मुट्ठी भर चना, सेहत का खजाना

A handful of chickpeas—a treasure trove of health

जब भारतीय थाली का यह साधारण दाना बन जाता है असाधारण ‘सुपरफूड’

सत्य भूषण शर्मा

“भोजन ही सबसे बड़ी औषधि है।” भारतीय आयुर्वेद का यह सिद्धांत आज आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनेक शोधों में भी प्रतिध्वनित होता दिखाई देता है। विडंबना यह है कि जिस समय दुनिया महंगे सुपरफूड्स, विदेशी अनाजों और पोषण सप्लीमेंट्स की ओर तेजी से आकर्षित हो रही है, उसी समय भारतीय रसोई में सदियों से मौजूद अनेक पारंपरिक खाद्य पदार्थ उपेक्षा के शिकार हो रहे हैं। इन्हीं में एक है—काला देशी चना। देखने में साधारण, किंतु गुणों में असाधारण यह दाना आज भी करोड़ों भारतीयों के लिए सस्ता, सुलभ और संपूर्ण पोषण का विश्वसनीय आधार बना हुआ है।

आज भारत एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ एक ओर कुपोषण और एनीमिया जैसी समस्याएँ मौजूद हैं, तो दूसरी ओर मधुमेह, मोटापा, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग जैसी जीवनशैली-जनित बीमारियाँ तेजी से बढ़ रही हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ बार-बार संतुलित आहार, प्राकृतिक खाद्य पदार्थों और साबुत अनाजों की ओर लौटने की सलाह दे रहे हैं। ऐसे समय में काला देशी चना केवल एक खाद्य पदार्थ नहीं, बल्कि स्वस्थ भारत की दिशा में एक व्यावहारिक समाधान बनकर उभरता है।

परंपरा से विज्ञान तक का सफर :
भारतीय कृषि संस्कृति में काले चने का इतिहास हजारों वर्षों पुराना है। गाँवों में आज भी किसान सुबह भीगे चने और गुड़ के साथ दिन की शुरुआत करते हैं। अखाड़ों में पहलवानों का प्रिय आहार भी यही रहा है। हमारे बुजुर्ग बिना किसी प्रयोगशाला के अनुभव से जानते थे कि यह छोटा-सा दाना शरीर को शक्ति, सहनशक्ति और रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करता है। आज आधुनिक पोषण विज्ञान भी इसी सत्य की पुष्टि कर रहा है।

काले देशी चने में प्रोटीन, जटिल कार्बोहाइड्रेट, आहार रेशा (फाइबर), आयरन, फोलेट, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस, पोटैशियम, जिंक तथा अनेक सूक्ष्म पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त इसमें प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट भी होते हैं, जो शरीर की कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव तनाव से बचाने में सहायक माने जाते हैं।

मधुमेह के बढ़ते खतरे के बीच आशा की किरण :
विश्व भर में मधुमेह के रोगियों की संख्या लगातार बढ़ रही है और भारत भी इससे अछूता नहीं है। काले देशी चने का कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स इसे विशेष बनाता है। इसके सेवन से रक्त में ग्लूकोज धीरे-धीरे बढ़ता है, जिससे भोजन के बाद अचानक शर्करा बढ़ने की संभावना कम हो सकती है। संतुलित मात्रा में तथा चिकित्सकीय सलाह के अनुसार इसका सेवन मधुमेह प्रबंधन में उपयोगी आहार का हिस्सा बन सकता है।

एनीमिया से लड़ने का सुलभ उपाय :
देश में बड़ी संख्या में महिलाएँ, किशोरियाँ और बच्चे खून की कमी से जूझ रहे हैं। आयरन और फोलेट से भरपूर काला चना हीमोग्लोबिन निर्माण में सहायक पोषक तत्व प्रदान करता है। यदि इसे नींबू, आंवला या अन्य विटामिन-सी युक्त खाद्य पदार्थों के साथ लिया जाए तो आयरन का अवशोषण बेहतर हो सकता है।

वजन घटाने का प्राकृतिक साथी :
वजन कम करने की चाह रखने वाले लोग अक्सर भोजन कम कर देते हैं, जिससे शरीर में कमजोरी आने लगती है। काला चना इस समस्या का संतुलित समाधान प्रस्तुत करता है। इसमें उपस्थित प्रोटीन और फाइबर लंबे समय तक तृप्ति का अनुभव कराते हैं। इससे बार-बार भूख लगने की प्रवृत्ति कम होती है और अस्वास्थ्यकर स्नैकिंग पर नियंत्रण पाया जा सकता है।

पाचन, हृदय और हड्डियों का मित्र :
फाइबर से भरपूर होने के कारण यह आँतों की कार्यप्रणाली को बेहतर बनाने में सहायता करता है। घुलनशील रेशा कोलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित रखने में सहायक माना जाता है। वहीं कैल्शियम, फॉस्फोरस और मैग्नीशियम हड्डियों की मजबूती में योगदान देते हैं। जिंक और एंटीऑक्सीडेंट त्वचा तथा बालों के स्वास्थ्य के लिए भी उपयोगी माने जाते हैं।

अंकुरित चना—पोषण का अगला चरण :
जब काले चने को अंकुरित किया जाता है तो उसमें कुछ विटामिनों और जैव-सक्रिय तत्वों की उपलब्धता बढ़ जाती है। यही कारण है कि अंकुरित चने को पौष्टिक नाश्ते का उत्कृष्ट विकल्प माना जाता है। सलाद, चाट अथवा सूप के रूप में इसका सेवन स्वास्थ्यवर्धक और स्वादिष्ट दोनों होता है।

भारतीय रसोई की अनमोल विरासत :
भीगे चने, भुने चने, उबले चने, चने की दाल, बेसन और सत्तू—एक ही अनाज के इतने विविध रूप शायद ही किसी अन्य खाद्य पदार्थ में मिलते हों। गर्मियों में सत्तू का शर्बत शरीर को ऊर्जा और शीतलता देता है, जबकि भुने चने यात्रा के दौरान भी पौष्टिक नाश्ते का उत्कृष्ट विकल्प हैं।

सावधानी भी उतनी ही आवश्यक
यद्यपि काला देशी चना अत्यंत पौष्टिक है, फिर भी प्रत्येक व्यक्ति की शारीरिक आवश्यकताएँ अलग होती हैं। अधिक मात्रा में सेवन करने से कुछ लोगों को गैस या पेट फूलने जैसी समस्या हो सकती है। गुर्दे, पाचन तंत्र अथवा अन्य विशेष रोगों से पीड़ित व्यक्तियों को चिकित्सकीय सलाह लेकर ही नियमित सेवन करना चाहिए। संतुलित आहार और सक्रिय जीवनशैली के साथ इसका सेवन अधिक लाभकारी होता है।

समय की पुकार—अपनी थाली की ओर लौटें :
आज जब बाजार हमें स्वास्थ्य के नाम पर महंगे उत्पाद बेच रहा है, तब आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी परंपराओं की ओर विश्वास के साथ लौटें। काला देशी चना हमें यह सिखाता है कि स्वास्थ्य केवल महंगे भोजन का परिणाम नहीं, बल्कि सही चयन और संतुलित जीवनशैली का प्रतिफल है।

यदि प्रत्येक परिवार सप्ताह में कुछ दिन भी काले देशी चने को अपने भोजन का नियमित हिस्सा बना ले, तो न केवल पोषण स्तर बेहतर होगा बल्कि भविष्य में अनेक जीवनशैली-जनित बीमारियों के जोखिम को भी कम किया जा सकता है। स्वस्थ भारत का सपना तभी साकार होगा जब हमारी थाली स्थानीय, मौसमी, संतुलित और पारंपरिक खाद्य पदार्थों से समृद्ध होगी।

एक मुट्ठी काला देशी चना केवल पेट नहीं भरता, वह शरीर को शक्ति, मन को संतुलन और समाज को स्वस्थ भविष्य की दिशा भी देता है।