यूपी में धनराज नाथवानी से क्या अखिलेश एक तीर दो निशाना साध रहे हैं ?

Is Akhilesh killing two birds with one stone regarding Dhanraj Nathwani in UP?

सौरभ वार्ष्णेय

समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए धनराज परिमल नाथवानी को उम्मीदवार बनाकर पूरे देश में एक नई राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है। सपा पार्टी ने वरिष्ठ नेता रामगोपाल यादव के साथ नाथवानी का नाम घोषित किया। रामगोपाल यादव सपा के पुराने और स्थापित राजनीतिक चेहरे हैं, जबकि धनराज नाथवानी की पहचान मुख्यत व्यावसायिक घराने से जुड़ी रही है। यही अंतर इस फैसले को अलग बनाता है। वहीं राजनीतिक इसे योगी के लिए भी कुछ संकेत बता रहे हैं।

ज्ञात रहे कि धनराज नाथवानी रिलायंस इंडस्ट्रीज से जुड़े हैं और गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष भी हैं। उनका सार्वजनिक जीवन पारंपरिक समाजवादी राजनीति से अलग रहा है। इससे भी अधिक दिलचस्प तथ्य यह है कि उनके पिता परिमल नाथवानी स्वयं राज्यसभा के सदस्य हैं और जून 2026 में झारखंड से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के समर्थन वाले निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में फिर राज्यसभा पहुंचे हैं। पिता एक खेमे के समर्थन से राज्यसभा में हों और पुत्र सपा के उम्मीदवार बनें, तो सवाल उठना लाजिमी है ?

सवाल है कि क्या अखिलेश यादव का यह फैसला केवल राजनीतिक रणनीति है या इसके पीछे सत्ता के विभिन्न केंद्रों के बीच कोई संवाद भी है? क्या इसे केंद्र सरकार से समझौते का संकेत माना जाए? उपलब्ध सार्वजनिक सूचनाओं के आधार पर ऐसी किसी गुप्त राजनीतिक डील का प्रमाण सामने नहीं आया है। इसलिए इसे समझौते का परिणाम बताना अभी अटकल होगी। लेकिन राजनीति में प्रतीक महत्वपूर्ण होते हैं और नाथवानी की उम्मीदवारी ऐसा ही प्रतीक बन गई है।

नाथवानी परिवार की पृष्ठभूमि इस चर्चा को महत्वपूर्ण बनाती है। परिमल नाथवानी लंबे समय से रिलायंस समूह से जुड़े रहे हैं और अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियों में राज्यसभा तक पहुंचे हैं। वर्तमान में उनका रास में प्रवेश राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के समर्थन से हुआ। दूसरी ओर उनके पुत्र को अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए चुना है। यह घटनाक्रम बताता है कि राजनीतिक संबंध हमेशा पारिवारिक या कारोबारी संबंधों के साथ नहीं चलते। ऐसे उदाहरण पहले भी रहे हैं, लेकिन वर्तमान परिस्थितियां इसे महत्व देती हैं।

यहीं से योगी आदित्यनाथ और भारतीय जनता पार्टी के लिए इस फैसले के संभावित राजनीतिक संकेत को समझने की कोशिश की जा सकती है। इसे समझौते का प्रमाण मानना उचित नहीं, लेकिन यह जरूर देखा जा सकता है कि समाजवादी पार्टी अपनी पहुंच को पारंपरिक सामाजिक आधार से आगे बढ़ाना चाहती है। उद्योग, निवेश, रोजगार, कारोबारी जगत और राष्ट्रीय स्तर के प्रभावशाली समूहों से संवाद बढ़ाना किसी भी दल की रणनीति का हिस्सा हो सकता है। यदि सपा आर्थिक विकास को सामाजिक न्याय की राजनीति से जोड़ती है, तो नाथवानी की उम्मीदवारी उस दिशा का संकेत हो सकती है।

यहां अखिलेश की तुलना उनके पिता स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव से करना स्वाभाविक है। मुलायम सिंह यादव वैचारिक पहचान बनाए रखते हुए अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक समूहों से संवाद करते थे। उन्होंने परंपरागत समर्थक वर्ग से आगे व्यापक राजनीतिक समीकरण बनाने की कोशिश की। विभिन्न सामाजिक समूहों और दलों से संवाद उनकी राजनीति की पहचान रहा। सवाल यह है कि क्या अखिलेश भी उसी व्यावहारिक शैली की ओर लौट रहे हैं? अखिलेश की राजनीति में पिछले वर्षों में पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी पीडीए सामाजिक समीकरण प्रमुख रहा है। ऐसे में रिलायंस से जुड़े को राज्यसभा भेजना अलग संदेश देता है। विपक्षी दलों ने इसी अंतर को मुद्दा बनाया है। बसपा प्रमुख मायावती ने नाथवानी और रामगोपाल यादव के चयन को सपा के पीडीए दावे से जोड़कर सवाल उठाए। सपा का तर्क है कि समाजवाद का उद्देश्य रोजगार, विकास और समृद्धि है तथा इसके लिए उद्योग और निवेश आवश्यक हैं।

यही बहस नाथवानी की उम्मीदवारी का वास्तविक राजनीतिक अर्थ हो सकती है। क्या सपा सामाजिक न्याय के साथ आर्थिक विकास और निवेश को भी केंद्रीय संदेश बनाएगी? उद्योग जगत से संवाद बढ़ाने का अर्थ यह जरूरी नहीं कि सपा अपनी वैचारिक पहचान छोड़ रही है। यह सामाजिक न्याय और आर्थिक विकास को साथ रखने का प्रयास भी हो सकता है।

इस फैसले का दूसरा पहलू 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से जुड़ा है। राज्यसभा चुनाव दलों की संगठनात्मक ताकत, विधायकों की निष्ठा और संभावित गठजोड़ का परीक्षण भी बनते हैं। उत्तर प्रदेश की दस सीटों के चुनाव में सपा के सामने सीमित सुनिश्चित सीटें हैं, जबकि दसवीं सीट को लेकर पार्टी-विरोधी मतदान की चर्चा है। ऐसे माहौल में नाथवानी का चयन व्यापक राजनीतिक संदेश भी हो सकता है।

योगी के लिए संकेत इसी संदर्भ में समझना होगा। यदि सपा उद्योग और निवेश के मुद्दे पर भाजपा की भाषा को चुनौती देने लगे, तो उत्तर प्रदेश की राजनीति में विकास की प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। भाजपा को विपक्ष के सामाजिक आधार के साथ उसके आर्थिक विस्तार पर ध्यान देना पड़ेगा। यदि यह रणनीति आगे बढ़ती है तो 2027 में निवेश, रोजगार, उद्योग और विकास विपक्ष के विमर्श में अधिक प्रमुख हो सकते हैं। हालांकि यह अभी संभावना है, तथ्य नहीं। यह कहना भी जल्दबाजी होगी कि अखिलेश केंद्र सरकार के साथ किसी गुप्त समझौते की राह पर हैं।

पारिवारिक संबंध, कारोबारी संपर्क या अलग-अलग दलों का समर्थन अपने आप में समझौते का प्रमाण नहीं होते। किसी निष्कर्ष के लिए प्रत्यक्ष दस्तावेज या विश्वसनीय प्रमाण आवश्यक होंगे। फिलहाल ऐसा प्रमाण उपलब्ध नहीं है। फिर भी नाथवानी की उम्मीदवारी को नजरअंदाज करना कठिन है। यह बदलती राजनीति की ओर इशारा करती है जिसमें दल नए सामाजिक और आर्थिक समूहों तक पहुंच बनाते हैं। अखिलेश के सामने चुनौती इस विस्तार को अपनी मूल पहचान से जोडऩे की होगी। इसलिए धनराज नाथवानी की उम्मीदवारी को न तो केवल केंद्र से किसी गुप्त डील का परिणाम मानना चाहिए और न ही इसे साधारण टिकट वितरण समझकर छोड़ देना चाहिए। यह अखिलेश यादव की राजनीति में संभावित विस्तार का संकेत है। मुलायम की तरह व्यापक संवाद की दिशा में यह कदम है या नहीं, समय बताएगा। लेकिन सपा सामाजिक न्याय के साथ आर्थिक विकास, उद्योग और राष्ट्रीय संपर्कों की भाषा को भी अपने राजनीतिक प्रयोग में शामिल कर रही है। यही बदलाव 2027 की राजनीति में इस फैसले को महत्वपूर्ण बना सकता है।