चुनावी आहट के बीच राहुल की फिर से लॉन्चिंग

Rahul relaunched amidst the buzz of elections

अजय कुमार

15 अगस्त को अधूरा वंदे मातरम गाकर फजीहत झेलने वाला गांधी परिवार और कांग्रेस के दिग्गज नेता अब अपने और खासकर राहुल गांधी के वंदेमातरम के अपमान का बचाव करने के लिये तरह-तरह के स्वांग रचा रहे हैं। अधूरा वंदे मातरम गायन की फजीहत पर पर्दा डालने के लिये सबसे पहले राहुल गांधी संसद मार्ग पहुंच कर धरने पर बैठ गये। वह वहां पैलेट गन से घायल एक युवक की रिपोर्ट लिखाने गये थे, जिसकी जांच पहले ही सुप्रीम कोर्ट के आदेश से चल रही है। अभी तक तो यह भी पता नहीं चला है कि जंतर मंतर पर पैलेट गन चली भी थी या नहीं। पैलेट गन चलने का न कोई वीडियो सामने आया है न ही कोई गवाह। राहुल ने संसद मार्ग थाने पर लगभग चार-पांच घंटे तक धरना प्रदर्शन किया, मजबूरन पुलिस को अज्ञात के खिलाफ रिपोर्ट लिखना पड़ गई। क्योंकि पुलिस ज्यादा बखेड़ा खड़ा नहीं करना चाहती थी।

यह सिलसिला थमा ही था कि राहुल गांधी पुणे पहुंच गये जहां उनके लिये ‘छात्रों की गूंज’ नाम से इवेंट रखा गया था। नाम तो छात्रों का था लेकिन यहां मोदी को गाली देने वाली एक कथित लोकगायिका मंच पर झंडा लहराते हुए मोदी को कोस रही थी। कोई लड़की राहुल को किस कर रही थी। राहुल ने यहां ऐसा कुछ नहीं कहा जिसे छात्रों की गूंज कहा जा सके। बल्कि वह वहां एक बुर्का और हिजाब पहने एक लड़की के सामने मनुस्मृति पर ज्ञान देने लगे कि मनुस्मृति में महिलाओं के लिये कितना उलटा सीधा बोला गया है, उन्हें आजादी नहीं दी गई है, जबकि वहां बुर्के और हिजाब में खड़ी लड़की के लिये एक शब्द नहीं निकला। वह न इस्लाम की कुरीतियों के बारे में कुछ बोल पाये न ही बाइबिल में महिलाओं के बारे में क्या कहा गया है इस पर उनका मुंह खुला।सबसे बड़ी बात यह थी कि राहुल की रिलॉन्चिंग करते समय भीड़ का इम्पैक्ट दिखाने के लिये इवेंट मैनेजरों ने फुटबॉल वर्ल्ड कप के दौरान का एक वीडियो को राहुल के कार्यक्रम में जुटी भीड़ बताकर प्रमोट कर दिया गया। वैसे ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। राहुल गांधी को आगे बढ़ाने और मोदी के समकक्ष दिखाने के लिये अक्सर कांग्रेसी ऐसे पराक्रम करते रहते हैं।

कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी जिस तरह के पराक्रम कर रहे हैं उससे लगता है कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती राजनीतिक विश्वसनीयता और वैचारिक शुचिता का संकट बन चुकी है, खासकर राष्ट्रीय पर्वों और प्रतीकों के प्रति उनकी कथित उदासीनता के बाद जिस प्रकार के राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिल रहे हैं। जब स्वतंत्रता दिवस जैसे पावन अवसर पर राष्ट्रीय गान या राष्ट्रगीत के गायन में त्रुटियां सामने आती हैं और उसकी तीखी आलोचना शुरू होती है, तो उससे ध्यान भटकाने के लिए पार्टी द्वारा एक के बाद एक ऐसे राजनीतिक ड्रामे रचे जाते हैं जो जमीनी हकीकत से कोसों दूर और केवल मीडिया की सुर्खियों में बने रहने की रणनीति का हिस्सा प्रतीत होते हैं। संसद मार्ग थाने पर राहुल गांधी का लंबा धरना और उस मामले में पुलिस पर दबाव बनाकर रिपोर्ट दर्ज कराना, जिसकी विधिवत जांच पहले ही सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के तहत चल रही हो, केवल प्रशासनिक व्यवस्था को असहज करने और एक कृत्रिम नैरेटिव गढ़ने का प्रयास ही कहा जा सकता है। इस तरह के आयोजनों से यह साफ झलकता है कि कांग्रेस नेतृत्व गंभीर मुद्दों पर वैचारिक स्पष्टता रखने के बजाय तात्कालिक लाभ और सिम्पथी गेन करने की राजनीति में उलझ गया है, जिसके कारण जनता के बीच उनकी छवि एक जिम्मेदार राष्ट्रीय विकल्प के रूप में उभरने के बजाय केवल विरोध की राजनीति करने वाले दल के रूप में सिमट कर रह गई है।

इसी कड़ी में पुणे का वह तथाकथित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम भी कांग्रेस की दिशाहीन कार्यशैली और इवेंट मैनेजमेंट की राजनीति का एक जीवंत उदाहरण बन गया, जहां छात्रों के मुद्दों पर बात करने के बजाय मंच का इस्तेमाल राजनीतिक एजेंडे और लक्षित बयानों के लिए किया गया। एक तरफ जहां आयोजनों की भव्यता और भीड़ का झूठा प्रभाव दिखाने के लिए पुरानी या विदेशी फुटेज का सहारा लिया जाता है, वहीं दूसरी तरफ भाषणों और वैचारिक बहसों में भी एकतरफा रुख अपनाया जाता है, जिससे आम जनता के बीच नेतृत्व की परिपक्वता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। यह विडंबना ही है कि जब राहुल गांधी जैसे नेता देश के पारंपरिक ग्रंथों और सामाजिक व्यवस्थाओं पर मुखर होकर व्याख्या करते हैं, तब वे समाज के एक वर्ग विशेष से जुड़ी कुरीतियों या संवेदनशील धार्मिक पहलुओं पर चुप्पी साध लेते हैं, जिससे उनकी कथनी और करनी में दोहराव का संदेश जाता है। इस तरह की चयनात्मक मुखरता और वैचारिक विरोधाभास के कारण ही पार्टी का केंद्रीय संदेश आम जनमानस तक सकारात्मक रूप में नहीं पहुंच पाता है, और पार्टी के रणनीतिकार हर बार सुधार के दावे करने के बावजूद उन्हीं पुरानी रणनीतियों पर लौट आते हैं जो बार-बार विफल साबित हो चुकी हैं।

2004 से लेकर आज तक राहुल गांधी का राजनीतिक सफर क्यों अधिकांश मोर्चों पर संघर्षरत और चुनावी लिहाज से कमजोर रहा है, तो इसके पीछे कई आंतरिक और बाह्य कारण स्पष्ट रूप से नजर आते हैं। सबसे बड़ा कारण उनकी राजनीतिक निरंतरता और पूर्णकालिक समर्पण का अभाव रहा है, जिसे अक्सर राजनीतिक विश्लेषक एक अनिच्छुक नेता की छवि के रूप में देखते हैं। इसके विपरीत, उनके मुख्य राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी ने लगातार धरातल पर मजबूत वैचारिक पकड़, कैडर-आधारित संगठन और जमीनी स्तर पर जनसंपर्क का ऐसा चक्रव्यूह तैयार किया, जिसके सामने कांग्रेस का हाइब्रिड और वंशवादी मॉडल टिक नहीं सका। वर्ष 2004 में जब कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की थी, तब पार्टी के पास एक सामूहिक नेतृत्व और मजबूत क्षेत्रीय क्षत्रपों की एक लंबी फौज थी, लेकिन धीरे-धीरे पार्टी हाईकमान ने आंतरिक लोकतंत्र को कमजोर करते हुए सारे निर्णय परिवार केंद्रित कर दिए, जिससे राज्यों में मजबूत नेतृत्व उभरने की गुंजाइश खत्म होती चली गई। जब भी चुनाव आते हैं, राहुल गांधी आक्रामक तेवर तो दिखाते हैं, लेकिन उनका वह तेवर किसी दीर्घकालिक वैचारिक और संगठनात्मक ढांचे में ढलने के बजाय मौसमी और तुरंत लाभ उठाने वाला साबित होता है।

संगठन के स्तर पर दीमक की तरह लगी गुटबाजी और जमीनी कार्यकर्ताओं से कटाव ने कांग्रेस की जड़ों को खोखला कर दिया है। चुनावों के समय केवल शीर्ष स्तर पर रैलियां कर देने या सोशल मीडिया पर बड़े इवेंट आयोजित कर लेने से चुनावी वैतरणी पार नहीं की जा सकती, क्योंकि इसके लिए बूथ स्तर पर मजबूत संगठन और जनता के साथ अटूट विश्वास की जरूरत होती है जो कांग्रेस के पास पिछले दो दशकों से नदारद है। इसके अलावा, जनता से जुड़े जमीनी मुद्दों को उठाने में निरंतरता का अभाव और हर बात पर केवल केंद्र सरकार के विरोध को ही अपनी एकमात्र राजनीति मान लेना भी कांग्रेस के पतन का एक बड़ा कारण रहा है। जब-जब पार्टी को आत्ममंथन करने और अपनी वैचारिक दिशा तय करने का अवसर मिला, तब-तब नेतृत्व ने जमीनी हकीकत को स्वीकार करने के बजाय इवेंट मैनेजमेंट और पीआर एजेंसियों के सहारे अपनी छवि चमकाने का शॉर्टकट चुना।