फीते से नहीं, फिटनेस से चलती है सरकार की बस

The government's bus runs on fitness, not ribbons

प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

मध्यप्रदेश की ‘मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा’ का तीसरे दिन ही ऐसा इम्तिहान हुआ कि नाम ‘सुगम’ और नतीजा ‘गम’ बन गया। दो दिन पहले ढोल-नगाड़ों, कैमरों और भाषणों के बीच जिस सेवा का शुभारंभ हुआ था, उसी की पीएम ई-बस (इलेक्ट्रिक) ने तीसरे दिन इंदौर के राजवाड़ा पर राहगीरों और ऑटो/ई-रिक्शा को टक्कर मारते हुए दुकान के काउंटर तक पहुँचकर हादसा कर दिया। प्रारंभिक रिपोर्टों में ब्रेक फेल होने या चालक की गफलत की बात कही जा रही है। एक नागरिक की मौत हुई, दो-तीन लोग घायल हुए। जनता के लिए शुरू हुई सेवा तीसरे दिन अस्पताल पहुँचाने लगे, तो सवाल बस का नहीं, पूरी व्यवस्था की तैयारी का है। उद्घाटन में सरकार ने फीता काटा था, तीसरे दिन बस ने जनता की सुरक्षा का भरोसा काट दिया—सरकारी योजना का इससे करारा परिणाम क्या होगा?

बस पर नया रंग चढ़ जाने से व्यवस्था नई नहीं हो जाती। सुगम सेवा में कुछ पुरानी/सेकंड-हैंड बसों को रंग-रोगन कर उतारने के आरोप पर विपक्ष ने शुभारंभ के तुरंत बाद सवाल उठाए थे। हालांकि हादसे वाली बस नई पीएम ई-बस (इलेक्ट्रिक) बताई गई है। सवाल फिर भी वही है—नई बस हो या पुरानी, सुरक्षा कहाँ है? रंग ब्रेक नहीं लगाता। फिटनेस और सुरक्षा की जगह चमक दिखाना जनता की आँखों में धूल झोंकना है। सड़क पर रंग नहीं, फिटनेस चाहिए। यात्री को बस में बैठते वक्त सिर्फ इतना भरोसा चाहिए कि वह सुरक्षित घर पहुँचे, सरकारी विज्ञापन में न चमके।

सवाल बस के ब्रेक का नहीं, उस व्यवस्था का है जिसने उसे सड़क पर उतारा। फिटनेस किसने दी? प्रमाणपत्र किसने जारी किया? ब्रेक किसने जाँचे? ड्राइवर को कितना प्रशिक्षण मिला? स्वतंत्र तकनीकी जाँच हुई या कागजों ने ही बस को सड़क पर भेज दिया? योजना शुरू होते ही/उद्घाटन के तुरंत बाद विपक्ष (कांग्रेस) ने पुरानी, रंग-रोगन वाली और अनफिट बसों पर सवाल उठाए थे। उन सवालों को राजनीतिक शोर मानकर दबाया गया या तकनीकी जाँच हुई—अब यह साफ होना चाहिए। क्योंकि ब्रेक फेल होने या हादसे के बाद जाँच करना सुरक्षा व्यवस्था नहीं, हादसे का इंतजार है।

हादसा होते ही व्यवस्था का सबसे आसान हथियार निकलता है—‘जाँच’। मौत हुई तो जाँच, लापरवाही मिली तो जाँच, कार्रवाई पूछी गई तो फिर जाँच। समितियाँ इतनी बन चुकी हैं कि उन्हें पहिए लगा दें तो शायद शहर की परिवहन व्यवस्था ही चल पड़े। मगर जिस परिवार ने अपना सदस्य खोया, उसे रिपोर्ट नहीं, न्याय चाहिए। घायलों को सरकारी बयान नहीं, इलाज चाहिए। नागरिक को आश्वासन नहीं, यह भरोसा चाहिए कि अगली बस उसके घर से किसी को अस्पताल नहीं पहुँचाएगी। ‘दुर्भाग्यपूर्ण घटना’ कहना आसान है, जिम्मेदार तय करना मुश्किल। इसलिए व्यवस्था फिर वही करती है—जाँच बैठा देती है।

बस पर पथराव और तोड़फोड़ गलत है, लेकिन जनता के गुस्से का कारण भी समझना होगा। हादसे के बाद भीड़ ने कांच फोड़े और बस में तोड़फोड़ की। जब नागरिक को लगे कि उसकी जान से ज्यादा अहमियत उद्घाटन और प्रचार को है, तो गुस्सा शीशे से आगे व्यवस्था तक पहुँचता है। जनता को संयम सिखाना आसान है, सत्ता को सावधानी सिखाना कठिन। जो व्यवस्था नागरिक से ट्रैफिक नियमों का पालन कराती है, उसे पहले अपनी बस की फिटनेस का हिसाब देना चाहिए। एक तरफ नियम तोड़ने पर चालान, दूसरी तरफ सरकारी बस की फिटनेस संदिग्ध—यह अनुशासन नहीं, दो तराजू हैं। नियम जनता के लिए और सुरक्षा कागजों के लिए कब तक?

सरकार के लिए बस शुरू करना उपलब्धि हो सकती है, मगर उसे सुरक्षित चलाना असली परीक्षा है। यहाँ अक्सर फीता पहले कटता है, फिटनेस बाद में देखी जाती है; कैमरे पहले आते हैं, तकनीकी जाँच बाद में। प्रचार समय पर होता है, जवाबदेही हमेशा देर से। सार्वजनिक परिवहन की सफलता उद्घाटन नहीं, वह दिन है जब बस बिना हादसे रोज चले, ड्राइवर सुरक्षित लौटे और यात्री सकुशल घर पहुँचे—भले इसकी तस्वीर कहीं न छपे। मंच पर तालियाँ मिल सकती हैं, सड़क पर सुरक्षा नहीं। शासन की असली परीक्षा कैमरे के सामने नहीं, सड़क पर होती है।

हर हादसे के पीछे सिर्फ एक क्षण नहीं, उससे पहले की पूरी व्यवस्था होती है। ब्रेक फेल हुआ तो सवाल सिर्फ तकनीकी खराबी का नहीं—यह भी कि उसे पहले क्यों नहीं पकड़ा गया। घायल संख्या नहीं हैं, राजवाड़ा की अफरातफरी मामूली घटना नहीं और टूटा काउंटर सिर्फ संपत्ति का नुकसान नहीं। पुरानी बसों का सवाल भी एक वाहन तक सीमित नहीं। असली सवाल है—योजना कैसे बनी, बसें कैसे चुनी गईं और सुरक्षा कहाँ जाँची गई? यदि लापरवाही या नियमों की अनदेखी हुई है, तो इसे ‘दुर्घटना’ कहकर फाइल बंद करना हादसे के बाद का दूसरा अन्याय होगा।

अब सरकार को भाषण नहीं, जवाब देना है। मृतक परिवार को न्याय, घायलों को पूरा इलाज और नागरिकों को साफ जानकारी चाहिए। बस को किसने पास किया, फिटनेस प्रमाणपत्र किसने दिया, संचालन की अनुमति किसने दी और निगरानी कहाँ हुई—इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए। बस सभी मानकों पर खरी थी तो ब्रेक फेल होने की वजह सामने आए; मानकों की अनदेखी हुई तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई हो। वरना नया मंच सजेगा, नया रंग चढ़ेगा और पुरानी लापरवाही फिर सड़क पर उतर आएगी।

एक बस का हादसा हुआ है, लेकिन जोखिम सिर्फ एक बस तक सीमित नहीं। इंदौर में सुगम सेवा की करीब 145 बसें (50 इंटरसिटी + 95 इंट्रासिटी) और पीएम ई-बस सेवा की बसों समेत प्रदेश में प्रारंभिक चरण में 351 बसें शुरू हुई हैं। सवाल है—क्या इन सभी की फिटनेस, ब्रेक सिस्टम और चालक प्रशिक्षण की तत्काल दोबारा जाँच होगी, या अगला ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ हादसा होने तक बसें यूँ ही चलती रहेंगी? इस मौत के बाद भी बिना ताजा तकनीकी जाँच बसें सड़क पर उतारी गईं, तो यह महज लापरवाही नहीं, जानबूझकर जोखिम उठाने वाली व्यवस्था का सवाल बनेगा।

राजवाड़ा का हादसा सिर्फ एक बस की उम्र का सवाल नहीं, व्यवस्था की सोच का आईना है। कब तक पुराने ढर्रे पर नया रंग चढ़ाकर उसे नई योजना बताया जाएगा? जनता को बस की चमक दिखाई जाती है, भीतर की सुरक्षा नहीं। सड़क पर रंग नहीं, ब्रेक काम आते हैं; भाषण नहीं, तकनीकी जाँच हादसे रोकती है। उद्घाटन नहीं, जवाबदेही सुरक्षा देती है। अगर अब भी सबक नहीं लिया गया तो अगली दुर्घटना फिर ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ कहलाएगी, समिति बैठेगी और फाइल चलेगी। हमारे यहाँ हादसा खत्म होते ही जिम्मेदारी शुरू नहीं होती, उसे खत्म करने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।