कश्मीर में गैर-कश्मीरियों की हत्याओं का यह सिलसिला भारत के विचार पर एक सीधा हमला है

This series of killings of non-Kashmiris in Kashmir is a direct attack on the idea of ​​India

अशोक भाटिया

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद देश और दुनिया को यह संदेश देने की पुरजोर कोशिश की गई थी कि घाटी में अब अमन-चैन का एक नया सूरज उग चुका है। सरकार और स्थानीय प्रशासन के दावों में विकास, पर्यटन और शांति की नई इबारत लिखी जा रही थी। परंतु, जमीनी हकीकत इन दावों के विपरीत एक बेहद डरावनी और चिंताजनक तस्वीर पेश कर रही है। कश्मीर घाटी में एक बार फिर लक्षित हत्याओं का दौर तेज हो चुका है। आतंकवादियों द्वारा बाहरी राज्यों से आए निर्दोष मजदूरों, रेहड़ी-पटरी वालों, कश्मीरी पंडितों और गैर-स्थानीय कामकाजी लोगों को चुन-चुनकर निशाना बनाना इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि घाटी में आतंकी तंत्र अब भी पूरी तरह सक्रिय है। हाल ही में कुलगाम जिले के केलम क्षेत्र में छत्तीसगढ़ के दो निर्दोष मजदूरों की गोली मारकर की गई निर्मम हत्या ने सुरक्षा व्यवस्था, खुफिया तंत्र और सरकार के शांति के दावों पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। यह केवल दो व्यक्तियों की हत्या नहीं है, बल्कि यह देश की संप्रभुता, आर्थिक ढांचे और उस भरोसे पर हमला है, जिसे बहाल करने के लिए पिछले कुछ वर्षों में अथक प्रयास किए गए हैं।

पिछले कुछ वर्षों के घटनाक्रम पर नजर डालें, तो स्पष्ट होता है कि आतंकवादियों ने अपनी रणनीति में एक बड़ा बदलाव किया है। अब वे बड़े पैमाने पर सुरक्षा बलों के कैंपों पर सीधे हमले करने के बजाय सॉफ्ट टारगेट यानी उन लोगों को निशाना बना रहे हैं जो निहत्थे हैं, जिनकी सुरक्षा का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं है और जो केवल अपनी आजीविका कमाने के लिए कश्मीर आए हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ और अन्य राज्यों से आए ये गरीब मजदूर कश्मीर की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। चाहे वह निर्माण कार्य हो, ईंट भट्ठे हों या सेब के बागान, इन प्रवासियों के बिना घाटी का आर्थिक पहिया थम जाता है। आतंकियों का मुख्य उद्देश्य इन गैर-स्थानीय लोगों के मन में ऐसा खौफ पैदा करना है जिससे वे घाटी छोड़कर भागने पर मजबूर हो जाएं। लश्कर-ए-तैयबा के मुखौटा संगठन द रेजिस्टेंस फ्रंट जैसे आतंकी गुट इस तरह की कायरतापूर्ण हरकतों की जिम्मेदारी लेकर यह संदेश देना चाहते हैं कि कश्मीर में जनसांख्यिकीय बदलाव की किसी भी कोशिश को वे बर्दाश्त नहीं करेंगे। यह सोच पूरी तरह से विभाजनकारी और राष्ट्रविरोधी है, जिसका मुकाबला केवल गोलियों से नहीं, बल्कि एक ठोस दीर्घकालिक रणनीति से ही किया जा सकता है।

कश्मीर में गैर-कश्मीरियों की हत्या का यह सिलसिला केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है, बल्कि इसके गहरे आर्थिक और सामाजिक निहितार्थ हैं। कश्मीर की स्थानीय अर्थव्यवस्था बहुत हद तक बाहरी श्रमिकों पर निर्भर है। सर्दियों के मौसम को छोड़कर, साल के अधिकांश महीनों में देश के विभिन्न हिस्सों से लाखों मजदूर निर्माण, कृषि और हस्तशिल्प के क्षेत्र में काम करने कश्मीर आते हैं। जब इन मजदूरों को निशाना बनाया जाता है, तो पूरी घाटी में भय का माहौल व्याप्त हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर पलायन शुरू होता है। मजदूरों के पलायन से विकास परियोजनाएं अधर में लटक जाती हैं, बुनियादी ढांचे का निर्माण रुक जाता है और स्थानीय कारोबारियों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। सामाजिक स्तर पर, यह हमला कश्मीरियत की उस सदियों पुरानी भावना पर भी चोट करता है, जो मेहमाननवाजी और सह-अस्तित्व के लिए जानी जाती है। आतंकियों की यह रणनीति कश्मीर को शेष भारत से पूरी तरह से अलग-थलग करने और देश के अन्य हिस्सों में कश्मीरियों के प्रति अविश्वास पैदा करने की एक गहरी साजिश का हिस्सा है।

हर एक हत्या के बाद गृह मंत्रालय, केंद्र शासित प्रदेश के उपराज्यपाल और सुरक्षा बलों के आला अधिकारियों की उच्च स्तरीय बैठकें होती हैं। आतंकवाद को जड़ से उखाड़ फेंकने के कड़े बयान जारी किए जाते हैं और पूरे इलाके को घेरकर सर्च ऑपरेशन चलाया जाता है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या ये कदम पर्याप्त हैं। कुलगाम जैसी घटनाएं इस बात की ओर इशारा करती हैं कि सुरक्षा और खुफिया तंत्र में कहीं न कहीं कोई गंभीर चूक हो रही है। आतंकवादी रिहायशी इलाकों और ईंट भट्ठों जैसे स्थानों पर आसानी से आते हैं, वारदात को अंजाम देते हैं और गायब हो जाते हैं। स्थानीय स्तर पर आतंकियों को मिलने वाली मदद यानी ओवर ग्राउंड वर्कर्स के नेटवर्क को पूरी तरह से समाप्त करने में अभी तक अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई है। जब तक इन जमीनी मददगारों के नेटवर्क को ध्वस्त नहीं किया जाएगा, तब तक ऐसी छिटपुट लेकिन बेहद घातक घटनाओं को रोकना नामुमकिन होगा। सुरक्षा बलों को अपनी पारंपरिक रणनीति से आगे बढ़कर ह्यूमन इंटेलिजेंस और आधुनिक तकनीक के समन्वय पर अधिक ध्यान देना होगा।

जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक शून्यता को समाप्त करने के लिए हाल के समय में कई प्रयास हुए हैं, लेकिन वास्तविक प्रशासनिक नियंत्रण अभी भी काफी हद तक केंद्र के हाथों में है। ऐसे में सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी सीधे तौर पर केंद्र सरकार और उपराज्यपाल प्रशासन की बनती है। केवल यह कहकर पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता कि आतंकवाद अंतिम सांसें गिन रहा है। जब तक एक भी निर्दोष नागरिक की जान आतंकियों की गोली से जा रही है, तब तक घाटी को सुरक्षित नहीं माना जा सकता। राजनीतिक दलों को भी इस संवेदनशील मुद्दे पर दलगत राजनीति से ऊपर उठना होगा। अक्सर देखा जाता है कि ऐसी घटनाओं पर राजनीतिक बयानबाजी शुरू हो जाती है, जो सुरक्षा बलों के मनोबल को प्रभावित करती है। कश्मीरी समाज के मुख्यधारा के राजनेताओं को भी खुलकर और बिना किसी लाग-लपेट के इन हत्याओं की निंदा करनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि समाज के भीतर आतंकियों के खिलाफ एक मजबूत जनमत तैयार हो।

यह कोई ढका-छिपा तथ्य नहीं है कि कश्मीर में आतंकवाद की डोर सीमा पार पाकिस्तान से हिलती है। जब-जब घाटी में शांति बहाली और लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं मजबूत होती दिखती हैं, तब-तब पाकिस्तान स्थित आका बौखलाहट में इस तरह के हमलों को अंजाम दिलवाते हैं। जी-20 की बैठकों या घाटी में बढ़ते पर्यटन ग्राफ से बौखलाए आतंकवादी अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को नुकसान पहुंचाना चाहते हैं। वे दुनिया को यह दिखाना चाहते हैं कि कश्मीर अभी भी एक अशांत क्षेत्र है जहां मानवाधिकार और नागरिक सुरक्षा खतरे में हैं। भारत सरकार को कूटनीतिक स्तर पर पाकिस्तान की इस नापाक हरकत को बेनकाब करना जारी रखना होगा। वित्तीय कार्रवाई कार्यबल जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के मंच पर यह साबित करना होगा कि सीमा पार से टेरर फंडिंग और हथियारों की सप्लाई का सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है।

इस गंभीर संकट से निपटने के लिए सरकार और सुरक्षा बलों को एक बेहद मजबूत और बहुआयामी रणनीति पर काम करना होगा। सबसे पहले घाटी में काम कर रहे सभी गैर-स्थानीय मजदूरों का एक अनिवार्य डिजिटल डेटाबेस तैयार होना चाहिए और उनके रहने के स्थानों को चिन्हित कर वहां सुरक्षा बलों की नियमित गश्त सुनिश्चित की जानी चाहिए। आतंकियों को पनाह और सूचनाएं देने वाले स्थानीय नेटवर्क के वित्तीय स्रोतों पर कड़ा प्रहार कर उन्हें पूरी तरह से नेस्तनाबूद करना होगा। इसके साथ ही, स्थानीय कश्मीरी आबादी का विश्वास जीतना भी उतना ही जरूरी है, क्योंकि युवाओं को मुख्यधारा से जोड़कर ही आतंकियों के प्रभाव को कम किया जा सकता है। सुरक्षा बलों को भी केवल घटना के बाद प्रतिक्रिया देने के बजाय, खुफिया सूचनाओं के आधार पर आतंकियों के ठिकानों पर पहले हमला करने की नीति अपनानी होगी। संवेदनशील और दूरदराज के निर्माण स्थलों के आसपास ड्रोन और सीसीटीवी कैमरों के जरिए चौबीसों घंटे तकनीकी निगरानी रखी जानी चाहिए।

कश्मीर में गैर-कश्मीरियों की हत्याओं का यह सिलसिला भारत के विचार पर एक सीधा हमला है। भारत का संविधान देश के प्रत्येक नागरिक को देश के किसी भी हिस्से में रहने, घूमने और आजीविका कमाने का मौलिक अधिकार देता है। यदि कोई नागरिक कश्मीर में असुरक्षित महसूस करता है, तो यह हमारे संवैधानिक संकल्पों की विफलता है। कुलगाम की हालिया घटना देश के लिए एक वेक-अप कॉल है। अब समय आ गया है कि खोखली बयानबाजी और दावों से आगे बढ़कर जमीन पर सख्त कार्रवाई दिखाई जाए। कश्मीर को केवल पर्यटन के मानचित्र पर चमकाना ही काफी नहीं है, बल्कि उसे हर उस भारतीय के लिए सुरक्षित बनाना होगा जो वहां पसीना बहाकर देश के निर्माण में योगदान दे रहा है। आतंकवाद के इस नाग को पूरी तरह कुचलना ही निर्दोष पीड़ितों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।