ऑपरेशन क्रिस्टल हंट से फिर उजागर हुआ सिंथेटिक ड्रग्स का खतरनाक कारोबार, विदेशी कनेक्शन और सप्लाई नेटवर्क की जांच में जुटी एनसीबी
रुम्मान उल्ला खान
देश की राजधानी दिल्ली से सटे ग्रेटर नोएडा में नशीले पदार्थों के अवैध कारोबार का एक बड़ा मामला सामने आया है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) ने खुफिया जानकारी के आधार पर कार्रवाई करते हुए दो अवैध ड्रग्स प्रयोगशालाओं का भंडाफोड़ किया है। इन प्रयोगशालाओं में सिंथेटिक ड्रग्स तैयार किए जा रहे थे। मौके से 379.740 किलोग्राम एम्फेटामाइन युक्त पदार्थ और 10 किलोग्राम स्यूडोएफेड्रिन बरामद किया गया है। बरामद सामग्री से लगभग 56 किलोग्राम तैयार क्रिस्टलीय एम्फेटामाइन बनने का अनुमान है, जिसकी अवैध बाजार में कीमत करीब 45 करोड़ रुपये बताई गई है। मामले में दो आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है।
एनसीबी की इस कार्रवाई को ‘ऑपरेशन क्रिस्टल हंट’ नाम दिया गया। जांच में सामने आया है कि आरोपी किराये के परिसरों का इस्तेमाल नशीले पदार्थों के निर्माण और प्रसंस्करण के लिए कर रहे थे। यह मामला केवल ड्रग्स की बरामदगी तक सीमित नहीं है, बल्कि इस बात की ओर भी इशारा करता है कि संगठित नशा तस्कर अब रिहायशी और अन्य किराये की संपत्तियों को अवैध उत्पादन केंद्रों के रूप में इस्तेमाल करने का प्रयास कर रहे हैं।
किराये के मकानों में चल रही थीं अवैध प्रयोगशालाएं
गौतम बुद्ध नगर जिले के जहांनाबाद कादलपुर गांव में संचालित दोनों प्रयोगशालाओं से बड़ी मात्रा में रासायनिक पदार्थ और उपकरण बरामद हुए हैं। इनमें हाइड्रोक्लोरिक एसिड, एसीटोन, टोल्यून, सल्फ्यूरिक एसिड और पोटैशियम परमैंगनेट जैसे रसायन शामिल हैं। इसके अलावा बड़े हीटिंग उपकरण, कांच के रिएक्शन वेसल, फिल्ट्रेशन मशीनें, रसायनों के भंडारण के ड्रम और अन्य प्रयोगशाला उपकरण भी मिले हैं।
बरामदगी से स्पष्ट है कि इन परिसरों में सामान्य स्तर पर नशीले पदार्थ रखने के बजाय रासायनिक प्रसंस्करण के लिए पर्याप्त इंतजाम किए गए थे। हालांकि, इन प्रयोगशालाओं की पूरी कार्यप्रणाली, उत्पादन क्षमता और इनके पीछे सक्रिय नेटवर्क का पता जांच पूरी होने के बाद ही चल सकेगा।
यह घटना मकान मालिकों और स्थानीय प्रशासन के लिए भी गंभीर सवाल खड़े करती है। किराये पर संपत्ति देने से पहले किरायेदारों की पहचान और उनके उपयोग की जानकारी का सत्यापन बेहद महत्वपूर्ण है। हालांकि, केवल किराये के परिसर से बरामदगी के आधार पर मकान मालिक की संलिप्तता नहीं मानी जा सकती। उसकी भूमिका का निर्धारण उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
आरोपी की पहचान पर भी जांच एजेंसियों की नजर
इस मामले में गिरफ्तार आरोपियों में डेस्टिनी अब्राहम डंबिरी भी शामिल है, जिसने खुद को नाइजीरियाई नागरिक बताया था। लेकिन एनसीबी के अनुसार, आव्रजन रिकॉर्ड में उसके भारत आने का विवरण फ्रांसिस कालोकोह नाम से दर्ज है। रिकॉर्ड के मुताबिक, वह जनवरी 2020 में सिएरा लियोन के नागरिक के रूप में पर्यटक वीजा पर भारत आया था, जिसका वैधता काल दिसंबर 2020 तक था।
एक ही व्यक्ति के अलग-अलग नामों और पहचानों के इस्तेमाल का मामला जांच एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण है। इससे यह पता लगाना जरूरी हो जाता है कि आरोपी ने अपनी पहचान क्यों बदली, क्या इसके पीछे किसी संगठित नेटवर्क की भूमिका थी और क्या इस तरीके का इस्तेमाल जांच या आव्रजन संबंधी प्रक्रियाओं से बचने के लिए किया गया।
दूसरी गिरफ्तार आरोपी लल्लावमजुआली उर्फ ओलिविया लालचविमावी मिजोरम की निवासी है। एनसीबी के मुताबिक, उसे मार्च 2026 में गोवा के डाबोलिम हवाई अड्डे पर 313 ग्राम हेरोइन युक्त पाउडर की बरामदगी से जुड़े मामले में डीआरआई ने गिरफ्तार किया था। वह फिलहाल उस मामले में जमानत पर है। मौजूदा मामले में उसकी भूमिका और पुराने मामले से किसी संभावित संबंध की जांच महत्वपूर्ण होगी।
2024 में भी सामने आया था सिंथेटिक ड्रग्स का मामला
ग्रेटर नोएडा में यह पहली घटना नहीं है, जब अवैध सिंथेटिक ड्रग्स प्रयोगशाला का खुलासा हुआ हो। अक्टूबर 2024 में एनसीबी ने कसना औद्योगिक क्षेत्र में एक ऐसी ही प्रयोगशाला का भंडाफोड़ किया था। उस दौरान ठोस और तरल रूप में लगभग 95.5 किलोग्राम सिंथेटिक ड्रग्स बरामद किए गए थे और पांच लोगों को गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तार आरोपियों में एक मैक्सिको का नागरिक भी शामिल था।
एनसीबी के अनुसार, उस मामले की जांच में मैक्सिको के कुख्यात ड्रग कार्टेल कार्टेल डे जलिस्को नुएवा जेनेरासियोन (CJNG) से कथित संबंधों के संकेत मिले थे। हालांकि, पुराने मामले में सामने आए संदिग्ध संपर्कों को मौजूदा मामले से जोड़कर देखना तब तक उचित नहीं होगा, जब तक जांच में दोनों के बीच कोई प्रमाणित संबंध सामने न आए।
फिर भी, एक ही जिले में अलग-अलग समय पर अवैध सिंथेटिक ड्रग्स प्रयोगशालाओं का सामने आना जांच एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण है। इससे यह पता लगाने की जरूरत बढ़ जाती है कि क्या इस क्षेत्र का इस्तेमाल किसी बड़े नेटवर्क ने रासायनिक पदार्थों की खरीद, उत्पादन, भंडारण या वितरण के लिए किया है।
केवल बरामदगी नहीं, पूरे नेटवर्क तक पहुंचना जरूरी
एनसीबी अब इस नेटवर्क की फंडिंग, रसायनों की खरीद और तैयार नशीले पदार्थों के वितरण से जुड़े संपर्कों की जांच कर रही है। एजेंसी उन लोगों की पहचान करने का प्रयास कर रही है, जिन्होंने कथित तौर पर इस गतिविधि के लिए पैसा उपलब्ध कराया, रसायनों की आपूर्ति की, तकनीकी सहायता दी या तैयार ड्रग्स को बाजार तक पहुंचाने में भूमिका निभाई।
नशीले पदार्थों के संगठित कारोबार पर प्रभावी कार्रवाई के लिए केवल प्रयोगशाला का भंडाफोड़ और आरोपियों की गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं है। जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा उस पूरी श्रृंखला तक पहुंचना है, जिसके जरिए कच्चा माल जुटाया जाता है, नशीले पदार्थ तैयार किए जाते हैं और फिर उन्हें अलग-अलग स्थानों पर पहुंचाया जाता है।
यदि इस नेटवर्क के वित्तीय लेनदेन, आपूर्तिकर्ताओं और वितरण व्यवस्था का पता लगाया जाता है, तो इससे भविष्य में ऐसी गतिविधियों को रोकने में मदद मिल सकती है। साथ ही, दूसरे राज्यों या विदेशों से संभावित संपर्कों की जांच में भी ठोस साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन जरूरी होगा।
सिंथेटिक ड्रग्स के साथ पर्यावरणीय खतरा भी
अवैध ड्रग्स प्रयोगशालाओं का खतरा केवल नशे के प्रसार तक सीमित नहीं है। इनके संचालन में इस्तेमाल होने वाले रसायनों का अनुचित भंडारण और बिना उपचार के उनका निपटान मिट्टी, नालों और जल स्रोतों को प्रदूषित कर सकता है। इससे आसपास रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है।
ऐसे परिसरों में रासायनिक पदार्थों के इस्तेमाल से आग, रिसाव और अन्य दुर्घटनाओं का जोखिम भी हो सकता है। इसलिए ऐसी प्रयोगशालाओं के खिलाफ कार्रवाई के दौरान नशीले पदार्थों की बरामदगी के साथ रासायनिक कचरे के सुरक्षित निपटान और परिसर की सुरक्षा पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।
एनसीबी ने मकान मालिकों, प्रॉपर्टी डीलरों, हाउसिंग सोसाइटियों, आरडब्ल्यूए और सुरक्षा कर्मियों से असामान्य रासायनिक गंध, रसायनों के ड्रमों की संदिग्ध आवाजाही तथा रासायनिक कचरे के अनुचित निपटान जैसी गतिविधियों के प्रति सतर्क रहने की अपील की है। ऐसी विश्वसनीय जानकारी राष्ट्रीय नारकोटिक्स हेल्पलाइन MANAS-1933 पर दी जा सकती है।
नशे के खिलाफ लड़ाई में सतर्कता और समन्वय जरूरी
ग्रेटर नोएडा में हुई यह कार्रवाई नशे के अवैध कारोबार के खिलाफ जांच एजेंसियों की सक्रियता को दर्शाती है। लेकिन इस तरह के मामलों में स्थायी सफलता तभी मिलेगी, जब अवैध उत्पादन केंद्रों के साथ उनके वित्तपोषण, रसायनों की आपूर्ति और वितरण नेटवर्क पर भी प्रभावी कार्रवाई हो।
स्थानीय पुलिस, एनसीबी, अन्य जांच एजेंसियों और प्रशासन के बीच सूचनाओं का बेहतर आदान-प्रदान ऐसे नेटवर्क की पहचान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। वहीं, किराये की संपत्तियों के सत्यापन और संदिग्ध गतिविधियों की समय पर सूचना देने से भी अवैध गतिविधियों पर अंकुश लगाने में मदद मिल सकती है।
नशामुक्त भारत का लक्ष्य केवल नशीले पदार्थों की बरामदगी से हासिल नहीं होगा। इसके लिए संगठित तस्करी के नेटवर्क को कमजोर करने, युवाओं को नशे से बचाने, जनजागरूकता बढ़ाने और कानून के प्रभावी क्रियान्वयन की जरूरत है। ऑपरेशन क्रिस्टल हंट की असली सफलता इस बात से भी आंकी जाएगी कि जांच एजेंसियां इन दो प्रयोगशालाओं के पीछे सक्रिय पूरे नेटवर्क का पता लगाने और उसके खिलाफ कितनी प्रभावी कार्रवाई करने में सफल होती हैं।





