आईपीएस सत्ता के लठैत मत बनो

IPS officers, do not become the musclemen of the ruling power

इंद्र वशिष्ठ

दिल्ली पुलिस ने जंतर मंतर पर प्रदर्शनकारी छात्रों पर पैलेट गन चलवा कर जनरल डायर को भी पीछे छोड़ दिया है। पुलिस की झूठ की पोल खुल गई है। अब यह सनसनीखेज खुलासा हो गया है कि उत्तर जिले के डीसीपी राजा बांठिया ने प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन (छर्रे वाली गोली) चलाने के आदेश दिए थे। जबकि नई दिल्ली जिले के डीसीपी सचिन शर्मा ने आंसू गैस, लाठी चार्ज और आग्नेयास्त्रों (हथियार, बंदूक)के इस्तेमाल की अनुमति दी थी। उत्तर जिले के डीसीपी राजा बांठिया, आरएएफ के डिप्टी कमांडेंट सतीश कुमार सांगवान के साथ ड्यूटी पर थे, उन्होंने प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए आरएएफ को कार्रवाई करने का आदेश दिया। बंदूक चलाने का आधिकारिक आदेश चाहे किसी भी आईपीएस अफसर ने दिया हो, लेकिन जवाबदेही तो पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार की बनती है।

वर्दी वाले गुंडे-
दूसरी ओर एडिशनल डीसीपी संदीप लांबा, इंस्पेक्टर नवीन राठी जैसे वर्दी वाले गुंडों द्वारा जंतर मंतर पर छात्राओं/ लड़कियों के साथ बदसलूकी, छात्रों की पिटाई और घिनौनी हरकतों ने पुलिस की बची खुची इज़्ज़त/साख पर भी कलंक लगा दिया है। इन वर्दी वाले गुंडों ने दुनिया भर में दिल्ली पुलिस और भारत की छवि को दाग़दार कर दिया।

दिल्ली पुलिस महिलाओं और बच्चों के प्रति संवेदनशील होने का दावा करते थकती नहीं है। लेकिन इस मामले ने पुलिस के दावे की धज्जियां उड़ा दी।

कमिश्नर की भूमिका-
खाकी को खाक में मिलाने, पुलिस को शर्मसार करने वाले इन पुलिस अफसरों के ख़िलाफ़ कोई कानूनी कार्रवाई न करने से पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार की पेशेवर काबलियत और भूमिका पर भी सवालिया निशान लग गया है।

एडिशनल डीसीपी संदीप लांबा द्वारा लड़की को थप्पड़ मारने और इंस्पेक्टर नवीन राठी द्वारा लड़की के शरीर के पिछले हिस्से में डंडा घुसाने जैसा दृश्य पूरी दुनिया देख रही है।

गृहमंत्री सबक सिखाओ-
गृहमंत्री अमित शाह को इन दोनों अफसरों को जेल भेज कर वर्दी वाले गुंडों को सबक सिखाना चाहिए। दिल्ली पुलिस और सीआरपीएफ/आरएएफ ने प्रदर्शनकारी छात्रों पर जो जुल्म किए हैं उसके लिए गृहमंत्री अमित शाह की जिम्मेदारी/जवाबदेही बनती है क्योंकि दिल्ली पुलिस और सीआरपीएफ गृह मंत्री के अधीन है। इसलिए कमिश्नर/आईपीएस/दानिप्स और अन्य पुलिस अफसरों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का कर्तव्य/ जिम्मेदारी गृहमंत्री की है।

पुलिस द्वारा की गई बर्बरता के लिए सीधे सीधे पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार की जिम्मेदारी/जवाबदेही बनती है। उन्हें पद से हटा देना चाहिए। लेकिन वह गृहमंत्री अमित शाह के पसंदीदा अफसर है। इसलिए अगमू कैडर के सीनियर आईपीएस अधिकारियों को दरकिनार कर उन्हें 17 जुलाई 2026 को आनन-फानन में कमिश्नर बनाया गया।

कमिश्नर पर लगा दाग-
वैसे कमिश्नर अनुराग कुमार पर छात्रों के साथ बर्बरता का दाग तो लग ही गया। पुलिसिया जुल्म की जब भी बात होगी, कमिश्नर अनुराग कुमार का नाम लिया जाएगा।

कमिश्नर अनुराग कुमार और आईपीएस अधिकारी बताएं, कि उन्होंने प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन क्यों चलवाई।

क्या किसी लड़की के शरीर के पिछले हिस्से में लाठी घुसाना/मारना और लड़की को थप्पड़ मारना अपराध नहीं है ?

सत्ता के लठैत- सच्चाई यह है कि आईपीएस अधिकारी सिर्फ बातें ही ईमानदारी/ निष्पक्षता/ कर्तव्य/कानून/संविधान पालन की करते हैं और बकायदा शपथ भी लेते है। लेकिन उनका आचरण बिल्कुल इसके विपरीत होता हैं। ये जनता के सेवक नहीं , बल्कि राजनेताओं के लठैत की तरह व्यवहार और काम करते हैं। चाहे सरकार किसी भी राजनीतिक दल की हो, महत्वपूर्ण पद पाने के लिए आईपीएस सत्ता के लठैत बन कर खाकी को खाक में मिलाने से भी बिल्कुल नहीं हिचकते। कांग्रेस के शासन में भी साल 2011 में रामलीला मैदान में रात में सो रहे लोगों पर तत्कालीन पुलिस कमिश्नर बृजेश कुमार गुप्ता के नेतृत्व में आंसू गैस छोड़ी गई, लाठीचार्ज किया गया था। तब पुलिस से बचने के लिए महिलाओं वाला सूट- सलवार पहन कर भाग रहे रामदेव को पुलिस ने पकड़ा था।

आत्मरक्षा का अधिकार-
वैसे एक ऐसा कानून बनाया जाना चाहिए, जिसमें यह प्रावधान किया जाए कि अगर कोई पुलिसकर्मी किसी बेकसूर व्यक्ति की पिटाई करता है तो उस व्यक्ति या लोगों को भी अपनी आत्मरक्षा/ बचाव में उस पुलिसकर्मी को पीटने का कानूनी तौर पर अधिकार होना चाहिए। आत्मरक्षा में ऐसा कदम उठाने वाले व्यक्ति के ख़िलाफ़ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होना चाहिए। कोई निरंकुश, भ्रष्ट पुलिसकर्मी अगर कानून अपने हाथ में लेता है तो उसे विभाग की ओर से बिल्कुल भी सुरक्षा या संरक्षण नहीं मिलना चाहिए। कानून का खुद पालन न करने वाले पुलिसकर्मी को तो आम अपराधी से भी ज्यादा सज़ा मिलनी चाहिए।

ऐसे वर्दी वाले गुंडों के कारण ही पुलिस की छवि दिनों दिन खराब हो रही है और इसलिए आम आदमी पुलिस से नफ़रत करता है। ऐसे कायर पुलिसकर्मी सिर्फ लड़कियों, बच्चों, छात्रों और असहाय लोगों को पीट कर अपनी बहादुरी दिखा सकते है। जबकि जहां बहादुरी दिखाना चाहिए, वहां तो आईपीएस भी दुम दबाकर कर भाग जाते हैं।

आईपीएस बहादुर ? –
2 नवंबर 2019 को तीस हजारी अदालत परिसर में कुछ गुंडे दंगाई वकीलों ने पुलिसकर्मियों की छाती पर जमकर तांडव किया था। तब इनकी बहादुरी कहां चली गई थी। उत्तर जिले की तत्कालीन डीसीपी मोनिका भारद्वाज हाथ जोड़कर कायरों की तरह दुम दबा कर भागी थी। मोनिका भारद्वाज ने तो बदसलूकी करने वाले गुड़े वकीलों के ख़िलाफ़ एफआईआर तक दर्ज कराने की भी हिम्मत नहीं दिखाई।

तत्कालीन एडिशनल डीसीपी हरेन्द्र कुमार सिंह को भी वकीलों ने जमीन पर गिरा-गिरा कर पीटा था। तब पुलिसकर्मियों के हाथों में शायद लकवा लग गया होगा, इसलिए पलटवार नहीं किया। इनके हाथ सिर्फ बेकसूरों पर ही उठते हैं। तत्कालीन नाकारा कमिश्नर अमूल्य पटनायक और तत्कालीन डीसीपी मोनिका भारद्वाज घायल पुलिसकर्मियों का हाल चाल पूछने तक नहीं गए थे। मोनिका भारद्वाज तो अपने घायल आपरेटर सिपाही संदीप का हाल जानने तक नहीं गई। 5 नवंबर को दिल्ली पुलिस मुख्यालय पर पुलिसकर्मियों ने जबरदस्त विरोध प्रदर्शन किया था। 7 नवंबर को पुलिस कमिश्नरऔर डीसीपी मोनिका भारद्वाज पुलिस वालों का हाल जानने गए।

सांसद ने गिरेबान पकड़ी-
साल 2018 में उत्तर पूर्वी जिले के तत्कालीन डीसीपी अतुल ठाकुर की गिरेबान सांसद मनोज तिवारी ने पकड़ी। डीसीपी अतुल ठाकुर और एडिशनल डीसीपी राजेन्द्र प्रसाद मीणा को धमकाया। मीडिया के माध्यम से सबने ये दृश्य देखा। लेकिन पलटवार करना तो दूर आईपीएस अतुल ठाकुर और राजेन्द्र प्रसाद मीणा की मनोज तिवारी के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज करने की भी हिम्मत नहीं हुई। ऐसे आईपीएस सिर्फ जनता और अपने मातहतों के सामने ही खुद को बड़ा बहादुर दिखाते है।

आईपीएस की गुंडागर्दी-
जंतर मंतर पर मध्य रेंज के संयुक्त पुलिस आयुक्त मधुर वर्मा को भी तैनात किया गया। ये वही मधुर वर्मा हैं, जिनकी गुंडागर्दी ने 2019 में मीडिया में सुर्खियां बटोरी थी। नई दिल्ली जिले के तत्कालीन डीसीपी मधुर वर्मा के ख़िलाफ़ ट्रैफिक पुलिस के इंस्पेक्टर कर्मवीर मलिक ने पिटाई करने की बकायदा विजिलेंस में शिकायत की थी। लेकिन तत्कालीन नाकारा कमिश्नर अमूल्य पटनायक और गृह मंत्रालय ने मधुर वर्मा के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की। वैसे मधुर वर्मा के कारनामों की गूंज चंडीगढ़ में भी रही है।

आईपीएस अफसरों जागो, खाकी को ख़ाक में मत मिलाओ। आईपीएस अगर ईमानदार हो, तो ईमानदार नजर आना ज़रूरी है। अपने निजी स्वार्थ के लिए सत्ता के लठैत मत बनो।