कचरा प्रबंधन की कमजोरी से बढ़ रहा जलभराव का संकट
सत्य भूषण शर्मा
मानसून आते ही देश के अनेक शहरों की तस्वीर लगभग हर वर्ष एक जैसी दिखाई देती है—सड़कें जलमग्न, गलियां तालाब में तब्दील, वाहन पानी में फंसे और घर-दुकानों में बारिश का पानी घुसता हुआ। कुछ घंटों की तेज बारिश कई बार जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर देती है। सवाल यह है कि क्या हर बार शहरों के डूबने का कारण केवल अत्यधिक बारिश को माना जाए? या इसके पीछे हमारी अपनी व्यवस्थागत कमियां भी उतनी ही जिम्मेदार हैं?
वास्तविकता यह है कि बारिश का पानी अपने साथ केवल बूंदें नहीं लाता, बल्कि वह शहर की सफाई और जलनिकासी व्यवस्था की परीक्षा भी लेता है। जिन नालियों, नालों और जलनिकासी मार्गों को वर्षभर साफ और सक्रिय रहना चाहिए, वे अक्सर कचरे, प्लास्टिक, गाद और अन्य अवरोधों से भर जाते हैं। परिणामस्वरूप पानी का प्राकृतिक प्रवाह रुक जाता है और कुछ ही समय में सड़कें जलभराव का शिकार हो जाती हैं।
कचरा बना जलनिकासी का सबसे बड़ा दुश्मन:
शहरों में घरों और बाजारों से निकलने वाला कचरा यदि निर्धारित स्थान तक नहीं पहुंचता तो उसका एक बड़ा हिस्सा नालियों में चला जाता है। प्लास्टिक की थैलियां, बोतलें, खाद्य पैकेट, थर्माकोल और अन्य अनुपयोगी सामग्री जलनिकासी के रास्ते को बाधित कर देती हैं।
समस्या केवल नागरिकों की लापरवाही तक सीमित नहीं है। कई जगह कचरा संग्रहण की व्यवस्था नियमित नहीं होती, पर्याप्त कूड़ेदान उपलब्ध नहीं होते और गीले-सूखे कचरे का पृथक्करण भी प्रभावी रूप से लागू नहीं हो पाता। जब कचरा प्रबंधन कमजोर होता है तो उसका सीधा असर शहर की जलनिकासी व्यवस्था पर दिखाई देता है।
नालों की सफाई केवल मानसून से पहले क्यों?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि नालों की सफाई को मानसून पूर्व अभियान तक ही सीमित क्यों रखा जाए? नालियों में कचरा और गाद एक-दो दिन में जमा नहीं होती। वर्षभर धीरे-धीरे जमा होने वाला कचरा बारिश आने पर अचानक बड़ी समस्या बन जाता है।
इसलिए केवल मानसून से पहले नालियों की सफाई कर देना पर्याप्त नहीं है। नगर निकायों को जलभराव वाले क्षेत्रों की स्थायी सूची बनाकर नियमित निरीक्षण और सफाई की व्यवस्था करनी होगी। जहां बार-बार पानी जमा होता है, वहां केवल सफाई नहीं बल्कि जलनिकासी की क्षमता और संरचना की भी समीक्षा आवश्यक है।
शहरों ने प्रकृति के रास्ते बंद कर दिए:
शहरीकरण की तेज दौड़ में हमने तालाबों, छोटे जलस्रोतों, प्राकृतिक नालों और खुले भूभाग को लगातार कम किया है। जहां कभी बारिश का पानी जमीन में समा जाता था, वहां आज कंक्रीट की सड़कें और इमारतें खड़ी हैं।
पानी अपने लिए रास्ता खोजता है। जब उसके प्राकृतिक रास्ते बाधित होते हैं तो वह सड़कों, निचले इलाकों और घरों की ओर बढ़ता है। इसलिए जलभराव का समाधान केवल बड़ी नालियां बनाना नहीं, बल्कि प्राकृतिक जलप्रवाह को समझना और सुरक्षित रखना भी है।
जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं:
जलभराव से निपटने की जिम्मेदारी निश्चित रूप से नगर निकायों और प्रशासन की है, लेकिन नागरिकों की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
सड़क पर कचरा फेंकना, नाली में प्लास्टिक डालना, नाली के किनारे निर्माण सामग्री रखना अथवा सार्वजनिक स्थानों पर कूड़ा जमा करना अंततः पूरे शहर के लिए संकट पैदा करता है। नाली में फेंका गया एक छोटा प्लास्टिक का टुकड़ा अकेले महत्वहीन लग सकता है, लेकिन जब हजारों ऐसी वस्तुएं किसी निकासी बिंदु को बंद करती हैं तो वही छोटी-छोटी लापरवाहियां बड़े जलभराव का कारण बन जाती हैं।
समाधान क्या है?
शहरों को जलभराव से बचाने के लिए ‘बारिश से पहले सफाई’ की जगह ‘पूरे वर्ष जलनिकासी प्रबंधन’ की नीति अपनानी होगी।
इसके लिए—
- · नालों और नालियों की नियमित सफाई हो।
- · गीले और सूखे कचरे का प्रभावी पृथक्करण किया जाए।
- · प्लास्टिक कचरे पर प्रभावी नियंत्रण हो।
- · प्राकृतिक नालों और जलस्रोतों को अतिक्रमण से मुक्त रखा जाए।
- · वर्षाजल संचयन को प्राथमिकता दी जाए।
- · जलभराव वाले स्थानों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराया जाए।
- · प्रत्येक बड़े शहर में जलभराव का डिजिटल मानचित्र तैयार किया जाए।
- · नागरिकों द्वारा दी गई शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।
शहरों को यह भी समझना होगा कि हर जगह केवल कंक्रीट बिछा देना विकास नहीं है। हमें ऐसे शहरी ढांचे की आवश्यकता है जिसमें बारिश का कुछ पानी जमीन में समा सके, जलस्रोतों का पुनर्भरण हो और अतिरिक्त पानी सुरक्षित तरीके से बाहर निकल सके।
बारिश समस्या नहीं, हमारी तैयारी की परीक्षा है:
बारिश को रोका नहीं जा सकता और न ही रोकना चाहिए। बारिश प्रकृति का वरदान है। संकट तब पैदा होता है जब हम उसके रास्ते रोक देते हैं। यदि नालियां कचरे से भरी हों, प्राकृतिक जलमार्ग अतिक्रमण से बंद हों और हर खाली जमीन पर कंक्रीट बिछता जाए तो केवल बादलों को दोष देना उचित नहीं होगा।
शहरों का डूबना केवल मौसम की मार नहीं, बल्कि हमारी व्यवस्थागत कमियों का आईना भी है।
अब समय आ गया है कि मानसून के बाद नुकसान गिनने की बजाय मानसून से पहले और पूरे वर्ष ऐसी व्यवस्था बनाई जाए, जिसमें बारिश का पानी संकट नहीं, बल्कि संसाधन बने।





