सरदार वल्लभभाई पटेल का जीवन अदम्य साहस, अटूट इच्छाशक्ति और कर्त्तव्यनिष्ठा की ऐसी प्रेरक गाथा है, जिसमें व्यक्तिगत पीड़ा भी कर्त्तव्य के संकल्प को डिगा नहीं सकी। बचपन की निर्भीकता से लेकर राष्ट्र की एकता के ऐतिहासिक दायित्व तक, उनका प्रत्येक कदम दृढ़ चरित्र और अटूट राष्ट्रसमर्पण का परिचायक रहा। उनका लौह व्यक्तित्व आज भी पीढ़ियों को प्रेरित करता है। इन्हीं लौहपुरूष की 31 अक्तूबर को जयंती है।
श्वेता गोयल
राष्ट्रीय एकता की मिसाल रहे सरदार पटेल ने सदैव देशवासियों के लिए अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किए। समय-समय पर उन्होंने अपने वक्तव्यों द्वारा लोगों को आलस्य त्यागने, मेहनत करने, ईश्वर तथा सत्य में विश्वास रखने, अन्याय का डटकर मुकाबला करने जैसे प्रेरक संदेश दिए और देश के लिए कुछ अलग हटकर कार्य करने को प्रेरित किया। वे कहा करते थे कि जो काम कल करना है, उसकी बातों में ही आज का काम बिगड़ जाएगा और आज के काम के बिना कल का काम नहीं होगा, इसलिए आज का काम कीजिए तो कल का काम अपने आप हो जाएगा। कल हमें कोई मदद देने वाला है, सही सोचकर अगर आज बैठे रहे तो आज भी बिगड़ जाएगा और कल तो बिगड़ेगा ही। कोशिश करना हमारा फर्ज है और अगर हम अपने फर्ज को ही पूरा न करें तो हम ईश्वर के गुनाहगार बनते हैं। कर्म पूजा है लेकिन हास्य जीवन है और जो कोई भी अपना जीवन बहुत गंभीरता से लेता है, उसे एक तुच्छ जीवन के लिए तैयार रहना चाहिए। पिछला दुखड़ा रोना कायरों का काम है और हिसाब लगाकर मुकाबले की तैयारी करना बहादुरों का काम है। कठिन समय में कायर लोग बहाना ढूंढ़ते हैं जबकि बहादुर व्यक्ति रास्ता खोज लेते हैं। उतावले उत्साह से बड़ा परिणाम निकलने की आशा नहीं रखनी चाहिए।
सरदार पटेल कहते थे कि बेकार मत बैठिये क्योंकि बेकार बैठने वाला अपना ही सत्यानाश कर डालता है। रात-दिन कार्य करने वाला अपनी इन्द्रियों को आसानी से वश में कर लेता है, इसलिए आलस्य छोडि़ये। उनका कहना था कि अगर कोई चीज मुफ्त मिलती है तो उसकी कीमत कम हो जाती है जबकि परिश्रम से पाई हुई चीज की कीमत ठीक तरीके से लगाई जाती है। लोगों को मेहनत और कर्म करने के लिए प्रेरित करते हुए वह कहते थे कि यह सच है कि पानी में तैरने वाले ही डूबते हैं, किनारे पर खड़े रहने वाले नहीं लेकिन इससे भी बड़ा सच यह है कि किनारे पर ही खड़े रहने वाले लोग तैरना भी नहीं सीखते। अहिंसा का समर्थन करते हुए सरदार पटेल का कहना था कि कायरों की अहिंसा का कोई मूल्य नहीं है। जो तलवार चलाना जानते हुए भी तलवार को म्यान में रखता है, उसी की अहिंसा सच्ची अहिंसा होती है। वह कहते थे कि आपकी अच्छाई आपके मार्ग में बाधक है, इसलिए अपनी आंखों को क्रोध से लाल होने दीजिए और अपने मजबूत हाथों से अन्याय का डटकर सामना कीजिए।
लौहपुरूष सरदार वल्लभ भाई पटेल सदैव कहते थे कि गरीबों की सेवा ही ईश्वर की सेवा है। उनका कहना था कि हमारा सिर कभी न झुकने वाला होना चाहिए। हमें केवल भगवान के आगे झुकना चाहिए, दूसरों के आगे नहीं। जो कोई भी सुख और दुःख का समान रूप से स्वागत करता है, वास्तव में वही सबसे अच्छी तरह से जीवन जीता है। हमें सदैव ईश्वर और सत्य में विश्वास रखकर प्रसन्न रहना चाहिए। यहां तक कि अगर हम हजारों की दौलत भी गंवा दें और हमारा जीवन बलिदान हो जाए तो भी हमें मुस्कुराते रहना चाहिए। बहुत बोलने से कोई लाभ नहीं होता बल्कि हानि ही होती है। हमें गम खाना सीखना चाहिए और मान-अपमान सहन करने की आदत डालनी चाहिए।
सरदार वल्लभभाई पटेल का व्यक्तित्व केवल अदम्य साहस, दृढ़ इच्छाशक्ति और राजनीतिक दूरदर्शिता तक सीमित नहीं था, उनके हृदय में देश के सबसे साधारण और कमजोर व्यक्ति के प्रति भी गहरी संवेदना थी। वे भारत को केवल राजनीतिक रूप से स्वतंत्र और एकीकृत राष्ट्र के रूप में नहीं देखना चाहते थे बल्कि उनकी कल्पना ऐसे समृद्ध, आत्मनिर्भर और न्यायपूर्ण भारत की थी, जहां विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे और किसी को भी अभाव, भूख तथा विवशता के आंसू न बहाने पड़ें। उनकी एक अभिलाषा थी कि भारत एक अच्छा उत्पादक देश बने और यहां कोई भी व्यक्ति अन्न के अभाव में भूखा न सोए। उनका यह विचार उनकी जनकल्याणकारी दृष्टि, आर्थिक आत्मनिर्भरता और सामाजिक सरोकारों का परिचायक है। वे भली-भांति समझते थे कि किसी राष्ट्र की वास्तविक समृद्धि उसके बड़े उद्योगों, ऊंची इमारतों या आर्थिक आंकड़ों से नहीं, उसके सामान्य नागरिक के जीवन में आए सकारात्मक बदलाव से मापी जाती है।
पटेल का मानना था कि प्रत्येक मनुष्य सम्मान का अधिकारी है। व्यक्ति को इतना सम्मान अवश्य मिलना चाहिए कि उसका आत्मसम्मान बना रहे लेकिन उसे अपने पद, प्रतिष्ठा या उपलब्धियों के अहंकार में इतना भी नहीं डूबना चाहिए कि उसे कभी नीचे आने की आशंका ही न रहे। उनके विचारों में मानवीय गरिमा के साथ विनम्रता और सामाजिक समानता का भी गहरा संदेश निहित था। उनकी दूरदर्शिता और धैर्य का परिचय देने वाला आम के फल का उदाहरण भी अत्यंत प्रेरक है। उनका मानना था कि आम को समय से पहले तोड़ने पर वह खट्टा ही निकलेगा और उसका स्वाद भी अच्छा नहीं होगा लेकिन यदि उसे प्राकृतिक रूप से पकने का अवसर दिया जाए तो वह स्वयं पेड़ से टूटकर मीठा और अमृत के समान स्वादिष्ट हो जाएगा। इस उदाहरण के माध्यम से वे धैर्य, समय की महत्ता और परिस्थितियों के स्वाभाविक परिपक्व होने की आवश्यकता समझाते थे। दरअसल, उनका जीवन संदेश देता है कि राष्ट्र निर्माण हो अथवा सामाजिक परिवर्तन, जल्दबाजी के बजाय धैर्य, विवेक, परिश्रम और दूरदृष्टि से ही स्थायी सफलता प्राप्त की जा सकती है। यही विचार उन्हें केवल लौहपुरुष नहीं बल्कि संवेदनशील राष्ट्र निर्माता के रूप में भी स्थापित करते हैं।





