अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में ट्रंप की सत्ता को ऐतिहासिक हार क़ा महाझटका!

Historic defeat to Trump's government in the US midterm elections!

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

वैश्विक स्तरपर दुनियाँ के सबसे पुराने लोकतंत्र व विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था या यूँ कहें कि पूरे विश्वपर अनौपचारिक रूप से राज़ करने वाले अमेरिका के मध्यावधि चुनावों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की राजनीति में ऐतिहासिक मोड़ ला दिया है। अभी वर्तमान विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी ने प्रतिनिधि सभा और सीनेट,दोनों में बहुमत हासिल कर लिया है। हालांकि अमेरिका के इतिहास में यह कोई पहली बार नहीं हुआ है।पिछले 20 वर्षों में पांच मिडटर्म चुनाव हुए। इन सभी में राष्ट्रपति की पार्टी ने प्रतिनिधि सभा में सीटें गंवाईं। यह परिणाम केवल विपक्ष की चुनावी सफ़लता नहीं, बल्कि महंगाई, जीवन- यापन की लागत, ईरान युद्ध और ट्रंप प्रशासन की नीतियों के प्रति मतदाताओं की नाराज़गी का संकेत भी है, ऐसा माना जा रहा है कि जिसका पहले से ही अंदेशा भी था? मीडिया के अनुसार, विपक्षी पार्टी डेमोक्रेट्स ने प्रतिनिधि सभा में बहुमत के लिए आवश्यक 218 सीटों का आंकड़ा पार कर लिया और सीनेट पर भी नियंत्रण हासिल किया।चुनावी गणित: कांग्रेस के दोनों सदनों में डेमोक्रेट्स की वापसी करीब करीब सुनिश्चित हो गई है प्रतिनिधि सभा 225 – डेमोक्रेट्स 137 रिपब्लिकन सीटें घोषित बहुमत: 218 / 435 सीनेट 51+, डेमोक्रेटिक गठबंधन बहुमत का आंकड़ा पार,बहुमत: 51/ 100,4 नवंबर को उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार,प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेट्स ने 225 और रिपब्लिकन ने 137 सीटें जीत ली थीं, बस मिनट में 54 सीटें प्राप्त कर ली थी,जबकि शेष सीटों पर मतगणना जारी थी।सीनेट में भी डेमोक्रेट्स नेरिपब्लिकन बहुमत समाप्त कर दिया। कई महत्वपूर्ण रिपब्लिकन सीटों पर डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों की जीत ने सत्ता का संतुलन बदल दिया। अंतिम प्रमाणित सीटों की संख्या राज्यवार मतगणना और प्रमाणन के बाद स्पष्ट होगी। अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों की तुलना भारत की संसद से की जा सकती है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा भारत की लोकसभा के समान जनता का प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व करती है। इसकी सभी 435 सीटों पर हर दो वर्ष में चुनाव होता है। अमेरिकी सीनेट भारत की राज्यसभा की तरह एक उच्च सदन है, लेकिन दोनों में महत्वपूर्ण अंतर हैं। अमेरिकी सीनेट में 100 सदस्य होते हैं, प्रत्येक राज्य से दो,और उनका कार्यकाल छह वर्ष होता है।भारत में राज्यसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 250 है, वर्तमान संवैधानिक सीमा के अंतर्गत 245 सदस्य हो सकते हैं, जिनमें 12 राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत होते हैं। राज्यसभा स्थायी सदन है और इसके लगभग एक- तिहाई सदस्य प्रत्येक दो वर्ष में सेवानिवृत्त होते हैं।

साथियों बात अगर हम ट्रंप की हार:कार्यकाल नहीं, राजनीतिक शक्ति पर असर को समझने की करें तो मिडटर्म चुनाव राष्ट्रपति का चुनाव नहीं है। ट्रंप का चार वर्ष का राष्ट्रपति कार्यकाल जनवरी 2029 तक जारी रहेगा। चुनाव में हार से उनका कार्यकाल छोटा नहीं होगा, लेकिन कानून पारित करना, बजट मंजूर कराना और प्रशासनिक नियुक्तियों को आगे बढ़ाना कठिन हो सकता है।डेमोक्रेटिक बहुमत वाली समितियां अब ट्रंप प्रशासन के फैसलों,सरकारी खर्च, आव्रजन नीति, व्यापारिक टैरिफ और युद्ध संबंधी निर्णयों की जांच कर सकती हैं।महाभियोग की प्रक्रिया भी शुरू की जा सकती है, लेकिन केवल चुनाव हारने से महाभियोग स्वतः नहीं होता। राष्ट्रपति को पद से हटाने के लिए प्रतिनिधि सभा में महाभियोग और सीनेट में दोषसिद्धि के लिए दो-तिहाई समर्थन आवश्यक है।पिछले 20 वर्षों में2006 2010, 2014, 2018 और 2022 के पांच मिडटर्म चुनाव हुए। इन सभी में राष्ट्रपति की पार्टी ने प्रतिनिधि सभा में सीटें गंवाईं। जॉर्ज डब्ल्यू. बुश, बराक ओबामा, डोनाल्ड ट्रंप और जो बाइडेन के कार्यकालों में यह राजनीतिक पैटर्न दिखाई दिया। सीनेट में स्थिति अलग रही: 2006 और 2014 में राष्ट्रपति की पार्टी ने नियंत्रण गंवाया, जबकि 2010, 2018 और 2022 में बहुमत बरकरार रखा या मजबूत किया। यह ऐतिहासिक प्रवृत्ति बताती है कि मिडटर्म चुनाव अक्सर राष्ट्रपति के लिए जनमत की सटीकता से परीक्षा होते हैं।

साथियों बात अगर हम अब ट्रंप की नीतियों का क्या होगा? इसको समझने की करें तो,डेमोक्रेटिक नियंत्रण से ट्रंप की नीतियों पर संसदीय अंकुश बढ़ेगा, लेकिन उनकी सभी नीतियां स्वतः समाप्त नहीं होंगी।टैरिफ और अमेरिका फर्स्ट: कांग्रेस को विदेशी व्यापार और आयात शुल्क पर संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं। राष्ट्रपति को कुछ कानूनों के अंतर्गत टैरिफ लगाने की शक्तियां भी मिली हैं। डेमोक्रेट्स टैरिफ से जुड़े कानूनों, बजट और प्रशासनिक फैसलों की समीक्षा कर सकते हैं, लेकिन हर टैरिफ को तत्काल समाप्त नहीं कर सकते।आव्रजन और वीजा: भारतीय छात्रों,आईटी पेशेवरों और एच -1बी वीजा धारकों के लिए अधिक निष्पक्ष आव्रजन नीति की संभावना बन सकती है।हालांकि वीजा नियमों मेंबदलाव के लिए प्रशासनिक निर्णय, कानून और संबंधित एजेंसियों की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी। तत्काल वीजा राहत की गारंटी नहीं है।वेनेजुएला और विदेश नीति: वेनेजुएला को अमेरिका का 51वां राज्य बनाने जैसे राजनीतिक बयानों को वास्तविक नीति या संवैधानिक प्रक्रिया नहीं माना जा सकता। कांग्रेस विदेश नीति, सैन्य खर्च और प्रतिबंधों पर निगरानी बढ़ा सकती है, लेकिन राष्ट्रपति की कूटनीतिक शक्तियां बनी रहेंगी।

साथियों बात अगर हम इस मिड टर्म चुनाव 3 नवंबर 2026 में भारतीय-अमेरिकी और मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका को समझने की करें तोमिशिगन में 42 वर्षीय डेमोक्रेटिक उम्मीदवार अब्दुल अल-सैयद ने रिपब्लिकन माइक रोजर्स को हराकर अमेरिकी सीनेट में पहुंचने वाले पहले मुस्लिम व्यक्ति बनने का इतिहास रचा।उन्होंने स्वास्थ्य सेवा,जीवन-यापन की लागत और राजनीति में कॉरपोरेट धन के प्रभाव को अपने अभियान का केंद्र बनाया। ट्रंप के तीखे हमलों के बावजूद उनकी जीत ने मुस्लिम -अमेरिकी समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को नई पहचान दी।हालांकि मुस्लिम और भारतीय- अमेरिकी मतदाताओं ने कितने प्रतिशत वोट देकर चुनाव परिणाम बदल दिया, इसका सटीक राष्ट्रीय आंकड़ा अभी उपलब्ध नहीं है। इसलिए उनकी भूमिका को महत्वपूर्ण कहा जा सकता है, लेकिन पूरी चुनावी जीत का श्रेय किसी एक समुदाय को देना उचित नहींहोगा।भारतीय -अमेरिकी समुदाय के लिए भी चुनाव परिणाम महत्वपूर्ण रहे। फ्लोरिडा से पिया डंडिया और वर्जीनिया से सुहास सुब्रमण्यम की जीत,मैरीलैंड में अरुणा मिलर की पुनर्निर्वाचित सफलता तथा अन्य भारतीय मूल के उम्मीदवारों के प्रदर्शन ने अमेरिकी राजनीति में इस समुदाय की बढ़ती भागीदारी को दर्शाया।

साथियों बात अगर हम भारत -अमेरिका संबंध,युद्ध और अर्थव्यवस्था को समझने की करें तो,भारत के लिए डेमोक्रेटिक कांग्रेस के आने से व्यापारिक वार्ताओं में अधिक संस्थागत संवाद की संभावना है।भारतीय निर्यातकों को टैरिफ पर पुनर्विचार से लाभ हो सकता है, लेकिन यह स्वतः होने वाला बदलाव नहीं है। रक्षा सहयोग, क्वाड, तकनीक, ऊर्जा और चीन के संदर्भ में रणनीतिक साझेदारी दोनों देशों के साझा हितों पर आधारित है, इसलिए राजनीतिक बदलाव के बावजूद इनके जारी रहने की संभावना है।ईरान युद्ध चुनाव का महत्वपूर्ण मुद्दा रहा।रॉयटर्स के अनुसार, ट्रंप ने चुनावी हार में ईरान युद्ध की भूमिका स्वीकार की, लेकिन अपने सैन्य निर्णय का बचाव भी किया। ईरान के संसद अध्यक्ष ने परिणाम का स्वागत करते हुए कहा कि अमेरिकी मतदाताओं ने युद्ध के विरुद्ध मतदान किया।

साथियों, रूस-यूक्रेन युद्ध, ईरान-अमेरिका संघर्ष और क्षेत्रीय तनावों पर डेमोक्रेटिक कांग्रेस अधिक जांच और जवाबदेही की मांग कर सकती है। हालांकि युद्ध समाप्त करने का निर्णय केवल चुनाव परिणाम से नहीं होगा; राष्ट्रपति, सैन्य नेतृत्व, कूटनीतिक वार्ताएं और संबंधित देशों की रणनीति भी निर्णायक होंगी।अमेरिकी शेयर बाजार में चुनाव परिणाम के बाद राहत की उम्मीद और नीतिगत अनिश्चितता दोनों रह सकती हैं।टैरिफ में संभावित नरमी से आयात लागत घट सकती है, जबकि सरकारी खर्च, ऋण सीमा और बजट पर टकराव बाजारों में अस्थिरता पैदा कर सकता है। भारतीय बाजारों को अमेरिकी व्यापार नीति में स्थिरता से लाभ मिल सकता है, लेकिन वैश्विक तेल कीमतें, डॉलर और युद्ध की स्थिति भी भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेंगी।

साथियों बात अगर हम वैश्विक स्तर पर,इस चुनावी झटके को समझने की करें तो अमेरिकी मिडटर्म इलेक्शन में डेमोक्रेट्स के सीनेट और हाउस, दोनों पर कब्जा करने के बाद, वैश्विक शेयरों और डॉलर ने रात भर के निचले स्तरों से वापसी की है।इस नतीजे ने यह डर भी पैदा कर दिया है कि एआई सेक्टर की तेज वृद्धि पर रेगुलेटरी जांच (नियामक निगरानी) की वजह से रोक लग सकती है। यूरोप में सुबह जैसे-जैसे नतीजे आ रहे हैं, एमएससी आई का ऑल-वर्ल्ड इंडेक्स 0.13 प्रतिशत ऊपर है,जबकि यूरोप का स्टॉक्सक्स 600 इंडेक्स जो एआई से जुड़े जोखिमों के खिलाफ एक बचाव (हेज) के रूप में काम करता है-0.5 प्रतिशत ऊपर है। चीन के शेयर बेंचमार्क में दो प्रतिशत से ज़्यादा की उछाल आई है, जो पिछले सात महीनों में इसका सबसे अच्छा दिन है। डेमोक्रेट्स की जीत के बाद क्रिप्टोकरेंसी में जो गिरावट आई थी, अब उसमें सुधार हुआ है।वैश्विक स्तर पर, इस चुनावी झटके को ट्रंप की नीतियों के खिलाफ एक बड़े जनादेश के रूप में देखा जा रहा है। ईरान के शीर्ष वार्ताकारों ने इसे युद्ध के खिलाफ अमेरिकी मतदाताओं का संदेशकरार दिया है जबकि स्पेन के पीएम और फ्रांस के मंत्रियों जैसे यूरोपीय नेताओं ने इसे दक्षिणपंथी लहर के कमजोर होने और वैश्विक स्तर पर नीतियों में बदलाव के संकेत के रूप में रेखांकित किया है। वैश्विक शेयर और कमोडिटी बाजारों में भी इन नतीजों के बाद भारी हलचल देखी गई है,जहां निवेशकों ने राजनीतिक नियंत्रण में आए इस बड़े बदलाव के अनुसार अपनी रणनीतियां बदलना शुरू कर दिया है।नई दिल्ली में भारतीय अधिकारी और व्यापारिक विशेषज्ञ इस परिणाम को सतर्कता लेकिन थोड़ी उम्मीद के साथ देख रहे हैं; उनका मानना है कि अमेरिकी कांग्रेस पर डेमोक्रेट्स का नियंत्रण राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की एकतरफा शुल्क (टैरिफ) नीतियों पर विधायी अंकुश लगा सकता है,जिससे भारत को द्विपक्षीय व्यापार वार्ताओं में एक बेहतर अवसर मिल सकता है। हालांकि मानवाधिकारों और एच-1बी वीजा नीतियों पर डेमोक्रेट्स के कड़े रुख के कारण भारत के लिए कुछ नईअनिश्चितताएं भी पैदा हो सकती हैं।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर उसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि ट्रंप के लिए चेतावनी, अमेरिकी लोकतंत्र के लिए परीक्षा,2026 का मिडटर्म चुनाव ट्रंप के लिए स्पष्ट राजनीतिक चेतावनी है। मतदाताओं ने महंगाई, युद्ध, आव्रजन और शासन शैली पर अपनी नाराजगी व्यक्त की है। डेमोक्रेट्स को अब यह साबित करना होगा कि संसदीय बहुमत का उपयोग केवल विरोध के लिए नहीं, बल्कि आम नागरिकों की आर्थिक और सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए किया जा सकता है।आने वाले दो वर्ष अमेरिकी लोकतंत्र, भारत- अमेरिका संबंधों और वैश्विक आर्थिक स्थिरता के लिए निर्णायक होंगे। चुनाव ने सत्ता का संतुलन बदला है, लेकिन वास्तविक बदलाव इस बात पर निर्भर करेगा कि कांग्रेस और राष्ट्रपति टकराव के बजाय जवाबदेही, संवाद और जनहित को कितना प्राथमिकता देते हैं।