विनोद कुमार विक्की
बिहार के जमुई में कोचिंग से लौट रही दसवीं कक्षा की छात्रा के साथ युवकों द्वारा सरेआम छेड़छाड़ और उसका वीडियो वायरल होने की घटना ने सभ्य समाज और मानवीयता को एक बार फिर शर्मसार कर दिया है। हालांकि इस प्रकरण में बिहार पुलिस की त्वरित कार्रवाई और आरोपियों की गिरफ्तारी सराहनीय है। किंतु घटनाक्रम के कुछ दिन बाद बिहार के समस्तीपुर और देश की राजधानी दिल्ली से भी छेड़छाड़ की अन्य विडियो एवं तस्वीरें वायरल हुई है।
इस वर्ष जून में राजस्थान के श्रीगंगानगर में नाबालिग लड़की के साथ 30 से अधिक लोगों द्वारा सामूहिक दुष्कर्म, अगस्त में दिल्ली की चलती बस में दुष्कर्म तथा सितंबर में संत स्वरूप नगर में दुष्कर्म एवं हत्या की घटनाओं के साथ-साथ पश्चिम बंगाल के बारुईपुर दुष्कर्म-हत्याकांड, सारण और बेगूसराय के सामूहिक दुष्कर्म जैसे मामलों को देश अभी भूल भी नहीं पाया था कि बक्सर में कथित शिक्षकों द्वारा दर्जनों छात्राओं के साथ कथित यौन उत्पीड़न का मामला सामने आया। इसी बीच जमुई की घटना ने एक बार फिर महिला सुरक्षा और नारी अस्मिता को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
छेड़छाड़ और दुष्कर्म जैसे महिला उत्पीड़न के अनेक मामले लोक-लज्जा, सामाजिक दबाव और भय के कारण थानों तक पहुँच ही नहीं पाते। जो मामले दर्ज होते हैं, वे समस्या की पूरी तस्वीर नहीं दिखाते। यौन हिंसा का सबसे भयावह रूप तब सामने आता है, जब दुष्कर्म के साथ हत्या या सामूहिक दुष्कर्म जैसी घटनाएँ जुड़ जाती हैं और यौन अपराध सीधे जीवन के अधिकार पर हमला बन जाता है।
वर्ष 2024 के आंकड़ों पर आधारित, वर्ष 2026 में जारी एनसीआरबी की हालिया रिपोर्टके अनुसार देश में महिलाओं के खिलाफ अपराध के कुल 4.41 लाख से अधिक मामले दर्ज किए गए थे, जिसमें घरेलू हिंसा, अपहरण और अन्य अपराध शामिल हैं। आंकड़ों के अनुसार, अपराध दर (प्रति लाख आबादी) 66.2 से घटकर 64.6 होने के बावजूद रेप के पंद्रह हजार से अधिक मामले दर्ज हुए। इस हिंसा का सबसे क्रूर चेहरा तब दिखता है जब मर्डर विद रेप/गैंगरेप के सैकड़ों मामले सामने आते हैं. जहां यौन अपराध सीधे हत्या में बदल जाते हैं।
हाल ही में चर्चित निठारी कांड के दोषी और मृत शरीर से यौनिक सुख प्राप्त करने के बाद उसे पकाकर खाने वाले दरिंदे सुरेंद्र कोली की मौत की खबर ने इस ओर फिर से ध्यानाकर्षित किया है। ऐसे दरिंदे हमारे तथाकथित सभ्य समाज में हमारे बीच ही रहते हैं। कानून सशक्त होने के बावजूद आए दिन शर्मसार करने वाली घटनाएं परिलक्षित होती है।
दो वर्षीया कन्या से साठ साल की वृद्धा तक ऐसे यौनिक कुंठा से ग्रस्त मानसिक रोगियों का शिकार हो रहे हैं। गौरतलब है कि अधिकांश मामलों में बलात्कारियों का कोई आपराधिक इतिहास नहीं होता। कई मामलों में आरोपी पड़ोसी, रिश्तेदार, परिचित, मित्र या सहकर्मी के रूप में पीड़िता के आसपास ही मौजूद होते हैं। इसलिए केवल किसी अजनबी को खतरे के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। सामाजिक संबंधों के भीतर मौजूद जोखिमों के प्रति भी सजग रहना आवश्यक है।
गैंगरेप के मामलों में एक सवाल विशेष रूप से विचारणीय है,जब कई लोग किसी अपराध में शामिल होते हैं। तब क्या समूह में एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं होता जिसकी चेतना और विवेक उसे तथा अपने साथियों को उस कुकृत्य से रोक सके? भीड़ में शामिल होकर व्यक्ति का विवेक समाप्त हो जाना समाज के लिए बेहद गंभीर चिंता का विषय है।
यौन हिंसा को केवल व्यक्ति विशेष की मानसिकता अथवा चारित्रिक पतन का परिणाम मानकर समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता। इसके पीछे अनेक सामाजिक, पारिवारिक, मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक कारण हो सकते हैं। मोबाइल तकनीक और इंटरनेट की आसान उपलब्धता ने जहाँ सूचना और मनोरंजन को हमारी मुट्ठी में ला दिया है, वहीं अश्लील सामग्री, आपत्तिजनक रीलों, पोर्नोग्राफिक वेबसाइटों तथा बिना पर्याप्त अभिभावकीय निगरानी के डिजिटल सामग्री तक पहुँच ने नई चुनौतियाँ भी पैदा की हैं। वेब सीरीज़ या किसी एक माध्यम को सीधे दुष्कर्म का कारण मानना उचित नहीं होगा, लेकिन यौनिक सामग्री के अनियंत्रित और कम उम्र में संपर्क के प्रभाव पर गंभीर सामाजिक विमर्श और शोध की आवश्यकता अवश्य है।
इसी तरह शराब और अन्य नशीले पदार्थों के दुरुपयोग को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। नशा अपराध का स्वतः कारण नहीं है, लेकिन कई हिंसक घटनाओं में नशे की भूमिका जोखिम को बढ़ाने वाले कारक के रूप में सामने आ सकती है।
कानून का सशक्त होना आवश्यक है, लेकिन केवल कानून बना देने से समाज सुरक्षित नहीं हो जाता। कानून के प्रभावी क्रियान्वयन के साथ बच्चों और युवाओं में लैंगिक संवेदनशीलता, सहमति की समझ, पारिवारिक संवाद, डिजिटल साक्षरता और नैतिक शिक्षा को भी मजबूत करना होगा। परिवार, विद्यालय, समाज, प्रशासन और डिजिटल मंचों,सभी को अपनी-अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।
नारी को केवल भोग की वस्तु नहीं, बल्कि समान अधिकार और गरिमा रखने वाले मनुष्य के रूप में देखने की सामाजिक दृष्टि विकसित करनी होगी। जब तक स्त्री की इच्छा, सहमति और सम्मान को व्यवहार का अनिवार्य हिस्सा नहीं बनाया जाएगा, तब तक कानून और तकनीक दोनों अकेले इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं दे सकते।





