अजय कुमार
उत्तर प्रदेश की सियासत में जब भी चुनाव की आहट आती है, ब्राह्मण समाज अचानक चर्चा के केंद्र में आ जाता है। आबादी के हिसाब से यह समुदाय राज्य की कुल जनसंख्या का करीब नौ से बारह प्रतिशत ही है, लेकिन प्रभाव इतना ज्यादा है कि कोई भी पार्टी इसे नजरअंदाज नहीं कर सकती। मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश, अवध और पूर्वांचल के कई जिलों में ब्राह्मण मतदाता पंद्रह से बीस प्रतिशत तक हैं। वाराणसी, गोरखपुर, देवरिया, जौनपुर, प्रयागराज, कानपुर, बस्ती, महाराजगंज जैसे इलाकों में इनके वोट किसी भी उम्मीदवार की जीत-हार तय करने की क्षमता रखते हैं। राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि साठ से अस्सी और कुछ अनुमानों में सौ से ज्यादा विधानसभा सीटों पर ब्राह्मण निर्णायक भूमिका निभाते हैं। यही वजह है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी ने इस वर्ग को साधने की पूरी ताकत लगा दी है।बुधवार को लखनऊ में जनेश्वर मिश्र की जयंती पर सपा ने प्रबुद्ध सम्मेलन आयोजित किया। जनेश्वर मिश्र को छोटे लोहिया कहा जाता था। वे समाजवादी विचारधारा के स्तंभ थे और ब्राह्मण समाज के प्रभावशाली चेहरे भी। सपा का दावा था कि प्रदेशभर से करीब बीस हजार लोग जुटेंगे। जनेश्वर मिश्र पार्क में अनुमति नहीं मिली तो कार्यक्रम पार्टी मुख्यालय पर हुआ। अखिलेश यादव ने पहले मिश्र की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया, फिर मंच पर पहुंचे। मंच पर माता प्रसाद पांडेय, सनातन पांडेय, पवन पांडेय जैसे ब्राह्मण नेता प्रमुखता से बैठे। काशी, मथुरा, अयोध्या से संत-विद्वान भी बुलाए गए। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच अखिलेश ने साफ कहा कि पीडीए में पी का मतलब पंडित भी है। उन्होंने कहा कि बीजेपी जितना पीड़ा बढ़ाएगी, यह समीकरण उतना ही मजबूत होगा। अयोध्या सदर सीट से पवन पांडेय को टिकट देने का ऐलान भी किया। पवन पांडेय 2012 से यहां चुनाव लड़ रहे हैं, 2017 और 2022 में हारे थे, लेकिन इस बार अखिलेश ने उन्हें जीत का भरोसा दिलाया।
यह कवायद अचानक नहीं हुई। 2022 के विधानसभा चुनाव में सीएसडीएस-लोकनीति के सर्वे के मुताबिक 89 प्रतिशत ब्राह्मणों ने बीजेपी गठबंधन को वोट दिया। सपा को महज छह प्रतिशत समर्थन मिला। 2017 में भी 83 प्रतिशत ब्राह्मण बीजेपी के साथ थे। बीजेपी ने उस साल 68 ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे, जो किसी भी जाति को दिए गए सबसे ज्यादा टिकट थे। सपा ने 40 ब्राह्मण टिकट दिए। 2017 में बीजेपी के 312 विधायकों में 58 ब्राह्मण थे, 2022 में यह संख्या 46 रह गई। 2007 में मायावती ने दलित-ब्राह्मण समीकरण साधा था। सतीश चंद्र मिश्र को आगे करके ब्राह्मण सम्मेलन करवाए और पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। उससे पहले कांग्रेस के दौर में गोविंद बल्लभ पंत, कमलापति त्रिपाठी, हेमवती नंदन बहुगुणा, नारायण दत्त तिवारी जैसे ब्राह्मण मुख्यमंत्री रहे। ब्राह्मण वोट जब कांग्रेस से हट गए तो पार्टी भी सत्ता से बाहर हो गई।अब सपा को लगता है कि बीजेपी के इस कोर वोटबैंक में सेंध लगानी होगी। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा को 33.59 प्रतिशत वोट मिले और 37 सीटें मिलीं। बीजेपी को 41.37 प्रतिशत वोट और 33 सीटें। सपा जानती है कि सिर्फ पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के सहारे 45 प्रतिशत वोट शेयर तक पहुंचना मुश्किल है। अगर ब्राह्मणों का पांच प्रतिशत वोट भी खिसक जाए तो बीजेपी का गणित बिगड़ सकता है। योगी आदित्यनाथ सरकार पर ठाकुरवाद के आरोप लंबे समय से लगते रहे। ब्राह्मण विधायकों ने अलग बैठक की तो पार्टी अध्यक्ष पंकज चौधरी ने चेतावनी दे दी। यूजीसी के इक्विटी नियमों पर बरेली के मजिस्ट्रेट ने इस्तीफा दे दिया, लखनऊ में दस से ज्यादा बीजेपी कार्यकर्ताओं ने पार्टी छोड़ी। शंकराचार्य अवमुक्तेश्वरानंद के साथ हुए विवाद और बटुकों के अपमान की घटनाओं ने नाराजगी बढ़ाई। बीजेपी ने मनोज पांडे को कैबिनेट में जगह देकर नुकसान नियंत्रण की कोशिश की, लेकिन सपा इसे मौका मान रही है।
अखिलेश यादव पिछले कुछ समय से ब्राह्मण चेहरों को आगे बढ़ा रहे हैं। माता प्रसाद पांडेय को नेता प्रतिपक्ष बनाया, हरिशंकर तिवारी को श्रद्धांजलि दी, उनके बेटे विनय शंकर तिवारी पर कार्रवाई का विरोध किया। गोरखपुर के तिवारी हाता का मुद्दा उठाकर योगी सरकार को ब्राह्मण विरोधी बताया। सपा का तर्क है कि कृष्ण-सुदामा की दोस्ती हजारों साल पुरानी है। यादव और ब्राह्मण साथ आ सकते हैं। जनेश्वर मिश्र की विरासत को आगे बढ़ाते हुए पार्टी कह रही है कि उनका मिशन रुकेगा नहीं।बीजेपी के लिए यह चुनौती बड़ी है। 1990 के दशक में राम मंदिर आंदोलन के बाद ब्राह्मण बड़ी संख्या में उसके साथ आए। अटल बिहारी वाजपेयी, मुरली मनोहर जोशी जैसे नेताओं ने पकड़ मजबूत की। 2014 के बाद गैर-यादव ओबीसी, गैर-जाटव दलित और सवर्ण का गठजोड़ बना। ब्राह्मण उसमें महत्वपूर्ण स्तंभ रहे। अब अगर थोड़ी भी दरार पड़ी तो पूर्वांचल और अवध की कई सीटों पर असर दिख सकता है। सपा मानती है कि ब्राह्मण समाज स्विंग वोटर भी रहा है। परिस्थितियां बदलें तो रुख बदल जाता है। बसपा अभी भी 2007 की याद दिला रही है और ब्राह्मण उम्मीदवार उतारने की बात कर रही है। कांग्रेस के लिए भी मौका है, लेकिन उसकी पकड़ कमजोर पड़ चुकी है।यूपी की राजनीति सिर्फ आबादी के आंकड़ों पर नहीं चलती। प्रभाव और फैलाव मायने रखता है। ब्राह्मण समाज न सिर्फ वोट देता है बल्कि राय बनाने की क्षमता भी रखता है। सपा अब पीडीए को और समावेशी बनाने की कोशिश में है। युवाओं के बीच पेपर लीक, बेरोजगारी, संविदा भर्ती जैसे मुद्दे उठाकर सवर्ण युवाओं तक पहुंच बनाने की कवायद है। अखिलेश यादव जानते हैं कि मूल आधार कमजोर किए बिना अगर सवर्णों का एक हिस्सा जुड़ जाए तो 2027 में सत्ता की राह आसान हो सकती है। लखनऊ का यह सम्मेलन उसी दिशा में पहला बड़ा कदम है। अब देखना यह है कि ब्राह्मण समाज इस नई पेशकश को कितना स्वीकार करता है और क्या वाकई यूपी का चुनावी गणित बदलने वाला है।





