स्वदेश कुमार
उत्तर प्रदेश की सियासी बिसात पर साल 2027 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले पश्चिमी अंचल में एक ऐसा बड़ा राजनीतिक फेरबदल हुआ है जिसने न केवल क्षेत्रीय समीकरणों को हिला दिया है बल्कि छोटे दलों के उभार और उनके स्थायित्व पर भी गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। मुजफ्फरनगर और शामली से लेकर सहारनपुर तक अपनी मजबूत पकड़ रखने वाले कद्दावर मुस्लिम नेता और पूर्व सांसद अमीर आलम तथा उनके विधायक बेटे नवाजिश आलम ने चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी का दामन छोड़कर कांग्रेस का हाथ थाम लिया है। राजनीति के गलियारों में इस घटनाक्रम को एक बड़े राजनीतिक टर्निंग्स के रूप में देखा जा रहा है क्योंकि महज डेढ़ साल पहले ही यह परिवार राष्ट्रीय लोकदल को छोड़कर चंद्रशेखर के पाले में आया था और अब चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस के पाले में खड़ा नजर आ रहा है। इस दल-बदल के राजनीतिक मायने बहुत दूरगामी हैं और इसका सीधा असर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के उस सियासी ताने-बाने पर पड़ना तय है जिसे हालिया लोकसभा चुनावों के बाद एक नई दिशा मिलने का दावा किया जा रहा था।
यदि इस पूरे घटनाक्रम के आंकड़ों और राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो अमीर आलम परिवार का पश्चिमी यूपी की सियासत में पिछले चार दशकों से गहरा दखल रहा है। अमीर आलम के राजनीतिक सफर की शुरुआत साल 1985 में हुई थी जब वह पहली बार थानाभवन विधानसभा सीट से विधायक चुने गए थे। इसके बाद साल 1989 में उन्होंने मोरना सीट से जीत दर्ज की और फिर साल 1996 में एक बार फिर थानाभवन से विधानसभा पहुंचे। अपनी लंबी राजनीतिक यात्रा के दौरान वह उत्तर प्रदेश सरकार में परिवहन मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद पर भी रहे। इसके अलावा कैराना लोकसभा सीट से सांसद चुने जाने और समाजवादी पार्टी के कोटे से राज्यसभा सदस्य बनने तक का उनका सफर इस बात की गवाही देता है कि वह इस क्षेत्र के कितने प्रभावशाली और स्थापित राजनेता रहे हैं। उनके बेटे नवाजिश आलम ने भी अपने पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए साल 2012 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर बुढ़ाना विधानसभा सीट से जीत हासिल की थी और सबसे कम उम्र के विधायकों में शुमार हुए थे। हालांकि इसके बाद उनका राजनीतिक सफर कई दलों के बीच घूमता रहा। साल 2017 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने मीरापुर सीट से बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद साल 2018 में वह राष्ट्रीय लोकदल में शामिल हुए और साल 2025 में अपने पिता के साथ आजाद समाज पार्टी का दामन थाम लिया था। अब सितंबर 2026 के इस ताजा घटनाक्रम में उन्होंने आजाद समाज पार्टी से नाता तोड़कर कांग्रेस का हाथ थाम लिया है, जिससे पश्चिमी यूपी की राजनीति में एक बार फिर नए समीकरणों की चर्चा तेज हो गई है।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या इससे आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष और नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद की दलित-मुस्लिम राजनीति को करारा झटका लगा है। साल 2024 के लोकसभा चुनावों में जब चंद्रशेखर आजाद ने नगीना सीट पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी, तब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक नए दलित-मुस्लिम राजनीतिक गठबंधन की जोरदार चर्चा शुरू हुई थी। ऐसा माना जा रहा था कि सीएए-एनआरसी आंदोलनों और अन्य सामाजिक मुद्दों पर मुस्लिम युवाओं के बीच अपनी पैठ बनाने वाले चंद्रशेखर आजाद दलितों और मुस्लिमों को एक मंच पर लाने में कामयाब हो रहे हैं। लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले अमीर आलम और नवाजिश आलम जैसे कद्दावर मुस्लिम चेहरों का पार्टी छोड़कर जाना इस बात का संकेत है कि छोटे दलों के लिए बड़े और प्रभावशाली नेताओं को लंबे समय तक बांधे रखना आसान नहीं होता है। पार्टी छोड़ने के बाद नवाजिश आलम और उनके पिता की ओर से खुलकर यह सवाल उठाए गए कि आजाद समाज पार्टी की खुद दलित समुदाय के बीच अपेक्षित स्वीकार्यता नहीं बन पा रही है और पार्टी के भीतर मुस्लिम समाज के राजनीतिक हितों की अनदेखी हो रही है। उन्होंने नेतृत्व पर वादे पूरे न करने और संवाद में कमी के गंभीर आरोप भी लगाए हैं। हालांकि राजनीति के जानकारों का मानना है कि किसी कद्दावर नेता के पार्टी छोड़ने से उस नेता का अपना पारंपरिक वोट बैंक तो प्रभावित हो सकता है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि पूरा का पूरा समुदाय एक झटके में दिशा बदल ले। इसके बावजूद चंद्रशेखर के लिए यह एक बड़ा वैचारिक और संगठनात्मक झटका जरूर है क्योंकि पश्चिमी यूपी में पार्टी को स्थापित करने वाले शुरुआती बड़े चेहरों में इस परिवार की गिनती होती थी।
कांग्रेस पार्टी के दृष्टिकोण से देखा जाए तो इस परिवार की घर वापसी या यूं कहें कि कांग्रेस में एंट्री पार्टी की उस रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपने पुराने जनाधार को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रही है। इमरान मसूद और अन्य स्थानीय नेताओं की सक्रियता के बीच अमीर आलम जैसे चार दशक पुराने राजनीतिक चेहरे का कांग्रेस में आना पार्टी के कार्यकर्ताओं में नया जोश भर सकता है। विशेषकर थानाभवन और बुढ़ाना जैसी विधानसभा सीटों पर जहां इस परिवार का सीधा प्रभाव माना जाता है, वहां कांग्रेस को सीधा लाभ मिल सकता है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी जोरों पर है कि आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव में यदि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन होता है और थानाभवन सीट कांग्रेस के कोटे में आती है, तो नवाजिश आलम वहां से पार्टी के मुख्य उम्मीदवार हो सकते हैं। हालांकि इस पर अभी तक किसी भी दल की ओर से आधिकारिक मुहर नहीं लगाई गई है, लेकिन जिस तरह से दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में प्रदेश अध्यक्ष अजय राय, यूपी प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम और सांसद इमरान मसूद की मौजूदगी में इस परिवार ने सदस्यता ग्रहण की है, उससे यह साफ है कि आने वाले दिनों में इनकी भूमिका काफी अहम होने वाली है।
दूसरी ओर, इस राजनीतिक उथल-पुथल का असर समाजवादी पार्टी, भारतीय जनता पार्टी और बहुजन समाज पार्टी पर भी पड़ना तय है। नवाजिश आलम की राजनीतिक शुरुआत चूंकि समाजवादी पार्टी से ही हुई थी और वह 2012 में सपा के टिकट पर ही विधानसभा पहुंचे थे, इसलिए सपा के रणनीतिकार भी इस पूरे घटनाक्रम पर बारीक नजर बनाए हुए हैं। पश्चिमी यूपी में मुस्लिम वोट बैंक हमेशा से समाजवादी पार्टी का मुख्य आधार रहा है, और यदि कांग्रेस मजबूत होती है या कांग्रेस के साथ गठबंधन मजबूत होता है, तो सीटों के बंटवारे को लेकर समीकरण बदल सकते हैं। वहीं बहुजन समाज पार्टी के लिए भी यह सोचने का विषय है क्योंकि नवाजिश 2017 में बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हैं और अंचल में दलित-मुस्लिम गठजोड़ की काट ढूंढना बसपा के लिए भी बड़ी चुनौती होगा। भारतीय जनता पार्टी इस पूरे घटनाक्रम को बहुत ही सतर्कता से देख रही है क्योंकि विपक्ष के भीतर हो रहे ये बदलाव जमीन पर वोटों के ट्रांसफर में कितने कारगर साबित होंगे, यह तो चुनाव वक्त ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश का चुनावी रण अब बेहद दिलचस्प और बहुकोणीय होता जा रहा है जहां हर एक नेता और हर एक परिवार का पाला बदलना सियासी हवा का रुख मोड़ने की पूरी ताकत रखता है।





