योगेश कुमार गोयल
मदर टेरेसा का नाम सुनते ही मानवता, करुणा और सेवा का पवित्र स्वरूप आंखों के सामने उभर आता है। उनका जीवन इस तथ्य का सबसे बड़ा प्रमाण है कि निस्वार्थ भाव से दूसरों के दुःख को दूर करने का संकल्प ही मनुष्य को वास्तविक अर्थों में महान बनाता है। 26 अगस्त 1910 को अल्बानिया के स्कोप्जे में एगनेस गोंझा बोयाज्यू के रूप में जन्मी इस नन्हीं बालिका ने बचपन से ही धर्म और सेवा के प्रति गहरी आस्था प्रकट की थी। जब वे केवल 12 वर्ष की थी, तभी उनके भीतर यह संकल्प जाग उठा था कि उनका जीवन केवल दूसरों की भलाई के लिए समर्पित होगा। यही संकल्प आगे चलकर उन्हें पूरी मानवता के लिए करुणा की मूर्ति बना गया।
18 वर्ष की आयु में उन्होंने ‘सिस्टर्स ऑफ लोरेटो’ से जुड़कर धार्मिक जीवन की ओर कदम बढ़ाए और 1929 में भारत आईं। कलकत्ता स्थित सेंट मैरी स्कूल में उन्होंने अध्यापिका के रूप में कार्य करना शुरू किया। अध्यापन कार्य के दौरान वे छात्रों को केवल पढ़ाई ही नहीं, अनुशासन और नैतिक मूल्यों का भी पाठ पढ़ाती थी किंतु धीरे-धीरे उनका मन स्कूल की चारदीवारी से बाहर रहने वाले निर्धन, रोगग्रस्त और बेसहारा लोगों की ओर अधिक खिंचने लगा। 1946 में दार्जिलिंग की यात्रा के दौरान उन्हें अपने जीवन का वास्तविक ध्येय मिला। उन्होंने महसूस किया कि उन्हें शिक्षण कार्य से ऊपर उठकर गरीबों और असहायों की सीधी सेवा करनी चाहिए। यह क्षण उनके जीवन की दिशा बदल देने वाला साबित हुआ।
कलकत्ता की झुग्गियों और गलियों में रहने वाले लोगों की असहनीय पीड़ा को देखकर उन्होंने 1950 में ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ की स्थापना की। इस संस्था का मुख्य उद्देश्य था सबसे गरीब, सबसे लाचार और सबसे उपेक्षित लोगों की निःस्वार्थ सेवा करना। संस्था का ध्येय वाक्य ही था, ‘सबसे गरीबों में भी सबसे गरीब की सेवा।’ मदर टेरेसा ने सेवा की परिभाषा केवल भोजन और दवा देने तक सीमित नहीं रखी बल्कि उनके लिए सेवा का अर्थ था पीड़ित व्यक्ति को यह अनुभव कराना कि वह अकेला नहीं है, उसे प्यार और सम्मान मिला हुआ है। यही कारण था कि वे सदैव कहा करती थी, ‘हम बड़े-बड़े कार्य नहीं कर सकते लेकिन हम छोटे-छोटे कार्य बड़े प्रेम से कर सकते हैं।’
उनके आश्रमों में केवल भोजन या उपचार की सुविधा ही नहीं दी जाती थी बल्कि वहां पीड़ित व्यक्तियों को जीवन की गरिमा और आत्मसम्मान भी लौटाया जाता था। उन्होंने कुष्ठ रोगियों को समाज में सम्मान दिलाने के लिए आश्रम बनाए, अनाथ और परित्यक्त बच्चों के लिए घर खोले और मृत्युशैया पर पड़े लोगों को अंतिम क्षणों में भी प्रेम और स्नेह का अहसास कराया। उनकी संस्था धीरे-धीरे भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में फैल गई, जिसके सैंकड़ों केंद्र आज विभिन्न देशों में मानव सेवा का कार्य कर रहे हैं। मदर टेरेसा की असाधारण सेवाओं को देखते हुए उन्हें अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। 1962 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया और 1980 में ‘भारत रत्न’ प्रदान कर सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया। विश्व स्तर पर उन्हें 1979 में नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया। इसके अतिरिक्त अनेक देशों ने उन्हें अपने सर्वोच्च सम्मानों से विभूषित किया किंतु इन सब पुरस्कारों और मान-सम्मानों के बीच भी वे सदैव विनम्र बनी रही और स्वयं को केवल ईश्वर का साधन मानती रही।
उनके जीवन और कार्यों की इतनी ऊंचाई होने के बावजूद वे आलोचनाओं से अछूती नहीं रही। कई बार उन पर धर्मांतरण के आरोप लगाए गए तो कई बार उनके आश्रमों में आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं की कमी की बात उठाई गई किंतु यह निर्विवाद सत्य है कि मदर टेरेसा ने लाखों असहायों को आशा, सहारा और जीवन का सम्मान प्रदान किया। उनके कार्यों का व्यापक प्रभाव इसी से समझा जा सकता है कि वे समाज की उस परत तक पहुंची, जिसे प्रायः शासन और व्यवस्था भी अनदेखा कर देती थी। 5 सितंबर 1997 को 87 वर्ष की आयु में जब उनका निधन हुआ, तब समूचे विश्व ने उन्हें खोने का दुःख अनुभव किया। उनके अंतिम संस्कार में दुनिया के अनेक देशों के नेता उपस्थित हुए और भारत ने उन्हें राजकीय सम्मान के साथ विदाई दी। उनकी मृत्यु के बाद भी उनकी संस्था ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ उसी निष्ठा से मानवता की सेवा में कार्यरत है। 2016 में पोप फ्रांसिस ने उन्हें संत की उपाधि प्रदान की, जिससे उनका जीवन एक वैश्विक आध्यात्मिक प्रेरणा का प्रतीक बन गया।
मदर टेरेसा का जीवन इस तथ्य को रेखांकित करता है कि वास्तविक महानता किसी पद, संपत्ति या शक्ति में नहीं बल्कि निस्वार्थ सेवा और करुणा में निहित है। उन्होंने यह साबित किया कि जब तक हम दूसरों के दुःख को अपना नहीं मानते, तब तक जीवन का सही अर्थ अधूरा रहता है। आज जब दुनिया हिंसा, असमानता और स्वार्थ की चपेट में है, तब मदर टेरेसा का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठता है। उन्होंने सिखाया कि प्रेम और करुणा ही वह शक्ति है, जो मानवता को जोड़ सकती है। उन्होंने धर्म, जाति और भाषा की सीमाओं से परे जाकर यह बताया कि इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है। यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है, जिसे आगे बढ़ाना हर व्यक्ति का कर्त्तव्य है। मदर टेरेसा की जयंती का अवसर केवल स्मरण का नहीं बल्कि आत्ममंथन का अवसर है, जो हमें यह सोचने पर विवश करता है कि हम अपने जीवन में कितना समय और कितनी संवेदनशीलता समाज के जरूरतमंदों के लिए समर्पित करते हैं। यदि हर व्यक्ति अपने आसपास के जरूरतमंदों के लिए थोड़ा-सा भी प्रयास करे तो समाज में फैली असमानता और पीड़ा काफी हद तक कम हो सकती है। मदर टेरेसा का जीवन हमें यही सिखाता है कि सच्चा धर्म केवल मानव सेवा है और सच्ची पूजा केवल करुणा है।





