ब्रिक्स शिखर सम्मेलन : दिल्ली से दुनिया को भारत का कूटनीतिक संदेश

BRICS Summit: India's diplomatic message to the world from Delhi

गोपेन्द्र नाथ भट्ट

नई दिल्ली में हो रहा 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ऐसे समय में आयोजित हो रहा है, जब विश्व व्यवस्था गहरे भू-राजनीतिक तनाव, व्यापार युद्ध, पश्चिम एशिया और यूक्रेन के संघर्ष तथा बहुपक्षीय संस्थाओं में प्रतिनिधित्व के संकट से गुजर रही है।इसलिए यह सम्मेलन केवल आर्थिक सहयोग का मंच नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक शक्ति-संरचना का महत्वपूर्ण संकेतक बन गया है। भारत की अध्यक्षता में आयोजित यह सम्मेलन ब्रिक्स के 20 वर्ष पूरे होने के अवसर पर हो रहा है और इसकी केंद्रीय भावना ‘मानवता प्रथम’ है।

सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण संदेश भारत की रणनीतिक स्वायत्तता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक ओर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ भारत-रूस संबंधों को ऊर्जा, रक्षा, परमाणु सहयोग और व्यापार के नए आयाम देने पर चर्चा कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की सात वर्ष बाद भारत यात्रा भारत-चीन संबंधों में आई संभावित नरमी का संकेत देती है। मोदी-पुतिन वार्ता में 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य भी सामने आया है।

शी जिनपिंग की दिल्ली यात्रा इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। 2020 के सीमा तनाव के बाद भारत और चीन के रिश्तों में आई तल्खी के बीच दोनों नेताओं की बातचीत केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं होगी; इसका असर एशिया की शक्ति-समीकरण और ब्रिक्स की भावी दिशा पर भी पड़ेगा। चीन ब्रिक्स को पश्चिमी वर्चस्व के विकल्प के रूप में अधिक मुखर बनाना चाहता है, जबकि भारत इसे किसी गुट के विरोध का मंच बनाने के बजाय वैश्विक दक्षिण और विकसित दुनिया के बीच संवाद के सेतु के रूप में देखता है। यही अंतर भारत की भूमिका को विशिष्ट बनाता है।

नई दिल्ली घोषणा-पत्र का सर्वसम्मति से स्वीकार होना भारत की कूटनीतिक सफलता है। पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष के बीच ब्रिक्स ने अधिकतम संयम, संवाद और कूटनीति से विवादों के समाधान की अपील की है। साथ ही एकतरफा शुल्क और गैर-शुल्क व्यापारिक उपायों पर चिंता व्यक्त की गई है। यह संदेश ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब वैश्विक व्यापार बढ़ते संरक्षणवाद से प्रभावित हो रहा है।

भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार और विकासशील देशों के अधिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया है। प्रधानमंत्री मोदी का आग्रह है कि वैश्विक संस्थाओं में आज की वास्तविकताओं के अनुरूप प्रतिनिधित्व और निर्णय प्रक्रिया में बदलाव होना चाहिए।

ब्रिक्स का विस्तार उसकी ताकत भी है और चुनौती भी। रूस, चीन, ईरान जैसे देशों के साथ भारत के संबंधों की प्रकृति अलग है, जबकि अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ भारत की आर्थिक एवं रणनीतिक साझेदारी भी लगातार मजबूत हो रही है। ऐसे में भारत का उद्देश्य किसी एक ध्रुव का हिस्सा बनना नहीं, बल्कि सभी प्रमुख शक्तियों के साथ अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप संतुलित संबंध कायम रखना है।

यही नई दिल्ली सम्मेलन का सबसे बड़ा संदेश है भारत अब बदलती विश्व व्यवस्था का दर्शक नहीं, बल्कि उसके स्वरूप को प्रभावित करने वाली शक्ति है। यदि ब्रिक्स घोषणाओं से आगे बढ़कर व्यापार, तकनीक, ऊर्जा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और वैश्विक शासन सुधार में ठोस परिणाम देता है, तो दिल्ली सम्मेलन बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की दिशा में एक निर्णायक पड़ाव सिद्ध हो सकता है।