महेन्द्र तिवारी
भारत की अर्थव्यवस्था ने एक बार फिर दुनिया को अपनी असीम मजबूती और स्थिरता का प्रभावशाली परिचय दिया है। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में देश की सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत दर्ज की गई है। अप्रैल से जून 2026 के बीच हासिल हुई यह वृद्धि ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में सामने आई है, जब विश्व अर्थव्यवस्था अनिश्चितताओं से घिरी हुई है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमतों में उतार चढ़ाव, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान, पश्चिम एशिया में निरंतर बढ़ता तनाव और वैश्विक व्यापार से जुड़ी चिंताओं के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने अपनी विकास की गति को न केवल बनाए रखा है बल्कि एक नई दिशा भी प्रदान की है।
प्रधानमंत्री ने देश की इस आर्थिक उपलब्धि को अत्यंत असाधारण बताया है। उनका कहना है कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और चौतरफा वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच हासिल हुई यह वृद्धि देश की सामूहिक शक्ति और विपरीत परिस्थितियों से सफलतापूर्वक उबरने की अद्वितीय क्षमता को दर्शाती है। 1 सितंबर को देशवासियों को बधाई देते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि ये मजबूत आंकड़े देश के भीतर बढ़ते आर्थिक आत्मविश्वास का संकेत हैं।
केवल 7.8 प्रतिशत का एक आंकड़ा देखकर अर्थव्यवस्था की पूरी तस्वीर समझना उचित नहीं होगा। इसके पीछे अर्थव्यवस्था के अलग अलग क्षेत्रों का उत्कृष्ट प्रदर्शन भी महत्वपूर्ण है। पहली तिमाही में सकल मूल्यवर्धन में 8.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। नए निवेश में 11.9 प्रतिशत और आम जनता के घरेलू उपभोग में 7.1 प्रतिशत की ठोस वृद्धि दर्ज की गई है। निर्यात क्षेत्र में भी 12 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इन आंकड़ों का विश्लेषण यह संकेत देता है कि देश की आर्थिक गतिविधियों को केवल किसी एक क्षेत्र का सहारा नहीं मिला है, बल्कि उत्पादन, सेवा, निवेश, घरेलू मांग और निर्यात जैसे कई आधारों ने मिलकर इस तेज गति को निरंतर बनाए रखा है।
भारतीय अर्थव्यवस्था की वर्तमान मजबूती का एक सबसे बड़ा आधार देश की विशाल घरेलू मांग है। जब अर्थव्यवस्था में आम लोगों का उपभोग बढ़ता है, तो बाजार में वस्तुओं और सेवाओं की मांग में स्वाभाविक वृद्धि होती है। मांग बढ़ने से उत्पादन की प्रक्रिया को गति मिलती है और नए रोजगार तथा निवेश के अवसर पैदा होते हैं। भारत जैसे विशाल देश में घरेलू बाजार की शक्ति बहुत महत्वपूर्ण है। वैश्विक परिस्थितियां अनुकूल न होने पर भी देश के भीतर मौजूद करोड़ों लोगों की आवश्यकताएं और उनका उपभोग देश की आर्थिक गतिविधियों को मजबूत सहारा देते हैं।
आर्थिक वृद्धि की सफलता में विनिर्माण क्षेत्र का उत्कृष्ट प्रदर्शन भी एक आशाजनक हिस्सा है। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में विनिर्माण क्षेत्र ने 9.2 प्रतिशत की शानदार वृद्धि दर्ज की है। यह वृद्धि इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि लंबे समय से भारत के सामने औद्योगिक उत्पादन क्षमता बढ़ाने, रोजगार पैदा करने और विदेशी आयात पर निर्भरता घटाने की चुनौती रही है। यदि विनिर्माण क्षेत्र लगातार तेज गति से आगे बढ़ता है, तो इससे छोटे और मध्यम उद्योगों को लाभ मिलेगा। इसके साथ ही देश के भीतर स्थानीय उत्पादन, रोजगार सृजन और वैश्विक निर्यात को बड़ा बढ़ावा मिलेगा।
उत्पादन के साथ सेवा क्षेत्र भी भारतीय अर्थव्यवस्था की एक मजबूत रीढ़ बना हुआ है। बैंक सेवाओं, बीमा और अन्य वित्तीय गतिविधियों में भारी मजबूती दिखाई दी है। आज सूचना संचार पर आधारित सेवाओं से लेकर वित्त, परिवहन, स्वास्थ्य देखभाल, शिक्षा प्रणाली और अन्य नागरिक सेवाओं तक अनेक गतिविधियां देश की समग्र आर्थिक वृद्धि में अमूल्य योगदान कर रही हैं। हालांकि यह भी जरूरी है कि सेवा क्षेत्र के साथ देश के औद्योगिक उत्पादन और कृषि क्षेत्र को भी समान रूप से मजबूत बनाया जाए ताकि आर्थिक विकास का वास्तविक लाभ समाज के निचले हिस्से तक पहुंच सके।
प्रधानमंत्री ने आर्थिक वृद्धि के आंकड़ों के साथ पूर्ण आत्मनिर्भरता लाने पर भी विशेष रूप से जोर दिया है। उन्होंने नागरिकों से स्वदेशी वस्तुओं और स्थानीय सेवाओं को अपनी पहली प्राथमिकता देने की अपील की है। इसके अतिरिक्त, अनावश्यक विदेशी यात्राओं, विदेशों में होने वाले भारी खर्च को कम करने तथा अत्यंत आवश्यकता न होने पर सोना खरीदने से बचने की सलाह भी दी गई है। इसका मूल विचार यह है कि नागरिकों की कमाई का पैसा देश की अर्थव्यवस्था के भीतर ही अधिक घूमे। जब उपभोक्ता स्थानीय उत्पाद खरीदता है, तो उसका सीधा आर्थिक लाभ स्थानीय दुकानदार, छोटे कारीगर, उद्यमी, मजदूर और मूल उत्पादक तक पहुंचता है।
सोने की खरीद को लेकर की गई अपील का सीधा संबंध भी इसी राष्ट्रवादी आर्थिक सोच से जुड़ा है। भारत में सोने की मांग बहुत पुरानी है और सामाजिक परंपराओं में इसका विशेष स्थान है। लेकिन बड़ी मात्रा में विदेशों से सोने का आयात करने से देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी दबाव पड़ता है। इसी प्रकार, विदेशों में विवाह करने या अनावश्यक विदेशी यात्राओं पर होने वाला बड़ा खर्च देश से बाहर विदेशी अर्थव्यवस्था में चला जाता है। यदि वही सारा खर्च देश के भीतर स्थित पर्यटन स्थलों पर किया जाए, तो यहां के पर्यटन आवास, परिवहन, भोजन और अनेक छोटे स्थानीय व्यवसायों को बहुत बड़ा लाभ मिल सकता है।
आत्मनिर्भरता का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि भारत पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था से खुद को अलग कर ले। वास्तविक आत्मनिर्भरता का अर्थ देश के भीतर एक ऐसी मजबूत आर्थिक क्षमता विकसित करना है जिसमें देश अपनी आवश्यकताओं की सभी महत्वपूर्ण वस्तुओं का उत्पादन स्वयं कर सके और दुनिया के खुले बाजार में प्रतिस्पर्धा भी कर सके। आज भारत को ऊर्जा, रक्षा, औषधि, विद्युतीय उपकरण, भारी यंत्र और उच्च स्तरीय तकनीकी जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अपनी उत्पादन क्षमता को बहुत तेजी से बढ़ाने की नितांत आवश्यकता है। इससे महंगे आयात पर निर्भरता कम होगी और युवाओं के लिए नए रोजगार पैदा होंगे।
पहली तिमाही में हासिल 7.8 प्रतिशत की यह शानदार वृद्धि निश्चित रूप से बड़ी राष्ट्रीय उपलब्धि है, लेकिन इसे अंतिम मंजिल मान लेना उचित नहीं होगा। पिछले वित्त वर्ष की अंतिम तिमाही में यह वृद्धि 8.6 प्रतिशत रही थी। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें, वैश्विक तनाव, मुद्रा का अवमूल्यन, घरेलू महंगाई, मानसून और अंतरराष्ट्रीय व्यापार जैसी कई बड़ी चुनौतियां आने वाले समय में भी बनी रह सकती हैं। भारत ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए बड़ी मात्रा में विदेशों से कच्चे तेल का आयात करता है। तेल की कीमतों में तेज वृद्धि से परिवहन लागत, वस्तुओं की उत्पादन लागत और महंगाई पर सीधा असर पड़ सकता है।
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि इस तेज आर्थिक वृद्धि का वास्तविक लाभ देश के आम नागरिक तक पहुंचे। सकल घरेलू उत्पाद की यह तेज वृद्धि तभी पूरी तरह से सार्थक मानी जाएगी, जब देश में रोजगार के पर्याप्त अवसर बढ़ें, किसानों की आय में वास्तविक सुधार हो, छोटे कारोबार मजबूत हों और युवाओं को उनकी योग्यता के अनुरूप काम मिले। आर्थिक विकास का लक्ष्य आम लोगों के जीवन स्तर में सुधार करना भी होना चाहिए। आने वाले समय में रोजगार सृजन, युवाओं का कौशल विकास और छोटे उद्योगों को मजबूत करने की एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी होगी।
नए निवेश में 11.9 प्रतिशत की जो वृद्धि दर्ज की गई है, वह भविष्य के लिए सकारात्मक संकेत है। यदि पूंजी निवेश की यह गति निरंतर बनी रहती है, तो नई उत्पादन इकाइयों की स्थापना, बुनियादी ढांचे के निर्माण और रोजगार के अवसरों में भारी वृद्धि हो सकती है। टिकाऊ आर्थिक वृद्धि के लिए सरकारी खर्च के साथ निजी क्षेत्र की सक्रिय भागीदारी भी बहुत जरूरी है। व्यावसायिक कार्यों के लिए बैंक ऋण की लगातार बढ़ती मांग भी इस बात का संकेत देती है कि उद्योगपतियों का देश की आर्थिक गतिविधियों में पूरा विश्वास कायम है।
अब भारत के सामने चुनौती इस तेज विकास को एक स्थायी, समावेशी और दीर्घकालिक विकास में बदलने की है। 7.8 प्रतिशत की वर्तमान वृद्धि ने साबित किया है कि कठिन परिस्थितियों में भी अर्थव्यवस्था में शक्ति मौजूद है। यह वृद्धि तभी सार्थक होगी जब इसका लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। जब तक आर्थिक विकास का लाभ शिक्षा, स्वास्थ्य और समाज कल्याण तक नहीं पहुंचता, विकास की यह यात्रा अधूरी है। इसी संतुलन और संकल्प से भारत एक विकसित राष्ट्र के रूप में स्थापित हो सकेगा।





