सवाल मतदाता का है, जवाबदेही सरकार और चुनाव आयोग की भी है

The question is of the voter, accountability also lies with the government and the Election Commission.

सौरभ वार्ष्णेय

आज देश के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि कौन-सा राजनीतिक दल किसके पक्ष में खड़ा है, बल्कि सवाल यह है कि मतदाता के मन में उठ रहे संदेहों का समाधान कौन करेगा? लोकतंत्र की असली ताकत सत्ता के प्रचार में नहीं, बल्कि जनता के विश्वास में होती है। जब मतदाता सूची, चुनाव प्रक्रिया और निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर तरह-तरह के सवाल उठने लगें और उनके जवाब स्पष्ट तथा समय पर जनता के सामने न आएं, तो भ्रम की स्थिति पैदा होना स्वाभाविक है। यह स्थिति किसी एक दल या एक विचारधारा तक सीमित नहीं है। आज सत्ता पक्ष के पास अपनी बात जनता तक पहुंचाने के लिए तमाम साधन हैं। सरकार अपनी योजनाओं, उपलब्धियों और नीतियों का प्रचार पूरे जोर-शोर से करती है। यह उसका अधिकार भी है। लेकिन लोकतंत्र में केवल सरकार की बात जनता तक पहुंचना पर्याप्त नहीं है। सरकार के निर्णयों पर सवाल उठाने वाले नागरिकों, राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों को भी अपनी बात रखने का समान अवसर मिलना चाहिए और यही लोकतंत्र की खूबसूरती है।

निर्वाचन आयोग स्वयं मतदाता सेवाओं के लिए नाम खोजने, मतदाता सूची में संशोधन, शिकायत दर्ज करने और अपील जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराता है। वर्तमान में आयोग के पोर्टल पर एसआईआर 2026 से संबंधित सेवाएं भी उपलब्ध हैं। आयोग का घोषित उद्देश्य यह है कि कोई पात्र नागरिक मतदाता सूची से बाहर न रहे और कोई अपात्र व्यक्ति उसमें शामिल न हो। फिर सवाल यह है कि यदि व्यवस्था इतनी स्पष्ट है तो मतदाता के बीच भ्रम की गुंजाइश क्यों पैदा हो रही है? यही वह प्रश्न है जिसका जवाब केवल राजनीतिक बयानबाजी से नहीं दिया जा सकता। आज चुनाव आयोग को लेकर अलग-अलग राजनीतिक दलों और समूहों की ओर से अनेक दावे किए जा रहे हैं। इनमें से कौन-सा दावा तथ्यात्मक है और कौन-सा राजनीतिक आरोप—इसका फैसला जनता को प्रमाण और आधिकारिक जानकारी के आधार पर करना चाहिए। लेकिन यहां सरकार और निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी भी कम नहीं है।

यदि किसी चुनावी प्रक्रिया को लेकर जनता के मन में संदेह है तो उसका सबसे अच्छा उत्तर यह नहीं हो सकता कि सवाल उठाने वालों को ही कठघरे में खड़ा कर दिया जाए। बेहतर उत्तर है। सभी आंकड़े सार्वजनिक कीजिए प्रक्रिया समझाइए, आपत्तियों का जवाब दीजिए और जहां गलती हुई है, उसे स्वीकार कर सुधार कीजिए।निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक संस्था है और चुनाव प्रक्रिया में उसकी विश्वसनीयता लोकतंत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। आयोग स्वयं मतदाता सूची, पंजीकरण, संशोधन और शिकायतों के लिए आधिकारिक माध्यम उपलब्ध कराता है। इसलिए जनता के सवालों का जवाब भी उतनी ही स्पष्टता से आधिकारिक स्तर पर सामने आना चाहिए।

आखिर आंदोलन से डर क्यों? दूसरा बड़ा सवाल विरोध और आंदोलन को लेकर है। भारत का संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा शांतिपूर्ण और बिना हथियार सभा करने का अधिकार देता है। साथ ही संविधान यह भी स्पष्ट करता है कि इन अधिकारों पर कानून के अनुसार उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। इसलिए कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है। लेकिन कानून-व्यवस्था और लोकतांत्रिक असहमति के बीच अंतर करना भी उतना ही जरूरी है। यदि कोई राजनीतिक दल या जनप्रतिनिधि शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखना चाहता है, तो प्रशासन की भूमिका उसे पूरी तरह रोकने की बजाय ऐसी व्यवस्था बनाने की होनी चाहिए जिससे प्रदर्शन भी हो सके और आम जनता को असुविधा भी न हो।स्थान निर्धारित किया जा सकता है। समय निर्धारित किया जा सकता है। यातायात की व्यवस्था की जा सकती है। पुलिस बल तैनात किया जा सकता है। सुरक्षा के लिए आवश्यक शर्तें लगाई जा सकती हैं।लेकिन सवाल यह है कि क्या हर असहमति को कानून-व्यवस्था की समस्या मान लेना लोकतांत्रिक दृष्टि से उचित है? यह प्रश्न आज केवल विपक्ष का नहीं है। कल यही परिस्थिति किसी दूसरे राजनीतिक दल, किसी सामाजिक संगठन या आम नागरिक के सामने भी आ सकती है।

सरकार अपनी आलोचना सुनने की क्षमता भी दिखाए? लोकतंत्र में सरकार केवल इसलिए सरकार नहीं होती कि उसके पास बहुमत है। सरकार की वास्तविक लोकतांत्रिक शक्ति इस बात में भी दिखाई देती है कि वह आलोचना को किस प्रकार स्वीकार करती है। यदि कोई नागरिक सरकार से सवाल पूछता है, तो वह लोकतंत्र के खिलाफ नहीं होता। यदि कोई विपक्षी दल चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाता है, तो उसके आरोपों की जांच होनी चाहिए।

यदि आरोप गलत हैं तो तथ्य सामने रखकर उन्हें खारिज किया जाना चाहिए। यदि कोई शिकायत सही है तो उसका समाधान होना चाहिए। बल्कि कई बार सवाल दबाने की कोशिश ही उस सवाल को और बड़ा बना देती है।आज सोशल मीडिया के दौर में आधी-अधूरी जानकारी कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच जाती है। ऐसे में आधिकारिक संस्थाओं की चुप्पी या अस्पष्टता अफवाहों के लिए जगह बना सकती है।
निर्वाचन आयोग के पास इसका सबसे प्रभावी हथियार है तथ्य, दस्तावेज और पारदर्शी संवाद। मतदाता को राजनीति का नहीं, सत्य का भरोसा चाहिए। भारत का मतदाता राजनीतिक रूप से बेहद जागरूक है। वह सरकारें बनाता है और बदलता है। वह नेताओं के भाषण सुनता है, लेकिन अपने विवेक से मतदान करता है। इसलिए मतदाता को किसी दल के पक्ष या विपक्ष में खड़ा करने की बजाय उसे पूरी और सही जानकारी देना जरूरी है। मतदाता सूची में नाम है या नहीं ? नाम हटाया गया तो क्यों ?आपत्ति कैसे दर्ज होगी? सुधार कैसे होगा ? एसआईआर की प्रक्रिया क्या है? किस दस्तावेज की आवश्यकता है? किस अधिकारी के सामने अपील होगी? समय सीमा क्या है? इन सभी सवालों के जवाब सरल भाषा में घर-घर पहुंचने चाहिए। निर्वाचन आयोग की वेबसाइट और मतदाता सेवा पोर्टल पर नाम खोजने, आवेदन की स्थिति देखने, शिकायत दर्ज करने तथा अपील जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं। लेकिन केवल ऑनलाइन सुविधा पर्याप्त नहीं है। देश के करोड़ों नागरिकों तक सूचना पहुंचाने के लिए राजनीतिक दलों, प्रशासन, मीडिया और निर्वाचन तंत्र को मिलकर काम करना होगा।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राजनीतिक विरोध को व्यक्तिगत दुश्मनी में बदलने से लोकतंत्र कमजोर होता है। सत्ता पक्ष को यह समझना होगा कि विपक्ष का काम सवाल पूछना है और विपक्ष को यह समझना होगा कि हर आरोप को तथ्य के आधार पर ही मजबूत बनाया जा सकता है।

सरकार को सवालों से घबराने की जरूरत नहीं है। चुनाव आयोग को आलोचना से बचने की बजाय अपने काम की पारदर्शिता बढ़ाने की जरूरत है। विपक्ष को भी आरोपों के साथ प्रमाण रखने की जिम्मेदारी निभानी होगी। और जनता को भी किसी वायरल संदेश को सच मानने से पहले आधिकारिक स्रोतों से सत्यापन करना होगा। लोकतंत्र में भरोसा आदेश से पैदा नहीं होता, भरोसा पारदर्शिता से पैदा होता है। आज जरूरत इस बात की है कि केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग मिलकर देश को यह भरोसा दें कि मतदाता सूची और चुनाव प्रक्रिया में किसी भी पात्र नागरिक के अधिकार से समझौता नहीं होगा। साथ ही जो लोग सवाल उठा रहे हैं, उन्हें भी तथ्य सामने रखने और संवैधानिक रास्ते अपनाने का पूरा अवसर मिले। कानून-व्यवस्था जरूरी है, लेकिन लोकतांत्रिक अधिकार भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। शांतिपूर्ण विरोध को व्यवस्थित करना प्रशासन की जिम्मेदारी हो सकती है, लेकिन लोकतांत्रिक आवाज को अनावश्यक टकराव में बदलना किसी के हित में नहीं है।आज सरकार के सामने असली चुनौती विपक्ष को चुप कराना नहीं, बल्कि जनता के मन में पैदा हो रहे भ्रम को दूर करना है। और निर्वाचन आयोग के सामने चुनौती केवल चुनाव कराना नहीं, बल्कि हर मतदाता को यह विश्वास दिलाना है कि उसका नाम, उसका वोट और उसका लोकतांत्रिक अधिकार सुरक्षित है। क्योंकि अंतत: लोकतंत्र में सबसे बड़ा कोई नेता नहीं होता, सबसे बड़ी कोई सरकार नहीं होती और सबसे बड़ी कोई संस्था भी नहीं होती। यदि यह विश्वास मजबूत है तो लोकतंत्र मजबूत है। यदि यही विश्वास कमजोर पडऩे लगे, तो सत्ता के बड़े से बड़े प्रचार के बावजूद सवाल खड़े होते रहेंगे। इसलिए आज जरूरत किसी को हराने या किसी को बचाने की नहीं है। जरूरत है कि सवालों का जवाब देने की, भ्रम को दूर करने की और लोकतंत्र में जनता के विश्वास को मजबूत करने की।