एन जी भट्ट
भारत के सबसे बड़े भौगोलिक प्रदेश राजस्थान में हुए शहरों की सरकारों के चुनाव में सोमवार को निकाय प्रमुखों के परिणामों ने प्रदेश की शहरी राजनीति की एक नई तस्वीर सामने रख दी है। प्रदेश के 10 नगर निगमों, 51 नगर परिषदों और 248 नगरपालिकाओ में यानी 309 नगरीय निकायों के कुल 10,245 वार्डो में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी भाजपा ने निकाय प्रमुखों के चुनाव में भी अपनी संगठनात्मक ताकत और राजनीतिक प्रबंधन का कौशल दिखाते हुए अधिकांश निकायों में सत्ता हासिल कर ली है।
राज्य में 301 घोषित निकाय परिणामों में 273 शहरों की नई शहरी सरकारों में राज्य की सत्ताधारी पार्टी भाजपा के 198 अध्यक्ष निर्वाचित घोषित हुए है, जबकि प्रतिपक्ष दल कांग्रेस केवल 94 निकायों तक ही सीमित रही है । यहां तक कांग्रेस अपनी कई बढ़त वाली निकायों में भी चुनाव हार गई। अजमेर इसका प्रमुख उदाहरण रहा। यहां कांग्रेस 37 वार्ड जीतकर सबसे बड़ी पार्टी थी, जबकि भाजपा के 32 पार्षद थे। फिर भी भाजपा ने बेहतर प्रबन्धन और निर्दलीयों के समर्थन से 43 मत प्राप्त कर महापौर पद हासिल कर लिया है। इसी तरह अलवर और पाली में भी बहुमत के अभाव में फ्लोर मैनेजमेंट और पार्षदों के समर्थन से अंतिम परिणाम बदल गए और भाजपा निकाय प्रमुख का चुनाव जीत गई है।
राजस्थान के निकाय चुनावों में दूसरी महत्वपूर्ण बात यह देखी गई है कि वार्ड चुनाव और निकाय प्रमुख के चुनाव के बीच कई जगह राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल गए। प्रदेश में भाजपा ने 4,179 वार्ड जीते और कांग्रेस 3,613 वार्डों में सफल रही, जबकि निर्दलीयों ने 2,273 वार्ड जीत कर तीसरी बड़ी ताकत के रूप में अपनी पहचान कायम की। इन परिणामों में निर्दलीय पार्षदों की भूमिका सबसे अहम राजनीतिक संकेत के रूप में सामने आई है। 2,273 वार्डों में निर्दलीयों की जीत बताती है कि स्थानीय निकायों में उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़, स्थानीय मुद्दे और वार्ड स्तर के समीकरण अभी भी पार्टी के चुनाव चिह्न से कम महत्वपूर्ण नहीं हुए हैं। जहां भाजपा या कांग्रेस बहुमत से दूर रही, वहां इन्हीं पार्षदों ने सत्ता की चाबी संभाली। इसी बीच आम आदमी पार्टी ने भी बारां नगर परिषद में सभापति पद जीतकर राजस्थान में अपना खाता खोला। इधर माकपा ने नोखा नगरपालिका और आरएलपी ने मुंडवा नगरपालिका में अध्यक्ष पद हासिल किए। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि ये परिणाम भले ही संख्या में छोटे दिखते हो, लेकिन प्रदेश की शहरी राजनीति में तीसरे विकल्पों के लिए संभावनाओं का संकेत जरूर देते है। इस तरह राजस्थान में निकाय चुनाव का मौजूदा परिदृश्य भाजपा के पक्ष में स्पष्ट बढ़त दिखाता है, लेकिन बीकानेर में कांग्रेस जीत, राज्य में निर्दलीयों का प्रभाव और आप समेत छोटे दलों की मौजूदगी यह संदेश भी देती है कि राजस्थान के शहरों की राजनीति में मुकाबला अभी पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है,बल्कि अब असली चुनौती इन नई शहरी सरकारों के प्रदर्शन और जन अपेक्षाओं पर खरी उतरने की होगी।
हालांकि नगर निकायों के यह परिणाम राज्य में भाजपा की व्यापक बढ़त को दर्शाता है, लेकिन राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि इसे भाजपा की पूर्ण एक तरफा राजनीतिक जीत मानना जल्दबाजी होगी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण बीकानेर नगर निगम है, जहां कांग्रेस ने 80 में से 42 वार्ड जीत कर स्पष्ट बहुमत बनाया और अनिल कल्ला महापौर निर्वाचित हुए। महापौर चुनाव में उन्हें 50 वोट मिले। यह कांग्रेस के लिए केवल एक निगम बचाने की बात नहीं, बल्कि प्रदेश की शहरी राजनीति में अपने प्रभाव की मौजूदगी दर्ज कराने वाला परिणाम है।
राजस्थान में अब तक 7 नगर निगमों में महापौर चुने जा चुके हैं। इनमें भाजपा ने 6—अजमेर, अलवर, भरतपुर, भीलवाड़ा, पाली और उदयपुर—में महापौर बनाया, जबकि बीकानेर में कांग्रेस के अनिल कल्ला महापौर निर्वाचित हुए। दिलचस्प बात यह है कि कई जगह वार्डों में सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद उसी दल का प्रत्याशी महापौर नहीं बन पाया। अजमेर और पाली इसके प्रमुख उदाहरण हैं। अजमेर में कांग्रेस के 37, भाजपा के 32 और निर्दलीयों के 11 पार्षद थे, फिर भी भाजपा की अनामिका शर्मा 43 मत लेकर महापौर बनीं। पाली में कांग्रेस 29 वार्डों के साथ सबसे बड़ी पार्टी थी, लेकिन भाजपा की नमिता बुबकिया 33 मत लेकर महापौर बनीं। बीकानेर में स्थिति इसके उलट रही। कांग्रेस ने 80 में से 42 वार्ड जीते और 41 के बहुमत आंकड़े को पार किया। अनिल कल्ला महापौर बने, जबकि भाजपा के 27 पार्षद थे। छोटे दलों और निर्दलीयों की मौजूदगी बारां नगर परिषद में आम आदमी पार्टी की शीतल राठौड़ सभापति बनीं, जो राजस्थान में आप के लिए पहला नगर निकाय बोर्ड है। माकपा ने बीकानेर जिले की नोखा नगरपालिका और आरएलपी ने नागौर की मूंडवा नगरपालिका में अध्यक्ष पद जीता। सात निकायों में निर्दलीय प्रमुख बने।
राजस्थान के दस नगर निगमों में से अब भी जयपुर, जोधपुर और कोटा नगर निगम तथा सुकेत नगरपालिका के प्रमुख पदों का फैसला होना बाकी है, जहां चुनाव 25 सितंबर को होना है। जयपुर और कोटा में भाजपा के पास निर्विवाद बहुमत है। जयपुर में 150 में बहुमत का आंकड़ा 76 है और भाजपा के पास 78 सीटें हैं। पुनर्मतदान में कांग्रेस ने चारों प्रभावित वार्ड जीतकर अपनी संख्या 57 की, लेकिन भाजपा का बहुमत बरकरार रहा। जोधपुर में सबसे रोचक मुकाबला है। शुरुआती परिणाम में भाजपा 45 और कांग्रेस 44 पर थी। 10 अन्य में से सात निर्दलीयों के समर्थन का दावा भाजपा ने किया, जिससे उसका समर्थित आंकड़ा 52 हो गया। इसलिए यहां भाजपा का बहुमत निर्दलीय समर्थन पर आधारित है। सुकेत नगरपालिका में तस्वीर बराबरी की है। भाजपा और कांग्रेस दोनों के पास 10-10 वार्ड पार्षद हैं। 25 सदस्यीय नगरपालिका में बहुमत के लिए 13 पार्षदों की जरूरत होगी, इसलिए यहां भी निर्दलीय निर्णायक स्थिति में हैं। इन चारों निकायों में महापौर और अध्यक्ष का चुनाव 25 सितंबर को होना है लेकिन इससे पहले 22 सितंबर को 22 सितंबर को राजस्थान के 305 शहरी निकायों में उप-प्रमुख पदों के चुनाव होंगे। ताजा चुनाव कार्यक्रम के अनुसार इनमें 7 नगर निगमों में उप-महापौर,47 नगर परिषदों में उप-सभापति,251 नगरपालिकाओं में उपाध्यक्ष यानी कुल 305 निकायों में उप-महापौर, उप-सभापति और उपाध्यक्ष चुने जाएंगे। जिसमें एक महत्वपूर्ण अपवाद है कि जयपुर, जोधपुर और कोटा नगर निगम तथा सुकेत नगरपालिका के शीर्ष पदों के चुनाव बाद में रखे गए हैं। इन चार निकायों में उप-प्रमुख पदों का चुनाव 26 सितंबर को संभावित है। इसलिए 22 सितंबर को होने वाला चुनाव 305 निकायों का है, 309 निकायों का नहीं।





