एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
वैश्विक स्तरपर दुनियाँ के आर्थिक परिदृश्य में सबसे चौंकाने वाला घटनाक्रम अमेरिका का रूस से डीजल मंगाने का फैसला है।ट्रंप के अनुसार,रूस तत्काल 3 लाख टन से अधिक डीजल उपलब्ध कराएगा। इसके बाद नवंबर में 5 लाख टन और आगे अतिरिक्त आपूर्ति की भी घोषणा की गई है।हालांकि, इन मात्राओं की वास्तविक आपूर्ति और समयसीमा रूस की रिफाइनरी क्षमता, परिवहन तथा प्रतिबंधों में दी गई छूट पर निर्भर करेगी। अमेरिकी प्रशासन ने रूसी डीजल की बिक्री की अनुमति देने के लिए सीमित अवधि की छूट भी दी है। यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका पहले रूस की ऊर्जा आय से उसकी युद्ध क्षमता मजबूत होने की आशंका जताते हुए रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर कठोर आर्थिक कार्रवाई की बात करता रहा है। अब घरेलू ईंधन संकट के बीच रूस से ही आपूर्ति लेने की पहल ने अमेरिकी नीति की निरंतरता पर सवाल खड़े किए हैं। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने इस समझौते की आलोचना करते हुए इसे रूस के लिए आर्थिक लाभ बताया है।अमेरिका में 3 नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले ईंधन की कीमतें ट्रंप प्रशासन के लिए राजनीतिक चुनौती बन गई हैं। किसान, ट्रक चालक और परिवहन क्षेत्र डीजल की कीमतों से सीधे प्रभावित होते हैं।आयोवा कंसास,टेक्सस और ओहायो जैसे राज्यों में महंगा ईंधन चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकता है।इसलिए रूस से आपूर्ति बढ़ाने का फैसला आर्थिक राहत के साथ राजनीतिक दबाव से निपटने की कोशिश भी माना जा सकता है।लेकिन यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल है,क्या रूस से आने वाला डीजल अमेरिकी बाजार की समस्या हल कर देगा?अमेरिका प्रतिदिन लगभग 36 लाख बैरल डीजल का उपयोग करता है। घोषित पहली खेप लगभग 22.5 लाख बैरल के बराबर है, जो अमेरिकी दैनिक खपत के आधे से भी कम है। अतः यह एक दिन की खपत के मुकाबले उल्लेखनीय मात्रा जरूर है, लेकिन इससे लंबे समय का संकट समाप्त नहीं होगा।
साथियों बात अगर हम अमेरिका में कच्चा तेल पर्याप्त, फिर डीजल की किल्लत क्यों? इसको समझने की करें तो,यहां एक महत्वपूर्ण आर्थिक अंतर समझना आवश्यक है। कच्चा तेल निकालना और उससे आवश्यक मात्रा में डीजल तैयार करके बाजार तक पहुंचाना दो अलग प्रक्रियाएं हैं। किसी देश के पास विशाल तेल उत्पादन होने के बावजूद उसकी रिफाइनरी क्षमता, उत्पादन का मिश्रण,भंडार, पाइपलाइन,बंदरगाह और परिवहन व्यवस्था सीमित हो सकती है।वर्तमान संकट में मध्य-पूर्व की अस्थिरता, होर्मूज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही में बाधाएं,रूस की रिफाइनरियों को नुकसान और विभिन्न देशों की निर्यात नीतियां डीजल की उपलब्धता को प्रभावित कर रही हैं। लाल सागर में जहाजों पर हमलों का खतरा भी परिवहन लागत और बीमा प्रीमियम बढ़ा सकता है।इसलिए कच्चे तेल का उत्पादन अधिक होना अपने आप सस्ते डीजल की गारंटी नहीं है।
साथियों बात अगर हम जी-7 और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के भंडार: क्या 10 करोड़ बैरल से संकट टलेगा? इसको समझने की करें तो, ऊर्जा बाजार को राहत देने के लिए अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने 7 अक्टूबर को बताया कि मार्च 2026 में घोषित सामूहिक भंडार-मुक्ति कार्यक्रम के अंतर्गत अब तक लगभग 32.5 करोड़ बैरल तेल जारी किया जा चुका है। पहले से घोषित भंडारों की शेष मात्रा जारी होने पर लगभग 10 करोड़ बैरल और बाजार में आ सकते हैं। सदस्य देशों के सार्वजनिक आपात भंडारों में करीब 110 करोड़ बैरल तेल के बराबर भंडार हैं, जिनमें 20 करोड़ बैरल से अधिक डीजल भी शामिल है।यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 10 करोड़ बैरल को नया,अलग जी-7 पैकेज मानना सही नहीं होगा; यह मार्च में घोषित सामूहिक कार्रवाई के तहत अभी जारी किए जाने वाले शेष भंडार का अनुमान है। भंडार जारी करने से आपूर्ति का तत्काल दबाव घट सकता है, लेकिन यह स्थायी उत्पादन का विकल्प नहीं है। यदि होर्मूज में जहाजों की आवाजाही बाधित रहती है या रिफाइनरियों को नुकसान जारी रहता है, तो कीमतों में दोबारा सटीकता से उछाल आ सकता है।
साथियों बात अगर हम ईरान युद्ध और होर्मूज: ट्रंप की घोषणा से बाजार को कितनी राहत? इसको समझने की करें तो ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका 3 नवंबर के मध्यावधि चुनावों से पहले ईरान पर हमला नहीं करेगा। इस घोषणा से तत्काल सैन्य तनाव बढ़ने की आशंका कुछ कम हुई और तेल बाजार को राहत मिली।हालांकि,यह युद्ध समाप्त होने की घोषणा नहीं है। होर्मूज जलडमरूमध्य से ऊर्जा आपूर्ति में व्यवधान का जोखिम अब भी बना हुआ है।9 अक्टूबर की बाजार रिपोर्टों में ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत लगभग 104 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रही। इससे संकेत मिलता है कि राजनीतिक बयानबाजी से अल्पकालिक राहत मिल सकती है, लेकिन बाजार अभी भी आपूर्ति संबंधी जोखिमों को कीमतों में शामिल कर रहा है।
साथियों बात अगर हम डॉलर बनाम रुपयातेल की कीमतें भारत के लिए दोहरी चुनौती को समझने की करें तो, अंतरराष्ट्रीय तेल व्यापार में डॉलर की प्रमुख भूमिका के कारण महंगा कच्चा तेल भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए महत्वपूर्ण जोखिम है। यदि तेल महंगा रहता है और डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होता है, तो भारत को समान मात्रा में तेल खरीदने के लिए अधिक रुपये खर्च करने पड़ते हैं। इससे आयात बिल, परिवहन लागत और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है।इसके विपरीत, ऊर्जा तनाव घटने और विदेशी निवेश लौटने से रुपये को सहारा मिल सकता है। मध्य- पूर्व के संकट के बीच डॉलर की मांग सुरक्षित निवेश के रूप में बढ़ सकती है।इसलिए डॉलर की वैश्विक स्थिति कमजोर होने की चर्चा के बावजूद उसके जल्द अपना प्रमुख स्थान खो देने का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। तेल का मूल्य निर्धारण, वैश्विक व्यापार, वित्तीय बाजारों की गहराई और डॉलर में उपलब्ध निवेश विकल्प इसकी स्थिति को मजबूत बनाए रखते हैं।
साथियों बात अगर हम भारतीय शेयर बाजार: वैश्विक संकट के बीच निवेशक किस दिशा में देखें? इसको समझने की करें तो,भारत के शेयर बाजार परअंतरराष्ट्रीय ऊर्जा कीमतों, विदेशी निवेश, ब्याज दरों और कंपनियों के मुनाफे का संयुक्त असर पड़ता है। महंगा तेल परिवहन, विमानन, रसायन और तेल विपणन जैसे क्षेत्रों की लागत बढ़ा सकता है। दूसरी ओर, तेल की कीमतें घटने पर इन क्षेत्रों को राहत मिल सकती है।ऊर्जा उत्पादक कंपनियों और आयात पर निर्भर उद्योगों पर प्रभाव एक जैसा नहीं होगा।9 अक्टूबर की रिपोर्टों में भारतीय बाजार पर महंगे तेल और अमेरिकी बॉन्ड प्रतिफल में वृद्धि का दबाव दिखाई दिया। रुपये की कमजोरी तथा विदेशी निवेश के बहिर्वाह की आशंका ने भी निवेशकों की चिंता बढ़ाई।10 अक्टूबर शनिवार होने के कारण भारतीय शेयर बाजार का सामान्य नियमित कारोबार बंद था। इसलिए दोपहर 4 बजे तक कीआर्थिक समीक्षा में शुक्रवार के अंतिम उपलब्ध कारोबारी संकेतों को आधार बनाना उचित है; शनिवार के लिए कोई काल्पनिक सेंसेक्स निफ्टी या रुपये का बंद भाव देना सही नहीं होगा।
साथियों बात अगर हम भारत की विकास दर 7.1 प्रतिशत : वैश्विक संकट में भरोसे की किरण को समझने की करें तो, विश्व बैंक ने 6 अक्टूबर को जारी अपने आर्थिक आकलन में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की विकास दर का अनुमान 6.6 प्रतिशत से बढ़ाकर 7.1 प्रतिशत कर दिया।मजबूत घरेलू मांग और निर्यात को इसके प्रमुख सहायक कारकों के रूप में रेखांकित किया गया। यह भारत की आर्थिक संभावनाओं और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के भरोसे के लिए सकारात्मक संकेत है।मजबूत विकास दर से उत्पादन, रोजगार उपभोग और कंपनियों की आय को समर्थन मिल सकता है। हालांकि, विश्व बैंक ने महंगे तेल, मौसम संबंधी जोखिम और शेयर बाजार में संभावित गिरावट से पूंजी प्रवाह में अस्थिरता की चेतावनी भी दी है। अतः 7.1 प्रतिशत का अनुमान आर्थिक मजबूती का संकेत है, किसी भी परिस्थिति में विकास की गारंटी नहीं।
साथियों बात अगर हम आरबीआई की रेपो दर 5.50 प्रतिशत: कर्ज महंगा,बचत को संभावित लाभ को समझने की करें तो,7अक्टूबर को भारतीय रिजर्व बैंक ने रेपो दर में 0.25 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी करके इसे 5.50 प्रतिशत कर दिया। इसके बाद पंजाब नेशनल बैंक, इंडियन बैंक और बैंक ऑफ बड़ौदा सहित कई बैंकों ने कुछ ऋण दरों में बढ़ोतरी की। इसका अर्थ है कि नई दरों से जुड़े कुछ आवास,वाहन और कारोबारी ऋण महंगे हो सकते हैं। इससे उपभोग और निवेश की गति पर दबाव पड़ने की आशंका रहती है। दूसरी ओर, बैंक जमा की दरें बढ़ाते हैं तो बचतकर्ताओं को लाभ मिल सकता है। शेयर बाजार में ब्याज-संवेदनशील क्षेत्रों पर दबाव संभव है जबकि बैंकिंग क्षेत्र का वास्तविक लाभ उसकी जमा लागत, ऋण गुणवत्ता और शुद्ध ब्याज मार्जिन पर निर्भर करेगा।
साथियों बात अगर हम जीएसटी परिषद की 57वीं बैठक: कारोबार सुगमता पर जोर को समझने की करें तो 8 अक्टूबर को हुई जीएसटी परिषद की 57वीं बैठक में पंजीकरण,विवरणी,रिफंड,विवाद निपटान और अनुपालन प्रक्रिया को सरल बनाने से जुड़े सुझाव दिए गए। इन सुधारों का उद्देश्य कारोबारियों की प्रक्रियागत कठिनाइयां कम करना और कर व्यवस्था में स्पष्टता बढ़ाना है। यदि क्रियान्वयन प्रभावी रहा,तो छोटे व्यवसायों की कार्यशील पूंजी और अनुपालन लागत पर सकारात्मक असर पड़ सकता है। निवेशकों के लिए इसका महत्व इस बात में होगा कि नीतिगत स्थिरता और पारदर्शिता से कारोबार करना कितना आसान होता है।
साथियों बात अगर हम सिंगापुर में वित्त मंत्री की बैठकें: भारत के लिए निवेश का अवसर को समझने की करें तो वित्तमंत्री 9 से 11 अक्टूबर तक सिंगापुर की आधिकारिक यात्रा पर हैं। आधिकारिक कार्यक्रम के अनुसार,उनकी बैठकों में सिंगापुर के नेतृत्व, वैश्विक निवेशकों,वित्तीय संस्थानों और कारोबारी प्रतिनिधियों के साथ व्यापार,निवेश, डिजिटल वित्तीय संपर्क, पूंजी बाजार, कराधान,सेमीकंडक्टर और उन्नत विनिर्माण जैसे विषय शामिल हैं।इन चर्चाओं से भारत में दीर्घकालिक निवेश आकर्षित करने और वित्तीय सहयोग बढ़ाने के अवसर बन सकते हैं। हालांकि, वास्तविक आर्थिक लाभ का आकलन घोषणाओं के बजाय ठोस निवेश प्रतिबद्धताओं, परियोजनाओं और पूंजी प्रवाह से होगा।
साथियों बात अगर हम एच-1बी और ग्रीन कार्ड विवाद: भारतीय आईटी उद्योग के लिए चेतावनी को समझने की करें तो, अमेरिकी प्रशासन ने माइक्रोसॉफ्ट, एडोबी, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज,इन्फोसिस,विप्रो,एचसीएल, कॉग्निजेंट और कैपजेमिनी सहित आठ प्रौद्योगिकी कंपनियों को स्थायी श्रम प्रमाणन कार्यक्रम यानी पीईआरएम से निलंबित किया है। इससे इन कंपनियों के माध्यम से ग्रीन कार्ड पाने की प्रक्रिया में अनिश्चितता बढ़ी है।हालांकि,यह कार्रवाई अपने आप सभी मौजूदा एच-1 बी वीजा रद्द नहीं करती। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की एच-1बी कर्मचारियों को बंधुआ मजदूर कहने वाली टिप्पणी पर भारत ने कड़ी आपत्ति जताई है। भारतीय पेशेवर अमेरिकी प्रौद्योगिकी और नवाचार व्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। यदि वीजा और स्थायी निवास संबंधी अनिश्चितता बढ़ती है,तो कंपनियों की भर्ती लागत, कर्मचारियों की उपलब्धता और प्रतिभा के वैश्विक प्रवाह पर असर पड़ सकता है। भारत के लिए यह घरेलू प्रौद्योगिकी क्षेत्र, कौशल विकास और वैश्विक बाजारों में विविधीकरण को मजबूत करने का भी संकेत है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि वैश्विक मंदी का खतरा या भारत के लिए अवसर?10 अक्टूबर 2026 तक उपलब्ध आर्थिक संकेतों से यह स्पष्ट है कि दुनिया के सामने ऊर्जा आपूर्ति,भू- राजनीतिक तनाव, महंगाई, ब्याज दरों और निवेशकों के भरोसे की परस्पर जुड़ी चुनौतियां हैं।अमेरिका की रूस से डीजल खरीदने की पहल बताती है कि घरेलू आर्थिक दबाव कई बार विदेश नीति की प्राथमिकताओं को भी बदल सकता है।जी-7 और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के भंडार बाजार को राहत दे सकते हैं, लेकिन ऊर्जा संकट की मूल समस्याओं को अकेले समाप्त नहीं कर सकते।भारत के लिए तस्वीर मिश्रित है।विश्व बैंक का 7.1 प्रतिशत विकास अनुमान, सिंगापुर में निवेश संबंधी वार्ताएं और जीएसटी प्रक्रियाओं में सुधार सकारात्मक संकेत हैं।इसके विपरीत,महंगा तेल, रुपये पर दबाव, ऊंची ब्याज दरें और अमेरिकी वीजा संबंधी अनिश्चितता जोखिम पैदा कर सकती हैं।अंततः वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा तीन निर्णायक कारकों पर निर्भर करेगी-मध्य-पूर्व में ऊर्जा आपूर्ति की स्थिरता,रूस- यूक्रेन संघर्ष का आर्थिक प्रभाव और महंगाई पर केंद्रीय बैंकों का नियंत्रण। भारत की दीर्घकालिक ताकत उसकी घरेलू मांग,सेवा क्षेत्र, विनिर्माण क्षमता और नीतिगत विश्वसनीयता में है। लेकिन इस ताकत को वास्तविक लाभ में बदलने के लिए स्थिर ऊर्जा आपूर्ति, निवेश-अनुकूल वातावरण और प्रभावी आर्थिक प्रबंधन अनिवार्य होंगे।





