संसदीय गतिरोध, लोकतंत्र की बढ़ती कीमत

Parliamentary Deadlock: The Rising Cost of Democracy

संसद की कार्यवाही परप्रत्येक मिनट ढ़ाई लाख रूपये का सार्वजनिक व्यय,बाधित कार्यवाही घटती संसदीय उत्पादकता व करदाताओं के धन पर उठते ज्वलंत सवाल

विनोद सिंह ‘तकियावाला’

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी संसद है।यही वह सर्वोच्च राष्ट्रीय मंच है,जहाँ 140 करोड़ भारतीयों की आकांक्षाएँ, समस्याएँ,आशाएँ और भविष्य नीति एवं कानून का स्वरूप ग्रहण करते हैं।संसद केवल विधेयकों को पारित करने की संस्था नहीं, बल्कि सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने,विपक्ष को अपनी बात रखने का अवसर देने और राष्ट्रीय सहमति निर्मित करने का संवैधानिक मंच है।संसद चलती है तो लोकतंत्र जीवंत दिखाई देता है,सरकार उत्तरदायी बनती है, विपक्ष प्रभावी भूमिका निभाता है और जनता का विश्वास मजबूत होता है।किंतु जब यही संसद बार-बार हंगामे और स्थगन की भेंट चढ़ जाती है,तब केवल कार्यवाही ही नहीं रुकती,बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों,विकास की गति और जनविश्वास पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

वर्तमान मानसून सत्र एक बार फिर इसी चिंता को सामने लेकर आया है।सत्ता पक्ष और विपक्ष अपने-अपने राजनीतिक तर्कों के साथ आमने-सामने हैं।विपक्ष विभिन्न राष्ट्रीय मुद्दों पर तत्काल चर्चा और जवाबदेही की माँग कर रहा है,जबकि सरकार संसदीय नियमों के अंतर्गत कार्यवाही संचालित करने की बात कह रही है।परिणाम यह है कि लोकसभा और राज्यसभा,दोनों सदनों की कार्यवाही बार-बार बाधित हो रही है।प्रश्न यह नहीं कि किसका पक्ष सही है और किसका गलत; वास्तविक प्रश्न यह है कि इस राजनीतिक टकराव की कीमत कौन चुका रहा है?इसका उत्तर स्पष्ट है-देश का करदाता।

संसद की कार्यवाही का प्रत्येक मिनट अत्यंत मूल्यवान है। उपलब्ध संसदीय आकलनों के अनुसार संसद के संचालन पर प्रति मिनट औसतन लगभग ढाई लाख रुपये का सार्वजनिक व्यय होता है।अर्थात एक घंटे की कार्यवाही पर लगभग डेढ़ करोड़ रुपये और एक पूर्ण कार्यदिवस में लगभग 12 से 15 करोड़ रुपये तक खर्च होते हैं। इस राशि में सांसदों के वेतन एवं भत्ते,संसद सचिवालय का प्रशासनिक व्यय, सुरक्षा व्यवस्था,अनुवाद सेवाएँ, प्रत्यक्ष प्रसारण,सूचना प्रौद्योगिकी प्रणाली,बिजली,रखरखाव तथा हजारों कर्मचारियों का वेतन सम्मिलित होता है।संसद चले या न चले,यह व्यय निरंतर होता रहता है।इसलिए जब कार्यवाही बिना किसी विधायी उपलब्धि के स्थगित हो जाती है,तब जनता के धन का प्रत्यक्ष नुकसान होता है।

मानसून सत्र के शुरुआती दिनों में दोनों सदनों की कार्यवाही बार- बार बाधित होने से करोड़ों रुपये मूल्य का संसदीय समय व्यर्थ चला गया।प्रारंभिक दिनों में अनेक बार सदन कुछ ही मिनटों में स्थगित करने पड़े।इससे न केवल प्रश्नकाल प्रभावित हुआ, बल्कि शून्यकाल,विधायी कार्य और जनहित के अनेक विषय भी चर्चा से वंचित रह गए।संसद की कार्यवाही पर होने वाला व्यय तो यथावत जारी रहा,किंतु उसके अनुरूप विधायी उपलब्धियाँ सामने नहीं आ सकीं।यही कारण है कि संसद में होने वाला व्यवधान अब केवल राजनीतिक नहीं,बल्कि आर्थिक उत्तरदायित्व का भी विषय बन चुका है।यदि पिछले एक दशक पर दृष्टि डालें तो स्थिति मिश्रित दिखाई देती है। वर्ष 2014 के बाद कई संसदीय सत्र ऐसे रहे,जिनमें लोकसभा और राज्यसभा की उत्पादकता 100 प्रतिशत से अधिक दर्ज की गई। इसका अर्थ यह है कि सदनों ने निर्धारित समय से अधिक बैठकर लंबित कार्यों का भी निपटारा किया।वहीं अनेक सत्र ऐसे भी रहे,जहाँ लगातार व्यवधानों के कारण उत्पादकता में उल्लेखनीय गिरावट आई और विधायी समय का बड़ा भाग नष्ट हो गया।यह विरोधाभास बताता है कि भारतीय संसद में क्षमता की कमी नहीं है; समस्या तब उत्पन्न होती है,जब राजनीतिक सहमति संवाद का स्थान छोड़कर टकराव का रूप ले लेती है।

लोकसभा और राज्यसभा की उत्पादकता केवल आँकड़ों का विषय नहीं है।उसके पीछे करोड़ों नागरिकों की अपेक्षाएँ जुड़ी होती हैं।संसद में प्रत्येक दिन किसानों की आय,युवाओं के रोजगार, शिक्षा,स्वास्थ्य,राष्ट्रीय सुरक्षा, अर्थव्यवस्था,आधारभूत संरचना, पर्यावरण,महिला सशक्तिकरण, सामाजिक न्याय और राज्यों से जुड़े अनेक प्रश्न उठाए जाने होते हैं।प्रश्नकाल में सांसद सरकार से जवाब माँगते हैं।शून्यकाल में तत्काल जनहित के मुद्दे उठाए जाते हैं।स्थायी समितियों की अनुशंसाओं पर चर्चा होती है।नए विधेयकों पर बहस होती है।किंतु जब सदन बार-बार स्थगित हो जाता है,तब यह पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया बाधित हो जाती है।लोकतंत्र में विरोध आवश्यक है। एक सशक्त विपक्ष लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त है।सरकार से कठोर प्रश्न पूछना,नीतियों की समीक्षा करना और जनता के मुद्दों को मुखरता से उठाना विपक्ष का संवैधानिक दायित्व है।उसी प्रकार सरकार का दायित्व है कि वह संसद के प्रति उत्तरदायी रहे और महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय विषयों पर चर्चा के लिए पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराए।किंतु विरोध और व्यवधान में मौलिक अंतर है।विरोध लोकतंत्र को मजबूत करता है, जबकि निरंतर व्यवधान लोकतांत्रिक संस्थाओं की प्रभावशीलता को कमजोर करता है।संसद में यदि बहस के स्थान पर केवल नारे,पोस्टर और स्थगन दिखाई दें तो सबसे बड़ी क्षति संवाद की संस्कृति को होती है।

भारतीय लोकतंत्र की शक्ति हमेशा उसकी संवाद क्षमता रही है।संसद के इतिहास में अनेक अवसर ऐसे आए,जब तीखे राजनीतिक मतभेदों के बावजूद महत्वपूर्ण राष्ट्रीय निर्णय सर्वसम्मति अथवा व्यापक चर्चा के बाद लिए गए।यही संसदीय परंपरा लोकतंत्र को परिपक्व बनाती है।इसलिए संसद का निरंतर बाधित होना केवल वर्तमान राजनीतिक विवाद का विषय नहीं,बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए भी गंभीर चिंता का संकेत है।संसद की कार्यवाही बाधित होने का सबसे बड़ा नुकसान केवल आर्थिक नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक भी होता है।संसद वह मंच है जहाँ सरकार जनता के प्रति उत्तरदायी बनती है,नीतियों की समीक्षा होती है और राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर व्यापक विमर्श होता है।जब बार-बार सदन स्थगित होते हैं,तब प्रश्नकाल प्रभावित होता है, शून्यकाल बाधित हो जाता है, निजी सदस्य विधेयक चर्चा से वंचित रह जाते हैं और अनेक महत्त्वपूर्ण विधेयकों पर सार्थक बहस अधूरी रह जाती है। लोकतंत्र की आत्मा संवाद में निहित है, शोर और गतिरोध में नहीं।भारतीय संविधान संसद को सर्वोच्च विधायी संस्था का दर्जा देता है।संविधान के अनुच्छेद 79 से 122 तक संसद की संरचना, अधिकार और कार्यप्रणाली का विस्तृत उल्लेख किया गया है। संविधान निर्माताओं ने स्पष्ट रूप से यह परिकल्पना की थी कि मतभेदों का समाधान बहस,तर्क और संवाद के माध्यम से होगा। संविधान सभा में डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संसदीय लोकतंत्र का मूल आधार उत्तरदायित्व, विमर्श और जनप्रतिनिधित्व को माना था।इसलिए जब संसद में विचार-विमर्श की जगह हंगामा और गतिरोध ले लेता है,तब संविधान की मूल भावना भी आहत होती है।विश्व के प्रमुख लोकतांत्रिक देशों की संसदीय परंपराएँ भी इस दिशा में महत्वपूर्ण संदेश देती हैं।ब्रिटेन की हाउस ऑफ कॉमन्स में प्रधानमंत्री से तीखे प्रश्न पूछे जाते हैं,अमेरिका की कांग्रेस में सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच गहरे वैचारिक मतभेद होते हैं, जापान, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा की संसदों में भी विरोध दर्ज कराया जाता है,किन्तु अधिकांश परिस्थितियों में विधायी कार्यवाही पूरी तरह ठप नहीं होने दी जाती। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण लोकतंत्र में भी राजनीतिक असहमति स्वाभाविक है,परंतु संवाद का मार्ग कभी बंद नहीं होना चाहिए।

यह कहना भी उचित नहीं होगा कि संसद में उत्पन्न प्रत्येक गतिरोध के लिए केवल विपक्ष ही उत्तरदायी है। लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष दोनों की समान भूमिका है।विपक्ष का दायित्व है कि वह जनहित के मुद्दों को पूरी दृढ़ता से उठाए,जबकि सरकार का दायित्व है कि वह उन मुद्दों पर चर्चा और जवाबदेही से पीछे न हटे। यदि दोनों पक्ष राजनीतिक लचीलापन और संसदीय परिपक्वता का परिचय दें, तो अधिकांश गतिरोध प्रारम्भिक स्तर पर ही समाप्त हो सकते हैं। संसद किसी एक दल का मंच नहीं, बल्कि समूचे राष्ट्र का लोकतांत्रिक संस्थान है।वर्तमान परिस्थितियाँ इसलिए भी चिंता उत्पन्न करती हैं क्योंकि भारत आज विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में स्थान बनाने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है।आधारभूत संरचना, रेल, .रक्षा, डिजिटल प्रौद्योगिकी,अंतरिक्ष, हरित ऊर्जा,कृत्रिम बुद्धिमत्ता, विनिर्माण और निवेश जैसे क्षेत्रों में देश अभूतपूर्व परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है।ऐसे समय में संसद का प्रत्येक कार्यदिवस राष्ट्रीय विकास की दिशा तय करने वाला होता है। यदि वही समय राजनीतिक टकराव में व्यतीत हो जाए, तो उसका प्रभाव केवल वर्तमान विधायी कार्यों पर नहीं,बल्कि दीर्घकालिक नीति-निर्माण पर भी पड़ता है।

संसदीय कार्यों की समीक्षा बताती है कि जब भी सदनों में व्यवस्थित चर्चा हुई है,तब अनेक ऐतिहासिक विधेयक व्यापक बहस के बाद पारित हुए हैं।इसके विपरीत,लगातार व्यवधान वाले सत्रों में प्रश्नकाल की अवधि घटी, विधायी समय नष्ट हुआ और संसदीय समितियों कीअनुशंसाओं पर भी अपेक्षित चर्चा नहीं हो सकी। यही कारण है कि संसदीय उत्पादकता आज केवल एक प्रशासनिक आँकड़ा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक गुणवत्ता का मानदंड बन चुकी है।करदाताओं का धन केवल संसद भवन, वेतन,सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर ही व्यय नहीं होता,बल्कि उस लोकतांत्रिक विश्वास पर भी व्यय होता है कि उनके निर्वाचित प्रतिनिधि संसद में उनकी आवाज़ बनेंगे।जब सदन बिना कार्यवाही के स्थगित हो जाता है,तब केवल समय नहीं,बल्कि जनता का विश्वास भी प्रभावित होता है। इसलिए यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या संसद में बार-बार होने वाले व्यवधानों के लिए अधिक प्रभावी जवाबदेही तय नहीं होनी चाहिए?संसदीय विशेषज्ञ लंबे समय से कुछ महत्वपूर्ण सुधारों की आवश्यकता पर बल देते रहे हैं।इनमें बार-बार व्यवधान उत्पन्न करने वाले सदस्यों के विरुद्ध प्रभावी अनुशासनात्मक व्यवस्था, प्रश्नकाल और शून्यकाल की निरंतरता सुनिश्चित करना,राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर समयबद्ध चर्चा की अनिवार्यता,सभी दलों के बीच नियमित संवाद तंत्र को सशक्त बनाना तथा संसदीय आचार संहिता का कठोर पालन प्रमुख सुझाव हैं।लोकतंत्र की मजबूती दंड से नहीं,बल्कि राजनीतिक परिपक्वता,संसदीय मर्यादा और संवाद की संस्कृति से आती है।जनता अपने प्रतिनिधियों को संसद में केवल विरोध प्रदर्शन के लिए नहीं,बल्कि अपनी समस्याओं का समाधान खोजने के लिए भेजती है।किसानों की आय,युवाओं का रोजगार, महँगाई,शिक्षा,स्वास्थ्य,राष्ट्रीय सुरक्षा, जल संकट, पर्यावरण, सामाजिक न्याय और राज्यों के विकास जैसे विषय संसद की सर्वोच्च प्राथमिकता होने चाहिए। इन मुद्दों पर जितनी गंभीर और रचनात्मक चर्चा होगी,लोकतंत्र उतना ही सुदृढ़ होगा।भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और उसकी सबसे बड़ी शक्ति उसकी संसद है।मतभेद लोकतंत्र की स्वाभाविक विशेषता हैं, किंतु गतिरोध उसकी नियति नहीं बन सकता।संसद चलेगी तो बहस होगी,बहस होगी तो जवाबदेही तय होगी, जवाबदेही होगी तो बेहतर कानून बनेंगे और बेहतर कानून बनेंगे तो राष्ट्र की प्रगति को नई गति मिलेगी।अंततः यह स्मरण रखना होगा कि संसद किसी राजनीतिक दल की नहीं,बल्कि पूरे राष्ट्र की संस्था है।वहाँ व्यतीत होने वाला प्रत्येक मिनट संविधान की गरिमा,जनता के विश्वास और करदाताओं की गाढ़ी कमाई से जुड़ा हुआ है। इसलिए सत्ता और विपक्ष-दोनों का समान दायित्व है कि वे राजनीतिक हितों से ऊपर उठकर संसद की मर्यादा,लोकतांत्रिक परंपराओं और राष्ट्रीय उत्तरदायित्व का निर्वहन करें। लोकतंत्र की वास्तविक विजय सत्ता की जीत या विपक्ष की हार में नहीं,बल्कि इस बात में है कि संसद चले, संवाद हो,निर्णय हों और भारत निरंतर विकास की नई ऊँचाइयों की ओर अग्रसर रहे।