सऊदी अरब में व्यभिचार के जुर्म में फांसी से उपजे सवाल

Questions raised by hanging for the crime of adultery in Saudi Arabia

तनवीर जाफ़री

सऊदी अरब की अल मजाल कंपनी में काम करने वाले बांग्लादेश के दो नागरिकों नज़रुल इस्लाम अब्दुल बासिर (पुरुष-22 ) और स्वीटी अख़्तर (महिला ) को गत 14 अक्टूबर को मक्का क्षेत्र में मृत्युदंड दे दिया गया। नज़रुल इस्लाम बांग्लादेश के ब्राह्मणबाड़िया ज़िले के रहने वाले थे जबकि स्वीटी अख़्तर तंगाइल ज़िले की निवासी थीं। यह दोनों एक दूसरे के दोस्त थे और 2022 के अंत में सऊदी अरब पहुँच कर वहाँ की अल मजाल नामक कंपनी में सफ़ाई कर्मचारी के रूप में काम करने लगे थे। उन्हें मई 2023 में सऊदी अरब की पुलिस ने गिरफ़्तार किया था। उन पर आरोप था कि इन दोनों ने सऊदी अरब के पवित्र शहर मक्का की एक मस्जिद के कमरे में अवैध व अनैतिक रूप से यौन कृत्य किया। बताया जा रहा है कि सुरक्षा अधिकारियों ने इन दोनों को पवित्र शहर मक्का के भीतर एक मस्जिद परिसर में इसी अभद्र कृत्य करने के आरोप में रंगे हाथों गिरफ़्तार किया था। इस मामले में 39 महीने तक यह दोनों जेल में रहे और इस बीच सुनवाई चलती रही। सऊदी गृह मंत्रालय के अनुसार इस घटना की गहन जांच की गई। उसके बाद निचली अदालत में मुक़दमा चला। इसके बाद 13 न्यायाधीशों के पुनर्विचार करने वाले एक उच्च पैनल ने भी इस सज़ा को बरक़रार रखा, जिसके बाद ही शाही फ़रमान के ज़रिए इसे लागू किया गया। सऊदी अधिकारियों के अनुसार, यह अपराध मक्का क्षेत्र में एक पवित्र मस्जिद परिसर के भीतर हुआ था। इस्लाम धर्म में मक्का और वहाँ की मस्जिदों को बेहद पवित्र माना जाता है। सऊदी न्यायशास्त्र के अनुसार, ऐसे स्थानों पर “अनैतिक कृत्य” करना एक गंभीर धार्मिक और क़ानूनी अपराध है, जिसके लिए कठोरतम सज़ा का प्रावधान है। फांसी की यह सज़ा ‘ताज़ीर’ के तहत दी गई थी। शरिया में ताज़ीर उन अपराधों के लिए होता है जिनकी सज़ा क़ुरान या हदीस में तय नहीं होती, बल्कि न्यायाधीश स्वयं अपराध की गंभीरता और समाज पर उसके प्रभाव को देखते हुए मौत की सज़ा तक का फ़ैसला ले सकते हैं। ताज़ीर क़ानून का अर्थ एक ऐसी सज़ा जो इतिहास में भूली न जा सके और जिसे सुनकर कोई भी व्यक्ति कभी भी ऐसी हरकत करने की भी ना सोचे। इस सज़ा की भले ही बांग्लादेश सहित विभिन्न मानवाधिकार संगठनों द्वारा आलोचना क्यों न की जा रही हो परन्तु सऊदी अरब के गृह मंत्रालय और न्यायिक अधिकारियों के दृष्टिकोण से इस सज़ा को उनके देश के क़ानूनों के अनुसार उचित माना गया है। फांसी देने के बाद सऊदी गृह मंत्रालय ने अपने बयान में कहा है कि ” सऊदी हुकूमत न्याय की रक्षा करने , सुरक्षा बनाए रखने और मस्जिदों की पवित्रता व मर्यादा का उल्लंघन करने वाले या दूसरों के सम्मान को ठेस पहुंचाने वाले किसी भी व्यक्ति के ख़िलाफ़ इस्लामी शरीया क़ानून सख़्ती से लागू करने के लिए प्रतिबद्ध है। जो भी ऐसा अपराध करेगा उसका अंजाम यही होगा”। सऊदी अरब का मानना है कि एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में उसे अपने देश की सीमाओं के भीतर अपने क़ानूनों को लागू करने का पूरा अधिकार है। ग़ौरतलब है कि वहाँ की न्याय प्रणाली पूरी तरह से इस्लामी शरिया क़ानून पर आधारित है।

परन्तु इस घटना के बाद बांग्लादेश और सऊदी अरब के बीच कूटनीतिक तनाव गहरा गया है। बांग्लादेश सरकार और जेद्दा स्थित बांग्लादेशी महावाणिज्य दूतावास को इस फांसी के बारे में पहले से कोई सूचना या जानकारी नहीं थी। हालांकि गत सितंबर में सऊदी अरब द्वारा साझा की गई 2,500 क़ैदियों की सूची में इन दोनों के नाम ज़रूर थे परन्तु उनके नाम के साथ उन्हें दी जाने वाली मौत की सज़ा का कोई ज़िक्र नहीं था। बल्कि गोपनीय दस्तावेज़ों के मुताबिक़ स्वीटी अख़्तर पर ‘व्यभिचार’ और नज़रुल इस्लाम पर ‘साइबर अपराध’ के अलग-अलग आरोप दर्ज थे। इसीलिये बांग्लादेश ने इस “गुप्त फाँसी” पर गंभीर आपत्ति जताई है। बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता शाहिदुल करीम और राज्य मंत्री शमा ओबैद इस्लाम ने कहा कि ‘वियना कन्वेंशन ऑन कांसुलर रिलेशंस’ के तहत यदि किसी विदेशी नागरिक को गिरफ़्तार किया जाता है या मौत की सज़ा दी जाती है, तो उसकी जानकारी संबंधित देश के दूतावास को देना अनिवार्य है। परन्तु सऊदी अरब ने बांग्लादेशी वाणिज्य दूतावास को सूचित किए बिना गुपचुप तरीक़े से फांसी दी इसलिये इसे राजनयिक स्तर पर पूरी तरह अनुचित माना गया है। इसीलिये ढाका ने आधिकारिक तौर पर सऊदी अरब से अदालतीफ़ैसलों की प्रतियां, अपराधों का पूरा विवरण और बिना सूचना दिए फांसी देने का कारण पूछा है। बांग्लादेश की जनता में भी इस घटना को लेकर गहरा दुख और आक्रोश है। स्थानीय सोशल मीडिया और स्थानीय मीडिया में इस संबंध में अपनी सरकार की ‘निष्क्रियता’ पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। वहां के लोग इस घटना की तुलना श्रीलंका के नागरिक ‘अनोजन सिवारसा’ के मामले से कर रहे हैं, जिसकी ईश निंदा की मौत की सज़ा को अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक दबाव के बाद सऊदी अरब ने इसी महीने रद्द कर दिया था। इसके अतिरिक्त एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच जैसी वैश्विक संस्थाओं ने भी सऊदी अरब की न्यायिक प्रणाली और मृत्युदंड की बढ़ती दरों पर एक बार फिर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने इस बात की आलोचना की है कि बिना पारदर्शी अदालती कार्यवाही, बिना उचित क़ानूनी प्रतिनिधित्व के, और गुप्त रूप से विदेशी नागरिकों को फाँसी देना मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन है। ग़ौरतलब है कि सऊदी अरब में वर्तमान में क़रीब 35 लाख बांग्लादेशी प्रवासी मज़दूर रहते हैं, जो बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था के लिए प्रेषित धन का मुख्य माध्यम हैं। इस घटना के चलते बांग्लादेश सरकार के सामने अपने नागरिकों की सुरक्षा और सऊदी के साथ अपने मज़बूत आर्थिक व धार्मिक संबंधों को संतुलित रखने की एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती खड़ी हो गई है।

मक्का क्षेत्र व विशेष से इसके अंतर्गत आने वाली मस्जिदों की पवित्रता निश्चत रूप से सर्वोपरि है। परन्तु इस विशेष घटनाक्रम को लेकर एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच जैसे संगठनों ने न केवल सऊदी अरब की मृत्युदंड प्रणाली को बेहद गोपनीय और अपारदर्शी बताया है। बल्कि आरोपियों को निष्पक्ष सुनवाई ,उचित क़ानूनी प्रतिनिधित्व और पीड़ित पक्ष को अपनी रक्षा के लिए राजनयिक मदद लेने का पर्याप्त अवसर नहीं मिलने का भी आरोप लगाया है। अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुसार यदि मृत्युदंड दिया भी जाये तो इसे केवल “सबसे गंभीर अपराधों” जैसे जानबूझकर की गई हत्या के लिए ही होना चाहिए। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का तर्क है कि ‘अनैतिक कृत्य’ या ‘व्यभिचार’ जैसे आरोपों के लिए किसी की जान ले लेना मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन है।