अशोक भाटिया
मध्य प्रदेश के शिवपुरी में बागेश्वर धाम के प्रमुख धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री द्वारा भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण की तुलना करते हुए दिया गया एक विवादास्पद बयान इन दिनों देशव्यापी विमर्श और गहरे जन-आक्रोश का केंद्र बना हुआ है। एक धार्मिक कथा के दौरान दिए गए इस बयान में उन्होंने भगवान राम को सीधा और मर्यादित बताते हुए, भगवान कृष्ण और उनके पवित्र धाम वृंदावन को लेकर कुछ ऐसी टिप्पणियां कर दीं जिसे ब्रजवासियों, संतों और करोड़ों सनातन धर्मावलंबियों ने आराध्य का घोर अपमान माना। विवाद इस कदर बढ़ा कि चौतरफा घिरे धीरेंद्र शास्त्री को अपनी केन्या यात्रा के दौरान नैरोबी से एक वीडियो संदेश जारी कर हाथ जोड़कर बिना शर्त माफी मांगनी पड़ी। उन्होंने सफाई दी कि उनके बयान को संदर्भ से काटकर पेश किया गया और उनका इरादा भगवान कृष्ण की त्रिभंग मुद्रा (तीन जगह से मुड़ी हुई दिव्य छवि) और उनके नटखट स्वभाव को रेखांकित करना था, न कि उनका उपहास उड़ाना। हालांकि, इस माफीनामे के बाद भी समाज में सुलगती बहस शांत नहीं हुई है। यह पूरी घटना केवल एक कथावाचक की जुबान फिसलने या सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समकालीन भारत में धार्मिक विमर्श के बदलते स्वरूप, व्यासपीठ की गिरती गरिमा, भीड़ को रिझाने की अंधी दौड़ और डिजिटल युग में जन-भावनाओं के त्वरित भड़कने की गंभीर प्रवृत्तियों को उजागर करती है। यह समय इस बात पर बेहद संजीदगी से विचार करने का है कि जो व्यासपीठ सदियों से समाज को नैतिकता, मर्यादा और अध्यात्म का पाठ पढ़ाती आई है, क्या वह आज केवल मनोरंजन, तालियां बटोरने और लाउडस्पीकर संस्कृति का माध्यम बनकर रह गई है?
भारतीय वास्तुकला, दर्शन और अध्यात्म में भगवान श्रीकृष्ण की ‘त्रिभंग ललित मुद्रा’ को परम सौंदर्य, आनंद और रस का साक्षात स्वरूप माना गया है। भगवान कृष्ण का तीन जगहों से मुड़कर बांसुरी बजाना कोई शारीरिक वक्रता या चरित्र का दोष नहीं है, बल्कि वह ब्रह्मांडीय लीला का वह चरम बिंदु है जहां आकर न्याय, प्रेम और कूटनीति एक साथ समाहित हो जाते हैं। ऐसे में किसी सार्वजनिक मंच से श्रीकृष्ण को ‘टेढ़ा’ कहना और उनके धाम वृंदावन के प्रति हल्के शब्दों का प्रयोग करना न केवल अज्ञानता को दर्शाता है, बल्कि करोड़ों भक्तों की गहरी आस्था पर आघात भी करता है। सनातन परंपरा की यह सबसे बड़ी खूबसूरती रही है कि यहां हरि और हर, राम और कृष्ण में कभी कोई भेद नहीं माना गया। तुलसीदास जी ने जिस रामचरितमानस की रचना की, उसी परंपरा में सूरदास और रसखान ने कृष्ण भक्ति के सागर बहाए। शास्त्र कहते हैं कि ‘एकं सद्विप्रा बहुधा वदंति’ अर्थात सत्य एक ही है, विद्वान उसे अलग-अलग नामों से पुकारते हैं। जब हमारे मूल शास्त्र ही राम और कृष्ण को एक ही परम तत्व के दो रूप मानते हैं, तो किसी समकालीन कथावाचक द्वारा मंच पर खड़े होकर उनके बीच तुलनात्मक मूल्यांकन करना और एक को दूसरे से कमतर या श्रेष्ठ दिखाना पूरी तरह से अतार्किक और परंपरा-विरोधी प्रतीत होता है।
इस पूरे विवाद का एक सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि आज के दौर में कथावाचक पौराणिक आख्यानों को जनमानस तक पहुंचाने के लिए ‘मास अपील’ या भीड़ को रिझाने की कला पर अत्यधिक निर्भर हो गए हैं। आधुनिक दौर के कई कथावाचकों ने व्यासपीठ को एक ऐसे लोक-मंच में तब्दील कर दिया है जहां गंभीर आध्यात्मिक चर्चाओं की जगह लटके-झटके, शेरो-शायरी, हास्य-व्यंग्य और चमत्कारों के दावों ने ले ली है। मंच पर उपस्थित हजारों-लाखों की भीड़ को बांधे रखने और उन्हें लगातार ताली बजाने पर मजबूर करने के मनोवैज्ञानिक दबाव में कई बार कथावाचक अपनी भाषा का नियंत्रण खो बैठते हैं। हास्य पैदा करने के चक्कर में वे भूल जाते हैं कि वे किसी लाफ्टर शो के मंच पर नहीं, बल्कि उस परम पवित्र व्यासपीठ पर बैठे हैं जिसका एक-एक शब्द समाज के लिए मार्गदर्शक होना चाहिए। धीरेंद्र शास्त्री के इस बयान के पीछे भी वही मानसिकता दिखाई देती है जहां श्रोताओं को गुदगुदाने या एक नया नैरेटिव देने के प्रयास में शब्दों के चयन में भारी लापरवाही बरती गई। जब धार्मिक मंचों पर गंभीरता की जगह लोक-लुभावनवाद हावी होने लगता है, तो इस तरह के वैचारिक और भाषाई स्खलन अनिवार्य हो जाते हैं।
डिजिटल क्रांति और सोशल मीडिया के इस युग ने इस समस्या को और अधिक जटिल बना दिया है। आज किसी भी कथा की लाइव स्ट्रीमिंग होती है और चंद सेकंड के भीतर उसके छोटे-छोटे हिस्से (रील्स और शॉर्ट्स) बनाकर इंटरनेट पर तैरने लगते हैं। धीरेंद्र शास्त्री ने अपनी सफाई में बार-बार यही तर्क दिया कि उनका पूरा वीडियो नहीं देखा गया और केवल ‘कट-पेस्ट’ करके विवाद खड़ा किया गया। हालांकि सोशल मीडिया के इस दौर में यह बहाना पूरी तरह स्वीकार्य नहीं हो सकता। यदि आप एक सार्वजनिक हस्ती हैं और लाखों लोग आपको सुनते हैं, तो यह आपकी प्राथमिक जिम्मेदारी है कि आप ऐसे शब्दों का प्रयोग ही न करें जिन्हें संदर्भ से अलग करने पर समाज में विद्वेष फैले। इंटरनेट के इस दौर में आधी-अधूरे सच और सनसनीखेज क्लिपिंग्स का वायरल होना एक कड़वी हकीकत है। इस वास्तविकता से आंखें मूंदकर मंच पर कुछ भी बोल देना और बाद में सोशल मीडिया को दोष देना अपनी जिम्मेदारी से भागने जैसा है। आधुनिक कथावाचकों को यह समझना होगा कि उनके मुख से निकला एक-एक शब्द अब केवल पंडाल में बैठे लोगों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह वैश्विक स्तर पर रिकॉर्ड हो रहा है और उसका त्वरित सामाजिक प्रभाव पड़ रहा है।
इस विवाद ने भारतीय राजनीति को भी एक नया और आक्रामक अखाड़ा प्रदान कर दिया है। यह मामला सिर्फ एक बयान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अब इस पर बड़े कानूनी कदम भी उठने लगे हैं। सांसद पप्पू यादव ने दिल्ली के संसद मार्ग थाने पहुंचकर धीरेंद्र शास्त्री के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की है। वहीं दूसरी तरफ, समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने बिना नाम लिए इस पर तीखी आपत्ति जताते हुए इसे विदेशी या आंतरिक ताकतों की मदद से हिंदू धर्म को बदनाम करने और सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने की साजिश करार दिया है। अखिलेश यादव ने यहां तक सवाल उठाया कि ऐसे लोग किसके राजनीतिक संरक्षण में सक्रिय हैं और मांग की कि इनके सभी कार्यक्रम तुरंत रद्द होने चाहिए। राजनीति का यह तीखा रुख यह साफ करता है कि भारत में धर्म और राजनीति का अंतर्संबंध कितना संवेदनशील है। जब भी कोई धार्मिक गुरु विवादों में घिरता है, राजनीतिक दल तुरंत सक्रिय होकर इसे अपने एजेंडे के अनुकूल मोड़ देने की कोशिश में जुट जाते हैं। संपादकीय दृष्टिकोण से यह देखना बेहद जरूरी है कि धार्मिक विवादों को जब विशुद्ध रूप से राजनीतिक चश्मे से देखा जाने लगता है, तो मूल समस्या—यानी व्यासपीठ की मर्यादा और भाषाई शुचिता—का मुद्दा कहीं पीछे छूट जाता है और केवल राजनीतिक नूराकुश्ती ही शेष रह जाती है।
इस पूरे प्रकरण से जो सबसे बड़ा सबक मिलता है, वह यह है कि अब समय आ गया है जब भारत के शीर्ष संतों, मठाधीशों और धार्मिक विद्वानों को सामूहिक रूप से आगे आकर व्यासपीठ के लिए एक आचार संहिता तय करनी चाहिए। व्यासपीठ किसी व्यक्ति विशेष की जागीर नहीं है, यह उस ज्ञान और परंपरा का प्रतीक है जो महर्षि वेदव्यास से शुरू होकर हम तक पहुंची है। यदि कोई भी कथावाचक—चाहे उसकी लोकप्रियता कितनी ही अधिक क्यों न हो—इस पीठ पर बैठकर मर्यादित भाषा का उल्लंघन करता है, तो उसे धार्मिक बिरादरी द्वारा ही टोका जाना चाहिए। आत्म-नियमन ही वह एकमात्र तरीका है जिससे सनातन परंपरा की मूल भावना को अक्षूर्ण रखा जा सकता है। कथाओं का मुख्य उद्देश्य समाज में शांति, करुणा, सदाचार और ईश्वर के प्रति निष्काम प्रेम जगाना होना चाहिए, न कि विवादों के जरिए खुद को चर्चा में बनाए रखना। धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने माफी मांगकर निश्चित रूप से एक बड़े टकराव को टालने का प्रयास किया है, लेकिन ब्रज के संतों और विद्वानों का यह आक्रोश इस बात की चेतावनी है कि आस्था के शिखरों पर बैठे लोगों को अपनी वाणी के प्रति अत्यंत सतर्क रहना होगा। वाणी का तीर एक बार कमान से छूट जाए तो वह घाव कर ही देता है, भले ही बाद में उस पर माफी का मरहम लगाने की कोशिश की जाए। यह विवाद पूरे देश के धार्मिक प्रचारकों के लिए एक गंभीर आत्मचिंतन का क्षण है कि वे धर्म की व्याख्या मनोरंजन के लिए कर रहे हैं या लोक-कल्याण के लिए।





