जब संसद में संवाद घटता है, लोकतंत्र भी कमजोर होता है

When dialogue in Parliament declines, democracy also weakens

बीएस ललित

एक जगह जहाँ सत्ता से सवाल पूछे जाएँ, असहमति को सुना जाए, नीतियों की कसौटी पर सरकार को परखा जाए और किसी विधेयक के कानून बनने से पहले उसके हर पहलू पर गंभीर विचार हो और ऐसे ही भारतीय लोकतंत्र की सबसे जीवंत तस्वीर संसद के भीतर दिखाई देनी चाहिए। चुनाव सरकार बनाते हैं, लेकिन संसद उस सरकार को जवाबदेह बनाती है और इसलिए संसद की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं हो सकता कि उसने कितने विधेयक पारित किए या कितने घंटे काम किया बल्कि असली सवाल यह है कि उन घंटों में कितना संवाद हुआ, कितने सवालों के जवाब मिले और कानून बनने से पहले कितनी गंभीर बहस हुई।

हाल के वर्षों के संसदीय आँकड़े इसी सवाल को और भी महत्वपूर्ण बनाते हैं। वर्ष 2025 के बजट सत्र में भारतीय संसद ने कुल 26 दिन काम किया। प्रश्नकाल की बात की जाए तो लोकसभा में निर्धारित समय का लगभग 78 प्रतिशत और राज्यसभा में 83 प्रतिशत चला।
पहली नजर में ये आंकड़े बहुत चिंताजनक नहीं लग सकते, लेकिन बजट पर चर्चा की तस्वीर अलग थी। लोकसभा में विभिन्न मंत्रालयों के कुल बजटीय व्यय का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा बिना चर्चा के पारित हो गया अर्थात 90 प्रतिशत हिस्से की न जवाबदेही थी और न सवाल। बजट केवल आमदनी और खर्च का लेखा-जोखा नहीं होता बल्कि वह सरकार की आर्थिक और सामाजिक प्राथमिकताओं का दस्तावेज होता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, ग्रामीण विकास, रक्षा और रोजगार पर सरकार कितना खर्च करेगी, इसका सीधा संबंध भारत के करोड़ों नागरिकों के जीवन से है और यदि इस व्यय का बड़ा हिस्सा विस्तृत संसदीय चर्चा के बिना मंजूर हो जाए तो सवाल केवल प्रक्रिया का नहीं, लोकतांत्रिक जवाबदेही का भी है।

2025 का मानसून सत्र इस चिंता को और गहरा करता है। दोनों सदनों का लगभग दो-तिहाई समय व्यवधानों की भेंट चढ़ गया। लोकसभा अपने निर्धारित समय का करीब 29 प्रतिशत और राज्यसभा 34 प्रतिशत ही काम कर सकी जिसमें सबसे ज्यादा नुकसान प्रश्नकाल का हुआ। लोकसभा में प्रश्नकाल निर्धारित समय का करीब 23 प्रतिशत और राज्यसभा में केवल 6 प्रतिशत चल पाया। मंत्रियों ने लोकसभा में लगभग 8 प्रतिशत और राज्यसभा में करीब 5 प्रतिशत तारांकित प्रश्नों के मौखिक उत्तर दिए मतलब कि जो जनता संसद की वेबसाइट पर जाकर पढ़ेगी नहीं जो कि 95 प्रतिशत से अधिक है, उसे कभी मालूम नहीं होगा कि सवाल क्या महत्वपूर्ण थे और क्या उनके जवाब मिले।

इन आंकड़ों को महज संसद की उत्पादकता के रूप में देखना काफी नहीं है, प्रश्नकाल लोकतांत्रिक जवाबदेही का सबसे प्रत्यक्ष साधन है। सांसद जब किसी मंत्रालय से बेरोजगारी, रेल सुरक्षा, किसानों, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण या किसी सरकारी योजना पर सवाल पूछता है, तो वह केवल अपनी जिज्ञासा शांत नहीं कर रहा होता बल्कि वह नागरिकों की ओर से कार्यपालिका से जवाब मांग रहा होता है। सरकार का उत्तर संसद के रिकॉर्ड का हिस्सा बनता है और कई बार वही उत्तर नीति की कमियों को सामने लाता है इसलिए प्रश्नकाल का बाधित होना केवल एक घंटे का नुकसान नहीं, सरकार से जवाब मांगने के अवसर का नुकसान है।

चिंता का दूसरा पहलू कानून बनाने की गति और उस पर होने वाली चर्चा है। 17वीं लोकसभा के दौरान 179 विधेयक पारित हुए। इनमें लगभग 58 प्रतिशत विधेयक पेश होने के दो सप्ताह के भीतर पारित कर दिए गए और करीब 35 प्रतिशत विधेयक लोकसभा में एक घंटे से भी कम चर्चा के बाद पारित हुए। इसी अवधि में केवल लगभग 16 प्रतिशत विधेयकों को संसदीय समितियों के पास विस्तृत परीक्षण के लिए भेजा गया। 2025 के मानसून सत्र में भी 13 विधेयक पेश किए गए। इनमें पांच को समितियों के पास भेजा गया, जबकि आठ उसी सत्र में पारित हो गए। इसी सत्र में आयकर से संबंधित एक महत्वपूर्ण विधेयक लोकसभा में महज कुछ मिनट की चर्चा के बाद पारित हुआ।

संस्थागत कार्यों में तेजी अपने आप में गलत नहीं है क्योंकि किसी सरकार को जनादेश इसलिए मिलता है कि वह निर्णय ले और नीतियों को लागू करे लेकिन कानून बनाने में गति और जल्दबाजी के बीच अंतर होता है। बिना बहस के जनादेश भी अधूरा है और संसद में विधेयक पर बहस का उद्देश्य सरकार को रोकना नहीं, कानून को बेहतर बनाना है।

संसद के वृताकार होने का संदर्भ था कि सत्ता पक्ष से बिल निकल कर विपक्ष की तरफ जाए और विपक्ष उसे बेहतर बनाए ओर प्रक्रिया बिना रुके जनहित में कानून बने और सत्ता पक्ष उसके पक्ष में तर्क रखता है, विपक्ष कमियों की ओर ध्यान दिलाता है, क्षेत्रीय दल अपने राज्यों की चिंताएँ सामने रखते हैं और अलग-अलग सामाजिक वर्गों का प्रतिनिधित्व करने वाले सांसद कानून के संभावित प्रभावों पर सवाल उठाते हैं। इसी प्रक्रिया से कानून का वह पक्ष सामने आ सकता है जो उसे तैयार करने वाले मंत्रालय या नौकरशाही की नजर से छूट गया हो।

यहीं संसदीय समितियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। सदन में राजनीतिक बहस अक्सर समय और परिस्थितियों से बंधी होती है, जबकि समितियाँ किसी विधेयक या नीति का विस्तार से अध्ययन कर सकती हैं। विशेषज्ञों, अधिकारियों और संबंधित पक्षों से राय ली जा सकती है। विभिन्न दलों के सांसद अपेक्षाकृत कम राजनीतिक शोर के बीच किसी विषय की बारीकियों पर काम कर सकते हैं। 17वीं लोकसभा के दौरान संसदीय समितियों की लगभग 1,700 बैठकें होना बताता है कि संसद का गंभीर काम केवल सदन में दिखाई देने वाली कार्यवाही तक सीमित नहीं है। लेकिन यदि महत्वपूर्ण विधेयकों का छोटा हिस्सा ही समितियों के पास जाएगा, तो इस व्यवस्था की क्षमता का पूरा उपयोग कैसे होगा?

विपक्ष का जवाब मांगना आवश्यक है क्योंकि वे भी एक बड़े हिस्से के प्रतिनिधि हैं और सरकार के पास बहुमत होना बहस की आवश्यकता को समाप्त नहीं करता। लोकतंत्र में बहुमत निर्णय लेने का अधिकार देता है, असहमति को अप्रासंगिक बनाने का अधिकार नहीं। संसद में विपक्ष संख्या में कम हो सकता है, लेकिन उसके पीछे भी करोड़ों मतदाता होते हैं और उसकी आवाज सुनना किसी सरकार की कमजोरी नहीं बल्कि लोकतांत्रिक आत्मविश्वास का प्रमाण है। मजबूत सरकार वह नहीं जिसे सवालों का सामना न करना पड़े; मजबूत सरकार वह है जो कठिन सवालों का जवाब दे सके।

संसद में घटती बहस का एक और नुकसान सार्वजनिक विमर्श पर पड़ता है। कभी संसदीय भाषण देश के बड़े राजनीतिक और सामाजिक प्रश्नों को दिशा देते थे, तर्कों का जवाब तर्कों से दिया जाता था और मतभेद के बावजूद संसद राष्ट्रीय संवाद का केंद्र बनी रहती थी। आज जब राजनीतिक विमर्श का बड़ा हिस्सा कुछ सेकंड के वीडियो, सोशल मीडिया पोस्ट और टेलीविजन की बहसों में सिमटता जा रहा है, तब संसद की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है। सोशल मीडिया प्रतिक्रिया दे सकता है, लेकिन कानून नहीं बना सकता। टेलीविजन बहस करा सकता है, लेकिन मंत्री से आधिकारिक जवाब दर्ज नहीं करा सकता। यह जिम्मेदारी संसद की ही है।

इसलिए संसदीय सुधार का लक्ष्य केवल अधिक घंटे काम करना नहीं होना चाहिए, बल्कि उन घंटों को अधिक सार्थक बनाना चाहिए। प्रश्नकाल की रक्षा होनी चाहिए। महत्वपूर्ण विधेयकों को पर्याप्त समय और जहाँ आवश्यक हो, संसदीय समितियों का परीक्षण मिलना चाहिए। बजट में बड़े मंत्रालयों और महत्वपूर्ण मदों पर वास्तविक चर्चा सुनिश्चित होनी चाहिए। सरकार को विपक्ष द्वारा उठाए गए महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा के लिए पर्याप्त अवसर देना चाहिए और विपक्ष को भी विरोध तथा व्यवधान के बीच की सीमा पहचाननी होगी। संसद की उत्पादकता केवल पारित विधेयकों की संख्या से नहीं, विमर्श की गुणवत्ता से मापी जानी चाहिए।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। लेकिन लोकतंत्र का गौरव केवल मतदाताओं की संख्या से नहीं आता; उसकी गुणवत्ता उन संस्थाओं से तय होती है जो जनता के जनादेश को जवाबदेही में बदलती हैं। संसद उनमें सर्वोच्च है। चुनाव में बहुमत सरकार बनाता है, मगर संसद में संवाद लोकतंत्र बनाता है। बहुमत और बहस एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। एक सरकार को निर्णय लेने की शक्ति देता है, दूसरा उस निर्णय को लोकतांत्रिक वैधता और विवेक देता है।

संसद में असहमति होना संकट नहीं है; असहमति को सुनने की जगह कम होना संकट है। वहाँ तीखी बहस हो, सरकार से कठिन सवाल पूछे जाएँ, विपक्ष की आलोचना हो और अंततः बहुमत अपना निर्णय ले और यही संसदीय लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है। संसद का मूल्य केवल इस बात में नहीं कि वहाँ कानून बनते हैं, बल्कि इस बात में है कि कानून बनने से पहले देश बोलता है। जिस दिन यह संवाद कमजोर पड़ता है, उस दिन केवल संसद की आवाज धीमी नहीं होती बल्कि लोकतंत्र की एक बुनियादी शक्ति भी कमजोर होती है।