अजय कुमार
भारतीय राजनीति के फलक पर विपक्ष इस समय पूरी तरह से आक्रामक और सरकार बचाव की मुद्रा में नजर आ रही है। राफेल डील से लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग और स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन(एसआईआर) जैसे मुद्दों पर कांग्रेस और इंडी गठबंधन ने संसद से लेकर सड़क तक संग्राम छेड़ रखा है। इस आक्रामक घेरेबंदी के बीच राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और भारतीय जनता पार्टी का वह पारंपरिक काउंटर अटैक दिखाई नहीं दे रहा है, जिसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की जोड़ी जानी जाती है। जबकि विपक्ष लगातार मुद्दे बदल कर हमलावर है। विपक्ष का एजेंडा और रणनीति लगातार बदल रही है। कुछ समय पहले तक जो विपक्ष सिर्फ संसद के भीतर विरोध दर्ज कराता था, वह अब अदालतों, स्वतंत्र मंचों और अंतरराष्ट्रीय कड़ियों को जोड़कर सरकार को घेर रहा है। हाल ही में मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर विपक्ष ने जिस तरह से मोर्चा खोला है, उसने सरकार को पूरी तरह से बैकफुट पर धकेलने का काम किया है। 06 अक्टूबर को भी इंडी गठबंधन ने सीईसी के खिलाफ सड़क पर खूब संग्राम किया, जवाब में भाजपा के बड़े नेता जैसे कि केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान या पार्टी प्रवक्ता सिर्फ प्रेस कॉन्फ्रेंस कर विपक्ष के इस अभियान को भ्रामक और अराजकता फैलाने वाला करार देने तक ही सीमित नजर आयें। भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका सांगठनिक ढांचा और जमीनी कार्यकर्ता माने जाते रहे हैं। लेकिन मौजूदा दौर के इस राजनीतिक हो-हल्ले में भाजपा के पार्षद, विधायक और सांसद जैसे जनप्रतिनिधि अपने नेतृत्व के पक्ष में मुखरता से खड़े नहीं दिखाई दे रहे हैं। संसद और मीडिया में गिने-चुने प्रवक्ताओं को छोड़ दें, तो जमीन पर सांसदों और विधायकों का कोई बड़ा समूह विपक्ष के इन तथाकथित फेक नैरेटिव को ध्वस्त करने के लिए जनता के बीच जाता नहीं दिख रहा है। चाहे वह परीक्षाओं की प्रणाली को लेकर विपक्ष का घेराव हो या फिर चुनाव सुधारों पर फैलाया जा रहा भ्रम, भाजपा के स्थानीय नेता अपनी ही सरकार की नीतियों और उपलब्धियों का बचाव करने में हिचकिचाते नजर आ रहे हैं। इस खामोशी ने जनता के एक बड़े वर्ग में यह संदेश दिया है कि विपक्ष के आरोपों का ठोस जवाब देने में पार्टी का जमीनी कैडर असमर्थ महसूस कर रहा है,जबकि विपक्ष अब केवल राजनीतिक रैलियों तक सीमित नहीं है; उसने अदालतों को अपना मुख्य रणनीतिक केंद्र बना लिया है। चुनाव आयोग की विश्वसनीयता से लेकर सरकार की प्रशासनिक नीतियों तक, हर संवेदनशील मुद्दे को कोर्ट में चुनौती दी जा रही है। ऐसे समय में भाजपा के कानूनी सलाहकारों और कानूनविदों की टीम मीडिया या सार्वजनिक फोरम पर उस तार्किकता और आक्रामकता के साथ खड़ी नहीं दिखती, जिसकी जरूरत है। अदालती फैसलों या चल रही बहसों का सरलीकृत रूप जनता के सामने रखने में भाजपा का कानूनी विंग पूरी तरह निष्क्रिय नजर आ रहा है। जब विपक्ष के वकील अदालतों के बाहर मीडिया कैमरों के सामने एकतरफा नैरेटिव सेट कर रहे होते हैं, तब भाजपा की तरफ से उस कानूनी बारीकी को जनता की भाषा में समझाने वाला कोई बड़ा चेहरा नजर नहीं आता।
भाजपा का मीडिया और आईटी सेल कभी विरोधी दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती हुआ करता था। हाल ही में संगठन के भीतर कई बदलाव किए गए हैं, जिसमें अमित मालवीय के लंबे कार्यकाल के बाद दीपक म्हास्के को सोशल मीडिया की जिम्मेदारी सौंपी गई और संगठन में राम माधव व स्मृति ईरानी जैसे वरिष्ठ नेताओं की वापसी हुई। इसके बावजूद, बदली हुई सोशल मीडिया टीम विपक्ष की नई और सुव्यवस्थित डिजिटल सेना के सामने हल्की और अप्रभावी साबित हो रही है। भाजपा का सोशल मीडिया कंटेंट अब विकासात्मक मील के पत्थरों और आर्थिक आंकड़ों की उबाऊ प्रस्तुति तक सिमट कर रह गया है, जबकि विपक्ष सीधे युवाओं के गुस्से, बेरोजगारी और प्रशासनिक कमियों को भावनात्मक रूप से भुनाने में जुटा है। भाजपा का मीडिया सेल केवल रोजमर्रा की तू-तू मैं-मैं में उलझा हुआ है, जिससे वह धार गायब हो चुकी है जो कभी विरोधियों के नैरेटिव को चंद घंटों में जमींदोज कर देती थी। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी हमेशा अप्रत्याशित और विनाशकारी काउंटर-अटैक के लिए जानी जाती रही है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हाल ही में कहा था कि प्रधानमंत्री मोदी ने सुशासन के जरिए विपक्ष के झूठे नैरेटिव को बेअसर किया है, लेकिन संगठन के स्तर पर यह असर फीका पड़ रहा है।
उधर, मोदी सरकार के खिलाफ नैरेटिव गढ़ने में विदेशी शक्तियों और बाहरी तत्वों के शामिल होने के आरोपों पर भी भारतीय राजनीति में तीखी बहस जारी है। सत्ता पक्ष और सुरक्षा एजेंसियों का दावा है कि भारत की संप्रभुता, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और सरकार की छवि को वैश्विक स्तर पर प्रभावित करने के लिए सुनियोजित प्रयास किए जा रहे हैं। हालांकि, विपक्ष इन दावों को घरेलू विफलताओं से ध्यान भटकाने का एक जरिया बताता है। विदेशी जमीन से संचालित डिजिटल इकोसिस्टम पर सत्तारूढ़ दल भाजपा ने आधिकारिक तौर पर आरोप लगाया है कि देश के भीतर सरकार विरोधी एजेंडा और वोट चोरी जैसे नैरेटिव को हवा देने वाले कई सोशल मीडिया हैंडल भारत से नहीं, बल्कि विदेशी धरती से संचालित हो रहे हैं। भाजपा प्रवक्ताओं द्वारा सार्वजनिक किए गए विवरणों के अनुसार, कांग्रेस और उसके सहयोगी तंत्र से जुड़े कुछ प्रमुख सोशल मीडिया हैंडल और इन्फ्लुएंसर्स के नेटवर्क संयुक्त राज्य अमेरिका, आयरलैंड और थाईलैंड जैसी विदेशी लोकेशंस से जुड़े पाए गए हैं। पार्टी का दावा है कि यह भारत में असंतोष भड़काने के लिए एक व्यवस्थित विदेशी नेटवर्क का हिस्सा है।भारत में बड़े आंदोलनों (जैसे छात्र प्रदर्शन या किसान आंदोलन) के दौरान विदेशी टूलकिट की सक्रियता के प्रमाण मिले हैं। सुरक्षा बलों और साइबर सेल की जांच रिपोर्टों के अनुसार, हालिया विरोध प्रदर्शनों के दौरान पाकिस्तान स्थित हैंडलों से संचालित होने वाले फेक न्यूज टूलकिट्स सक्रिय पाए गए हैं, जिनमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) द्वारा जनित और हेरफेर किए गए वीडियो का उपयोग कर युवाओं को सरकार और रक्षा बलों के खिलाफ भड़काने का प्रयास किया गया। इससे पहले, ग्रेटा थनबर्ग टूलकिट मामले में भी खालिस्तानी संगठनों और विदेशी कड़ियों (जैसे कनाडा स्थित पोएटिक जस्टिस फाउंडेशन) के शामिल होने के आरोप लगे थे। भाजपा के आईटी सेल ने इसे रेखांकित करते हुए आरोप लगाया कि विदेशी ताकतें भारत में एक कमजोर गठबंधन सरकार स्थापित करने के लिए वित्तीय और रणनीतिक प्रयास कर रही थीं।





