विधायक को कार, भत्ता और सत्ता, जनता पूछे हिसाब कब होगा

अजय कुमार बियानी

विधायक जी को नई कार मिल गई, साथ में यात्रा भत्ता और सहायक की सुविधा भी। खबर सुनते ही जनता ने सोचा—चलो, अब गांव-गांव पहुंचना आसान होगा, हमारी समस्याएं भी शायद जल्दी सुन ली जाएंगी। लेकिन जनता की आदत है सवाल पूछने की। उसने तुरंत पूछा—“साहब, कार तो मिल गई, अब हमारे गांव कब आएंगे?”
नेता जी मुस्कुराए और बोले—“बस, सत्ता चलती रहे!”
मामला यहीं से थोड़ा मजेदार हो जाता है। जनप्रतिनिधि को कार मिले, सुविधा मिले, यात्रा के लिए भत्ता मिले और सहायक भी मिले, इसमें आपत्ति नहीं होनी चाहिए। आखिर विधायक को क्षेत्र में घूमना है, जनता से मिलना है और विकास कार्यों की निगरानी भी करनी है। लेकिन सवाल यह है कि इन सुविधाओं का असली लाभ जनता तक कितना पहुंचता है?
बताया जा रहा है कि विधायक को कार के लिए पचहत्तर हजार रुपये और सहायक के लिए पच्चीस हजार रुपये की सुविधा मिलेगी। यानी अब जनसेवा के लिए साधन भी उपलब्ध है और साधन चलाने वाला सहयोगी भी। जनता बस इतना चाहती है कि इस व्यवस्था से जनसेवा की रफ्तार भी बढ़े।
अब गांव की सड़क पर विधायक जी की गाड़ी दौड़ेगी। किसान शायद रास्ते के किनारे खड़ा होकर सोचेगा—“साहब की गाड़ी तो आ गई, हमारी सड़क कब आएगी?”
युवा पूछेगा—“रोजगार कब मिलेगा?”
किसान कहेगा—“फसल का उचित मूल्य कब मिलेगा?”
गुरुजी कहेंगे—“विद्यालय की हालत सुधारिए।”
मजदूर बोलेगा—“हमारे अधिकार और मजदूरी की चिंता कीजिए।”
और गांव की सड़क शायद फिर वही पुराना सवाल पूछेगी—“मेरी मरम्मत का नंबर कब आएगा?”
कार नई है, लेकिन जनता की समस्याएं पुरानी हैं। गाड़ी में नई चमक आ सकती है, लेकिन गांव की गलियों में विकास की चमक कब आएगी, यह असली सवाल है।
विधायक को सुविधा इसलिए दी जाती है ताकि वह अपने क्षेत्र में अधिक सक्रिय होकर जनता के बीच पहुंचे। यदि जनप्रतिनिधि के पास वाहन है तो उसे गांवों तक पहुंचने में सुविधा होगी। अगर सहायक है तो कामकाज व्यवस्थित हो सकेगा। यात्रा भत्ता है तो क्षेत्र का दौरा बढ़ना चाहिए। यानी सुविधा के साथ जिम्मेदारी भी बढ़नी चाहिए।
जनता को यह भी उम्मीद है कि अब विधायक जी केवल राजधानी या जिला मुख्यालय तक सीमित नहीं रहेंगे। उनकी गाड़ी गांव की धूल भी खाएगी, खेतों की मेड़ भी देखेगी और उन रास्तों पर भी जाएगी जहां बरसात में पैदल चलना मुश्किल हो जाता है।
क्योंकि लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि की पहचान उसकी गाड़ी से नहीं, जनता के बीच उसकी मौजूदगी से होती है।
तीन महीने में विकास कार्यों की प्रगति रिपोर्ट तैयार करने और वादों को पूरा करने की बात कही जाती है। अगर ऐसा होता है तो यह स्वागत योग्य कदम है। लेकिन रिपोर्ट केवल कागज पर नहीं, जमीन पर दिखाई देनी चाहिए। गांव में सड़क बनी हो, विद्यालय में शिक्षक हों, अस्पताल में दवा हो, किसान को सुविधा मिले और युवा को रोजगार के अवसर मिलें—तभी जनसेवा का अर्थ पूरा होगा।
विधायक जी, कार आपकी है, लेकिन पेट्रोल का पैसा जनता के खजाने से आता है। भत्ता आपका है, लेकिन उसका स्रोत भी जनता का पैसा है। इसलिए जनता को केवल गाड़ी की चमक नहीं, काम की चमक भी दिखाई देनी चाहिए।
और जनता भी बड़ी सीधी है। उसे विधायक की गाड़ी देखकर ईर्ष्या नहीं होती। वह तो बस इतना चाहती है कि जब उसकी समस्या लेकर वह विधायक के पास पहुंचे तो उसे यह न सुनना पड़े—“साहब अभी क्षेत्र के दौरे पर हैं।”
क्योंकि क्षेत्र का दौरा करने के लिए कार मिली है और क्षेत्र की जनता से मिलने के लिए विधायक बने हैं।
इसलिए कार मिले तो खूब चलाइए, गांव-गांव जाइए, जनता की सुनिए और समस्याओं का समाधान कराइए। जनप्रतिनिधि को मिली सरकारी सुविधा तभी सार्थक होगी जब उसका पहिया विकास की दिशा में घूमे।
वरना जनता तो फिर वही सवाल पूछेगी—
“साहब, कार तो मिल गई, अब जनसेवा कब शुरू होगी?”
और नेता जी का जवाब अगर फिर आया—“बस सत्ता बनी रहे!” तो जनता शायद अगली बार कार नहीं, काम का हिसाब मांग लेगी।