चंदा चोरी पर घिर रही थी भाजपा, विपक्ष ने ‘भगवा’ लाकर खुद के पैर पर मार ली कुल्हाड़ी

The BJP was facing heat over donation theft, but the opposition shot itself in the foot by bringing the 'saffron' angle into the mix

दिलीप कुमार पाठक

राजनीति में एक बहुत पुरानी कहावत है कि जब आपका विरोधी खुद गलती कर रहा हो, तो उसके रास्ते में कभी नहीं आना चाहिए। लेकिन विपक्ष के सलाहकारों को शायद यह बुनियादी बात समझ नहीं आती। वे अक्सर विरोधी के पैर पर कुल्हाड़ी मारने का इंतज़ार नहीं करते, बल्कि खुद ही कुल्हाड़ी उठाकर अपने पैर पर मार लेते हैं। शुक्रवार की घटना को ही देख लीजिए। एक तरफ चंदा चोरी के मुद्दे पर सत्ता पक्ष पूरी तरह बैकफुट पर था। जनता के बीच गंभीर सवाल तैर रहे थे और सरकार के पास कोई साफ जवाब नहीं था। यह एक ऐसा बना-बनाया मुद्दा था, जिसे विपक्ष आसानी से अपने पक्ष में भुना सकता था। लेकिन ठीक इसी मोड़ पर विपक्ष के किसी परम ज्ञानी रणनीतिकार ने अपना दिमाग चलाया। उन्होंने चंदा चोरी के एक ड्रामे में भगवा कपड़े पहने एक संत को चोर के रूप में पेश कर दिया। नतीजा क्या हुआ? जो मुद्दा भ्रष्टाचार, पारदर्शिता और जनता की गाढ़ी कमाई की लूट का था, वह पलक झपकते ही बदल गया। अब वह ‘सनातन के अपमान’ का नैरेटिव बन गया । अब उल्टा विपक्ष हाथ जोड़कर यह सफाई दे रहा है कि उनका उद्देश्य किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं था।

यह पहली बार नहीं है जब विपक्ष ने अपनी ही टीम के खिलाफ आत्मघाती गोल किया हो। असल समस्या यह है कि विपक्ष के रणनीतिकारों को ज़मीन का कोई ज्ञान ही नहीं है। वे वातानुकूलित कमरों में बैठकर सोशल मीडिया के ट्रेंड्स को ही पूरे देश का मूड मान लेते हैं। उन्हें लगता है कि आम जनता उनके बारीक कटाक्ष और प्रतीकों को उसी तरह समझेगी जैसे कोई बुद्धिजीवी समझता है। सच तो यह है कि आज देश के लोग इस तरह के व्यंग्य समझने के मूड में बिलकुल नहीं हैं। राजनीति हमेशा एक नैरेटिव से चलती है। लेकिन विपक्ष हर बार उसी पिच पर खेलने चला जाता है जिसे भाजपा ने उनके लिए तैयार किया है। विपक्ष को यह बात गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि वे हिंदुत्व की पिच पर भाजपा का मुकाबला कभी नहीं कर सकते। वह उनकी अपनी पिच है और वहां उनका मुकाबला करने का मतलब है सीधे क्लीन बोल्ड होना। विपक्ष के पास मुद्दों की कभी कोई कमी नहीं रही, लेकिन अपनी रणनीतिक कमियों के कारण उन्होंने हमेशा बड़े मौके गँवाए हैं। जब भी देश में बेरोजगारी, महंगाई या पेपर लीक जैसे युवा और आम जनता से जुड़े मुद्दे गर्म होते हैं, विपक्ष सरकार को घेरने के बजाय किसी सांस्कृतिक या धार्मिक विवाद में कूद पड़ता है। जब जनता महंगाई से त्रस्त होती है, तब विपक्ष के कुछ नेता संसद से लेकर सड़क तक भगवान, धर्मग्रंथों या आस्था से जुड़ी चीज़ों पर ऐसी टिप्पणियां कर देते हैं जिससे पूरी बहस का रुख ही मुड़ जाता है। नतीजा यह होता है कि जो जनता सुबह सरकार की आर्थिक नीतियों से नाराज थी, वह शाम तक अपनी आस्था के बचाव में खड़ी हो जाती है। जहां आपको सरकार की जवाबदेही तय करनी थी, वहां आपने पूरी बहुसंख्यक आबादी को ही रक्षात्मक मुद्रा में लाकर अपने खिलाफ खड़ा कर लिया।

विपक्ष को अब यह तय करना होगा कि उन्हें राजनीति करनी है या समाज सुधारक बनना है। आप एक साथ दोनों नावों पर सवारी नहीं कर सकते। जनता आज नौकरी, सड़क, पानी, अस्पताल और अपने बच्चों के भविष्य पर बात करना चाहती है। जब आप इन असली मुद्दों को छोड़कर धर्म या प्रतीकों की लड़ाई में उलझते हैं, तो आप सीधे तौर पर अपने विरोधी की मदद कर रहे होते हैं। राजनीति में टाइमिंग और लहजा ही सब कुछ होता है। यदि आपके पास सही मुद्दा है लेकिन आपका लहजा गलत है, तो वह मुद्दा पूरी तरह बेकार हो जाता है। अब समय आ गया है कि विपक्ष उन सलाहकारों को बाहर का रास्ता दिखाए जो ज़मीन से पूरी तरह कटे हुए हैं। राजनीति में जीतने के लिए जनता की नब्ज़ को पहचानना पड़ता है। अगर इतनी सी भी समझ नहीं है, तो बेहतर होगा कि वे आम जनता या अपने ज़मीनी कार्यकर्ताओं से ही सलाह ले लें, जो उन्हें सही रास्ता दिखा सकें।