श्मशान घाटों में कथित तांत्रिक गतिविधियों की खबरें समाज के लिए चेतावनी हैं, लेकिन डर और अफवाह नहीं, विवेक और वैज्ञानिक सोच ही हमारा सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है।
डॉ. सत्यवान सौरभ
दीपावली प्रकाश, उल्लास और सकारात्मकता का पर्व है। यह त्योहार हमें अंधकार से प्रकाश की ओर, निराशा से आशा की ओर और अज्ञान से ज्ञान की ओर बढ़ने का संदेश देता है। लेकिन विडंबना देखिए कि जिस पर्व पर हम घर-घर दीप जलाकर खुशियों का स्वागत करते हैं, उसी समय कुछ लोग समाज में अंधविश्वास, भय और भ्रम का अंधेरा फैलाने का प्रयास करते हैं। हरियाणा के गांवों में श्मशान घाटों और सुनसान स्थानों पर कथित तांत्रिक गतिविधियों तथा संदिग्ध वस्तुएं मिलने की खबरों के बीच ग्रामीणों को सतर्क रहने की अपील की जा रही है। ऐसी परिस्थितियों में सावधानी आवश्यक है, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक है कि हम विवेक बनाए रखें और किसी भी प्रकार के अंधविश्वास का शिकार न बनें।
श्मशान घाट किसी भी गांव की सामाजिक व्यवस्था का एक हिस्सा होते हैं। वे अंतिम संस्कार जैसे गंभीर और संवेदनशील कार्यों से जुड़े सार्वजनिक स्थल हैं। दुर्भाग्यपूर्ण है कि कुछ लोग इन्हीं स्थानों को रहस्य, भय और तंत्र-मंत्र की कहानियों से जोड़कर लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करते हैं। कभी नींबू, मिर्च, सिंदूर, राख, गुड़िया, हड्डियों जैसी दिखने वाली वस्तुओं या अन्य संदिग्ध सामान को लेकर तरह-तरह की बातें फैलाई जाती हैं। इन वस्तुओं को देखकर कुछ लोग तत्काल किसी अनहोनी, जादू-टोने या कथित तांत्रिक क्रिया का निष्कर्ष निकाल लेते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि किसी वस्तु के वहां पड़े होने मात्र से किसी अलौकिक शक्ति या तंत्र-मंत्र की पुष्टि नहीं होती।
समाज को यह समझना होगा कि तंत्र-मंत्र के नाम पर लोगों को डराना, उनकी आर्थिक मजबूरी और मानसिक परेशानी का फायदा उठाना तथा चमत्कारों के नाम पर धन ऐंठना शोषण का एक तरीका है। कई बार बीमारी, पारिवारिक विवाद, आर्थिक संकट, संतान संबंधी चिंता और व्यक्तिगत परेशानियों से जूझ रहे लोग ऐसे कथित बाबाओं और तांत्रिकों के चंगुल में फंस जाते हैं। उन्हें बताया जाता है कि उनके परिवार पर किसी ने जादू-टोना कर दिया है, घर में नकारात्मक शक्ति है या किसी विशेष पूजा के बिना संकट दूर नहीं होगा। भयभीत परिवार अपनी मेहनत की कमाई ऐसे लोगों पर खर्च कर देते हैं। परिणामस्वरूप समस्या का समाधान तो नहीं होता, बल्कि आर्थिक और मानसिक परेशानी और बढ़ जाती है।
विज्ञान ने आज जीवन के लगभग हर क्षेत्र में असंभव दिखाई देने वाली उपलब्धियां हासिल की हैं। चिकित्सा विज्ञान बीमारियों का उपचार कर रहा है, कृषि विज्ञान किसानों की उत्पादकता बढ़ा रहा है और तकनीक ने दुनिया को एक-दूसरे के करीब ला दिया है। ऐसे समय में किसी भी समस्या का समाधान तंत्र-मंत्र, टोने-टोटके या कथित चमत्कारों में तलाशना विवेकपूर्ण दृष्टिकोण नहीं कहा जा सकता। बीमारी का इलाज डॉक्टर से, कानूनी समस्या का समाधान कानून से और पारिवारिक समस्या का समाधान संवाद एवं समझदारी से होना चाहिए। किसी भी परेशानी को अदृश्य शक्तियों के नाम पर छोड़ देना समस्या से भागने जैसा है।
हालांकि ग्रामीणों की सतर्कता को कम करके नहीं आंका जा सकता। यदि किसी गांव के श्मशान घाट, खेत, सुनसान रास्ते या सार्वजनिक स्थान पर संदिग्ध वस्तुएं अथवा गतिविधियां दिखाई दें तो इसकी सूचना तुरंत पुलिस प्रशासन को दी जानी चाहिए। ग्रामीण स्वयं किसी वस्तु को छूने, हटाने या उसकी जांच करने का प्रयास न करें। संदिग्ध गतिविधियों की तस्वीर या जानकारी सुरक्षित दूरी से पुलिस को दी जा सकती है। किसी व्यक्ति पर बिना प्रमाण आरोप लगाना, भीड़ इकट्ठी करना या कानून अपने हाथ में लेना उचित नहीं है। कई बार छोटी-सी अफवाह बड़ी घटना का रूप ले सकती है। इसलिए प्रशासन की जांच और आधिकारिक जानकारी पर ही भरोसा करना चाहिए।
सोशल मीडिया के इस दौर में अफवाहें फैलाना बेहद आसान हो गया है। कोई व्यक्ति किसी सुनसान जगह पर पड़ी वस्तु की तस्वीर खींचकर उसके साथ तंत्र-मंत्र की कहानी जोड़ देता है और देखते ही देखते वह संदेश अनेक गांवों तक पहुंच जाता है। लोग बिना सत्यापन के उसे आगे साझा करने लगते हैं। इससे ग्रामीणों में भय का वातावरण बनता है और कभी-कभी निर्दोष लोगों को भी संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगता है। यह स्थिति सामाजिक सौहार्द और कानून-व्यवस्था दोनों के लिए नुकसानदायक है। हमें समझना होगा कि हर वायरल संदेश सच नहीं होता और हर असामान्य वस्तु का संबंध किसी तांत्रिक गतिविधि से नहीं होता।
हरियाणा के गांवों की पहचान आपसी भाईचारे, सामाजिक सहयोग और सामूहिक जिम्मेदारी से रही है। गांवों में चौपाल, पंचायत और सामाजिक संस्थाएं जागरूकता फैलाने का प्रभावी माध्यम बन सकती हैं। ग्राम पंचायतों को चाहिए कि वे श्मशान घाटों, सार्वजनिक स्थलों और सुनसान रास्तों पर पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था तथा आवश्यक सुरक्षा प्रबंध करें। ग्रामीणों को पुलिस के संपर्क नंबर उपलब्ध कराए जाएं और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना देने के लिए जागरूक किया जाए। दीपावली के अवसर पर विशेष रूप से युवाओं को जिम्मेदारी निभानी चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं कि वे किसी प्रकार की निगरानी के नाम पर किसी को परेशान करें, बल्कि उनका उद्देश्य सुरक्षित वातावरण और सही जानकारी सुनिश्चित करना होना चाहिए।
अभिभावकों की भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है कि वे बच्चों को भूत-प्रेत, चुड़ैल, जादू-टोना और तांत्रिक शक्तियों के नाम पर भयभीत न करें। बचपन से ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण, तार्किक सोच और प्रश्न पूछने की आदत विकसित करनी चाहिए। बच्चों को बताना चाहिए कि अंधेरे स्थानों से सावधानी बरतना समझदारी है, लेकिन किसी काल्पनिक शक्ति से डरना आवश्यक नहीं। वास्तविक खतरे अपराध, असामाजिक गतिविधियां और असुरक्षित परिस्थितियां हैं, जिनसे बचाव जागरूकता, सुरक्षा और कानून के माध्यम से किया जा सकता है।
धर्म और आस्था व्यक्ति को नैतिकता, करुणा, सेवा और सद्भाव का संदेश देते हैं। लेकिन आस्था के नाम पर भय फैलाना, लोगों को भ्रमित करना और उनकी मजबूरी का आर्थिक लाभ उठाना किसी भी दृष्टि से स्वीकार्य नहीं है। पूजा-पाठ व्यक्ति की निजी श्रद्धा का विषय हो सकता है, लेकिन अंधविश्वास को सामाजिक समस्या बनने से रोकना हम सबकी जिम्मेदारी है।
दीपावली पर हमें केवल अपने घरों में दीपक नहीं जलाने, बल्कि अपने विचारों में भी ज्ञान और विवेक का प्रकाश फैलाने की आवश्यकता है। श्मशान घाटों में संदिग्ध वस्तुएं मिलने की खबरों को गंभीरता से लेते हुए पुलिस को सूचना दें, लेकिन उन्हें तंत्र-मंत्र या चमत्कार से जोड़कर भय का माहौल न बनाएं। किसी के बहकावे में न आएं, किसी कथित तांत्रिक के झांसे में न फंसें और बिना प्रमाण किसी पर आरोप न लगाएं।
याद रखिए, इन टोने-टोटकों और कथित चमत्कारों से जीवन की समस्याएं हल नहीं होतीं। मेहनत, चिकित्सा, शिक्षा, विज्ञान, कानून और सकारात्मक सोच ही वास्तविक समाधान हैं। समाज को डर की नहीं, जागरूकता की जरूरत है। इस दीपावली संकल्प लें कि हम अंधविश्वास से दूर रहेंगे, अफवाहों को आगे नहीं बढ़ाएंगे और हरियाणा के गांवों को सुरक्षित, शिक्षित तथा वैज्ञानिक सोच वाला समाज बनाने में योगदान देंगे।
क्योंकि वास्तविक प्रकाश दीपक से ही नहीं, मनुष्य के विवेक और विचारों से भी फैलता है।





