्वविद्यालयों में पहले से मौजूद फैकल्टी संकट और गहरा सकता है।

तीसरी चिंता शिक्षा के कमर्शियलाइजेशन की है। दुनिया के कई देशों में विदेशी विश्वविद्यालयों के कैंपस अपेक्षा के अनुरूप सफल नहीं हुए। कहीं छात्रों की संख्या कम रही, कहीं लागत बढ़ गई और कहीं कैंपस बंद करने पड़े। इसलिए सिर्फ बड़ा नाम सफलता की गारंटी नहीं है।

चौथी चुनौती रेगुलेशन की है। भारत की शिक्षा व्यवस्था पहले से ही नियमों, मंजूरियों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के जाल में उलझी हुई है। विदेशी विश्वविद्यालय तभी सफल होंगे, जब उन्हें अकादमिक स्वतंत्रता मिले और साथ ही गुणवत्ता पर कड़ी निगरानी भी बनी रहे।

असल इम्तिहान अभी बाकी है

सबसे अहम सवाल यही है कि क्या सिर्फ विदेशी विश्वविद्यालयों के आने से भारत की उच्च शिक्षा बदल जाएगी? जवाब साफ है-नहीं। देश में एक हजार से अधिक विश्वविद्यालय और करीब पचास हजार कॉलेज हैं। विदेशी विश्वविद्यालय शुरुआती दौर में कुछ सौ या कुछ हजार छात्रों तक ही सीमित रहेंगे। इसलिए पूरी व्यवस्था पर उनका असर धीरे-धीरे ही दिखाई देगा।

असल चुनौती भारतीय विश्वविद्यालयों को बदलने की है। अगर सरकारी विश्वविद्यालयों में निवेश नहीं बढ़ेगा, रिसर्च को प्रोत्साहन नहीं मिलेगा, शिक्षकों की समय पर भर्ती नहीं होगी और इंडस्ट्री से मजबूत रिश्ता नहीं बनेगा, तो विदेशी विश्वविद्यालय सिर्फ एक समानांतर व्यवस्था बनकर रह जाएंगे।

आज भारत विदेशी विश्वविद्यालयों का स्वागत कर रहा है, लेकिन दूसरी तरफ क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग 2027 में देश का एक भी विश्वविद्यालय टॉप-100 में जगह नहीं बना सका। कुछ संस्थानों ने जरूर बेहतर प्रदर्शन किया है, लेकिन वैश्विक उत्कृष्टता का सफर अभी लंबा है।

दुनिया की पहचान उसके अपने विश्वविद्यालयों से बनती है। अमेरिका को हार्वर्ड और एमआईटी ने पहचान दी। ब्रिटेन को ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज ने। चीन अपने विश्वविद्यालयों को विश्वस्तरीय बनाने में लगातार निवेश कर रहा है।

हमको भी आईआईटी, आईआईएससी, आईआईएम, एम्स और केंद्रीय विश्वविद्यालयों को अगले स्तर तक ले जाना होगा। विदेशी विश्वविद्यालय इस यात्रा के पार्टनर हो सकते हैं, विकल्प नहीं।

आगे की राह

अब सरकार को तीन मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा। पहला, विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए पारदर्शी और जवाबदेह नियामक व्यवस्था। दूसरा, स्कॉलरशिप और सामाजिक समावेशन, ताकि प्रतिभा पैसे की मोहताज न रहे। तीसरा, भारतीय विश्वविद्यालयों में बड़े पैमाने पर निवेश, रिसर्च और अकादमिक सुधार। अगर सिर्फ विदेशी कैंपस खुल गए और भारतीय विश्वविद्यालय पुराने ढर्रे पर चलते रहे, तो यह बदलाव अधूरा रह जाएगा। भारत को सिर्फ विदेशी विश्वविद्यालयों की मौजूदगी नहीं चाहिए। भारत को ऐसा शिक्षा तंत्र चाहिए, जहां दुनिया पढ़ने आए, भारतीय विश्वविद्यालय रिसर्च में नई मिसाल बनें और भारतीय डिग्री भी वैश्विक गुणवत्ता का पर्याय बने। जिस दिन भारत के विश्वविद्यालय भी दुनिया के शीर्ष संस्थानों की सूची में लगातार दिखाई देंगे, उसी दिन कहा जा सकेगा कि विदेशी विश्वविद्यालयों की दस्तक केवल एक नई नीति नहीं, बल्कि भारतीय शिक्षा के नए दौर की शुरुआत थी।