अश्लीलता के खिलाफ भी अब हो आंदोलन

There should now be a movement against obscenity as well

डॉ. प्रियंका सौरभ

मनोरंजन समाज का दर्पण भी होता है और दिशा-निर्देशक भी। जिस समाज का मनोरंजन जैसा होता है, धीरे-धीरे उसकी भाषा, व्यवहार, सोच और सामाजिक संस्कृति भी उसी दिशा में प्रभावित होने लगती है। इसलिए यह प्रश्न आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है कि क्या हम मनोरंजन के नाम पर सब कुछ स्वीकार करने के लिए तैयार हैं? हरियाणा के रोहतक जिले के महम चौबीसी के चौबूतरे पर महिला डांसरों द्वारा प्रस्तुत अश्लील नृत्य, गीत और वीडियो के विरोध में उठी आवाज़ केवल एक स्थानीय घटना नहीं है। यह उस व्यापक चिंता का प्रतीक है जिसे देश का एक बड़ा वर्ग महसूस कर रहा है। लेकिन यदि यह आंदोलन केवल मंचों और सार्वजनिक आयोजनों तक सीमित रह गया, तो शायद यह अधूरा आंदोलन होगा। आज आवश्यकता इस बात की है कि अश्लीलता के हर रूप पर समान रूप से चर्चा हो—चाहे वह मंच पर हो, सोशल मीडिया पर हो या ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म पर।

डिजिटल क्रांति ने मनोरंजन को लोकतांत्रिक बनाया है। अब हर व्यक्ति केवल दर्शक ही नहीं, बल्कि निर्माता भी बन गया है। मोबाइल कैमरा और इंटरनेट ने लाखों लोगों को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर दिया है। इससे अनेक सकारात्मक बदलाव भी आए हैं। लेकिन इसके साथ एक ऐसी प्रतिस्पर्धा भी शुरू हुई है जिसमें अधिक व्यूज़, अधिक लाइक और अधिक कमाई के लिए उत्तेजक सामग्री को प्राथमिकता दी जाने लगी है। परिणाम यह है कि कई बार प्रतिभा से अधिक अश्लीलता, सनसनी और अभद्रता वायरल होती दिखाई देती है।

आज सोशल मीडिया के अनेक मंचों पर ऐसे वीडियो सहजता से उपलब्ध हैं जिनमें भद्दे संवाद, दोहरे अर्थ वाले गीत, उत्तेजक नृत्य और अपमानजनक भाषा को मनोरंजन के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यही नहीं, कई बार ऐसे वीडियो एल्गोरिद्म के कारण लाखों लोगों तक स्वतः पहुँच जाते हैं। यदि किसी सामग्री को अधिक देखा जाता है, तो प्लेटफ़ॉर्म उसे और अधिक लोगों तक पहुँचाते हैं। इस व्यवस्था में गुणवत्ता की तुलना में लोकप्रियता अधिक महत्व प्राप्त कर लेती है।

ओटीटी प्लेटफ़ॉर्मों ने भारतीय मनोरंजन उद्योग को नई दिशा दी है। अनेक उत्कृष्ट फिल्में, वेब सीरीज़ और वृत्तचित्र भी इन्हीं माध्यमों से सामने आए हैं। इसलिए ओटीटी को एकतरफा दोष देना उचित नहीं होगा। समस्या तब उत्पन्न होती है जब कुछ निर्माता कहानी की आवश्यकता से अधिक नग्नता, गाली-गलौज और हिंसा का प्रयोग केवल दर्शकों को आकर्षित करने के लिए करते हैं। कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि यदि किसी वेब सीरीज़ में पर्याप्त अपशब्द, उत्तेजक दृश्य या अत्यधिक हिंसा नहीं होगी, तो वह सफल नहीं मानी जाएगी। यह प्रवृत्ति गंभीर विचार की मांग करती है।

अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि ऐसी सामग्री पर आयु सीमा लिखी होती है और उसे परिवार के साथ देखने के लिए नहीं बनाया गया है। लेकिन वास्तविकता इससे अलग है। भारत में अधिकांश बच्चे और किशोर मोबाइल फोन का उपयोग करते हैं। आयु सत्यापन की व्यवस्थाएँ सीमित हैं और कई बार औपचारिक भर रह जाती हैं। माता-पिता हर समय यह नहीं देख सकते कि बच्चा मोबाइल पर क्या देख रहा है। ऐसे में केवल चेतावनी लिख देना पर्याप्त समाधान नहीं माना जा सकता।

मनोवैज्ञानिक वर्षों से बताते आए हैं कि बचपन और किशोरावस्था में व्यक्ति का व्यक्तित्व तेजी से विकसित होता है। भाषा, व्यवहार, संबंधों की समझ और सामाजिक संवेदनशीलता पर उसके आसपास के वातावरण का प्रभाव पड़ता है। डिजिटल सामग्री भी उसी वातावरण का हिस्सा बन चुकी है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर बच्चा किसी वीडियो को देखकर वैसा ही बन जाएगा, लेकिन यह मान लेना भी उचित नहीं कि सामग्री का कोई प्रभाव ही नहीं पड़ता। परिवार, विद्यालय, मित्र, समाज और डिजिटल माध्यम—सभी मिलकर व्यक्तित्व निर्माण में भूमिका निभाते हैं।

यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अश्लीलता की परिभाषा हर समाज और हर समय में एक जैसी नहीं होती। कला, साहित्य और सिनेमा को कठिन विषयों पर चर्चा करने तथा सामाजिक यथार्थ दिखाने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक महत्वपूर्ण अधिकार है। इसलिए किसी भी विचार से असहमति मात्र के आधार पर प्रतिबंध लगाने की प्रवृत्ति भी उचित नहीं होगी। लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यावसायिक लाभ के लिए जानबूझकर उत्तेजक सामग्री परोसने के बीच स्पष्ट अंतर है। यही संतुलन सबसे महत्वपूर्ण है।

समस्या केवल कंटेंट निर्माताओं की नहीं है। दर्शक भी इस पूरी व्यवस्था का हिस्सा हैं। यदि अश्लील या सनसनीखेज सामग्री को लाखों-करोड़ों बार देखा जाएगा, तो बाज़ार उसी दिशा में आगे बढ़ेगा। इसलिए समाज को भी आत्ममंथन करना होगा कि वह किस प्रकार की सामग्री को प्रोत्साहित कर रहा है। केवल विरोध प्रदर्शन करने से परिवर्तन नहीं आएगा; देखने की आदतों में भी बदलाव आवश्यक है।

सरकार की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सेंसरशिप अंतिम उपाय होना चाहिए, लेकिन बच्चों की सुरक्षा, स्पष्ट आयु वर्गीकरण, प्रभावी पैरेंटल कंट्रोल, शिकायत निवारण प्रणाली और पारदर्शी नियमन जैसे कदमों पर गंभीरता से काम किया जा सकता है। डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों की भी सामाजिक जिम्मेदारी है कि वे केवल लाभ के आधार पर नहीं, बल्कि समाज पर पड़ने वाले प्रभाव को भी ध्यान में रखें।

विद्यालयों में डिजिटल साक्षरता आज समय की आवश्यकता बन चुकी है। बच्चों को यह सिखाना होगा कि इंटरनेट पर उपलब्ध हर सामग्री उनके लिए उपयुक्त नहीं होती। उन्हें आलोचनात्मक सोच, जिम्मेदार डिजिटल व्यवहार और ऑनलाइन सुरक्षा के बारे में शिक्षित करना आवश्यक है। अभिभावकों को भी बच्चों से संवाद बढ़ाना होगा। केवल मोबाइल छीन लेना समाधान नहीं है; सही मार्गदर्शन और विश्वास का वातावरण अधिक प्रभावी उपाय हो सकता है।

यदि समाज सार्वजनिक मंचों पर अश्लील नृत्य का विरोध करता है, तो उसे सोशल मीडिया और ओटीटी पर उपलब्ध समान प्रकृति की सामग्री पर भी समान संवेदनशीलता दिखानी चाहिए। विरोध चयनात्मक नहीं होना चाहिए। संस्कृति की रक्षा केवल चौपालों, मेलों या आयोजनों तक सीमित नहीं रह सकती; आज उसकी सबसे बड़ी परीक्षा डिजिटल दुनिया में हो रही है।

हमें यह भी समझना होगा कि स्वस्थ मनोरंजन का अर्थ उबाऊ मनोरंजन नहीं होता। भारत की कला, संगीत, रंगमंच, सिनेमा और लोक परंपराएँ समृद्ध हैं। उत्कृष्ट मनोरंजन और सामाजिक उत्तरदायित्व साथ-साथ चल सकते हैं। अनेक फिल्में, वेब सीरीज़ और कार्यक्रम इसका प्रमाण हैं कि बिना अश्लीलता के भी दर्शकों का दिल जीता जा सकता है।

नई पीढ़ी को आधुनिक तकनीक से दूर रखना न संभव है और न आवश्यक। आवश्यकता उन्हें तकनीक का विवेकपूर्ण उपयोग सिखाने की है। यदि हम चाहते हैं कि आने वाले वर्षों में हमारी युवा पीढ़ी संवेदनशील, रचनात्मक और जिम्मेदार नागरिक बने, तो हमें मनोरंजन के बदलते स्वरूप पर गंभीर सामाजिक संवाद करना होगा।

अश्लीलता के विरुद्ध आंदोलन का अर्थ कला या अभिव्यक्ति का विरोध नहीं होना चाहिए। इसका अर्थ है—ऐसे वातावरण का निर्माण जिसमें रचनात्मकता, गरिमा और सामाजिक उत्तरदायित्व को बढ़ावा मिले। समाज, परिवार, शिक्षण संस्थान, डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म और सरकार—सभी की साझा जिम्मेदारी है कि वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक मर्यादा के बीच संतुलन स्थापित करें।

आज आवश्यकता किसी एक मंच के विरोध की नहीं, बल्कि उस सोच के विरोध की है जो यह मान बैठी है कि अधिक ध्यान आकर्षित करने के लिए मर्यादा का त्याग करना ही सफलता का रास्ता है। यदि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को बेहतर भाषा, बेहतर संवेदना और बेहतर सांस्कृतिक वातावरण देना चाहते हैं, तो यह आंदोलन केवल चौपाल से नहीं, हर घर और हर मोबाइल स्क्रीन से शुरू होना चाहिए। तभी यह आंदोलन वास्तव में सार्थक कहलाएगा।