सोशल मीडिया पर बच्चों की सुरक्षा और मेटा की जवाबदेही

Child Safety on Social Media and Meta's Accountability

सुनील कुमार महला

सोशल मीडिया मंचों पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री के प्रसार को लेकर केंद्र सरकार के कड़े रुख के बाद मेटा(अमेरिकी प्रौद्योगिकी कंपनी) का भारतीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों को ऐसे मामलों की जानकारी देने पर सहमत होना स्वागतयोग्य कदम है, लेकिन इसे मंजिल के बजाय एक लंबी लड़ाई की शुरुआत के रूप में देखा जाना चाहिए। आज का युग डिजिटल युग है और इस डिजिटल युग में डिजिटल दुनिया के बढ़ते खतरों से बच्चों को बचाने के लिए तकनीकी कंपनियों, सरकार और कानून लागू करने वाली एजेंसियों के बीच जवाबदेही का स्पष्ट तंत्र बनाना अब जरूरी हो गया है।

दरअसल, जुलाई 2026 में सोशल मीडिया मंच इंस्टाग्राम पर बच्चों के यौन शोषण एवं दुरुपयोग से जुड़ी सामग्री को बढ़ावा देने वाले कथित विज्ञापनों की रिपोर्ट सामने आने के बाद इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने मेटा-फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप की मूल कंपनी के अधिकारियों को तलब किया तथा संबंधित विज्ञापनों और सामग्री को हटाने और यह स्पष्ट करने को कहा कि ऐसी सामग्री उसके मंच पर कैसे उपलब्ध हुई। यहां पाठकों को बताता चलूं कि इस संबंध में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने भी मामले का संज्ञान लेते हुए मेटा के अधिकारियों से जवाब मांगा और इसके वरिष्ठ अधिकारियों को तलब किया। इस पूरे घटनाक्रम की गंभीरता इसलिए और बढ़ जाती है, क्योंकि कृत्रिम बुद्धिमत्ता(एआइ) ने आपत्तिजनक सामग्री तैयार करना पहले की तुलना में आसान बना दिया है। सरल शब्दों में कहें तो कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल ने जहां रचनात्मकता और तकनीकी क्षमताओं को नई ऊंचाई दी है, वहीं इसके दुरुपयोग से आपत्तिजनक और भ्रामक सामग्री तैयार करना भी पहले की तुलना में आसान हो गया है। वास्तव में, तकनीक का यह दुरुपयोग केवल सामग्री के प्रसार तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे बच्चों को निशाना बनाने वाले नए तौर-तरीकों का खतरा भी बढ़ रहा है। ऐसे में सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी केवल ऐसी सामग्री को हटाने तक ही सीमित नहीं रहनी चाहिए। वास्तव में, उन्हें ऐसी सामग्री तैयार करने, प्रसारित करने या उसके लिए उपयोगकर्ताओं को आकर्षित करने वाले खातों और नेटवर्क की पहचान करने तथा कानून प्रवर्तन एजेंसियों को समय रहते आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी सुनिश्चित करनी होगी।

भारत सरकार ने इस मामले में स्पष्ट किया है कि भारत में काम करने वाले सोशल मीडिया मंचों को भारतीय कानूनों और नियामकीय व्यवस्था का पालन करना होगा। सरकार और मेटा के बीच हुई चर्चाओं में बाल यौन शोषण सामग्री चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज मटेरियल-सीएसएएम, कृत्रिम बुद्धिमत्ता(एआइ) से निर्मित आपत्तिजनक सामग्री, डीपफेक, सामग्री की निगरानी, एल्गोरिदम और मानवीय निगरानी जैसे मुद्दे प्रमुख रहे हैं। गौरतलब है कि 2026 में लागू और संशोधित नियामकीय व्यवस्था के तहत सोशल मीडिया मध्यस्थों पर अवैध और हानिकारक सामग्री के विरुद्ध अधिक कठोर दायित्व निर्धारित किए गए हैं। यहां पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि सरकार या सक्षम न्यायालय के निर्देश पर ऐसी सामग्री को हटाने की समय-सीमा भी घटाकर तीन घंटे की गई है। इतना ही नहीं, गैर-सहमति वाली निजी अथवा अंतरंग सामग्री के संबंध में भी कठोर समय-सीमा निर्धारित की गई है।

इस क्रम में हाल ही में, जब यह आलेख लिखा जा रहा है (16 सितंबर 2026 को) सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, मेटा ने भारत में बच्चों के यौन शोषण से संबंधित मामलों की जानकारी सीधे भारतीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों को देने पर सहमति जताई है, यह स्वागत योग्य है। पहले ऐसी रिपोर्टिंग में अमेरिका स्थित नेशनल सेंटर फॉर मिसिंग एंड एक्सप्लॉइटेड चिल्ड्रन की भूमिका रही है। अब भारतीय साइबर अपराध तंत्र तक ऐसी सूचनाएं अधिक सीधे पहुंचाने की व्यवस्था की दिशा में कदम उठाया गया है।मेटा ने अपने पक्ष में कहा है कि उसकी नीतियों में बाल यौन शोषण के प्रति शून्य-सहिष्णुता(जीरो टोलरेंस) है और वह कृत्रिम बुद्धिमत्ता सहित अन्य तकनीकों के माध्यम से ऐसी सामग्री की पहचान कर उसे हटाने का प्रयास करता है। मेटा के अनुसार, 2025 की अंतिम तिमाही में फेसबुक और इंस्टाग्राम से उसने 1.3 करोड़ बाल यौन शोषण संबंधी सामग्री हटाई, जिनमें 96 प्रतिशत से अधिक मामलों की पहचान उसने स्वयं की थी।

हालांकि, केवल सामग्री हटाना या मामलों की सूचना देना पर्याप्त नहीं है। सोशल मीडिया कंपनियों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच सूचना साझा करने की प्रक्रिया स्पष्ट, त्वरित और जवाबदेह होनी चाहिए। कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि ऐसी सामग्री तैयार करने और प्रसारित करने वाले खातों तथा नेटवर्क की पहचान समय रहते हो और आवश्यक साक्ष्य(प्रूफ) कानून प्रवर्तन एजेंसियों तक पहुंचें। साथ ही, सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि प्राप्त सूचनाओं की समयबद्ध जांच हो, कंपनियों की जवाबदेही तय हो और दोषियों के खिलाफ कानून के अनुसार प्रभावी कार्रवाई की जाए।

अंत में यही कहूंगा कि सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के साथ बच्चों के यौन शोषण एवं दुरुपयोग से जुड़ी सामग्री का प्रसार एक गंभीर सामाजिक और साइबर सुरक्षा चुनौती बन गया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दुरुपयोग ने ऐसी आपत्तिजनक और भ्रामक सामग्री तैयार करना भी आसान बना दिया है। ऐसी सामग्री बच्चों की गरिमा, सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है। अतः सोशल मीडिया मंचों की यह जिम्मेदारी है कि वे ऐसी सामग्री की पहचान, रोकथाम और त्वरित हटाने के लिए प्रभावी तकनीकी एवं मानवीय तंत्र विकसित करें। साथ ही, अभिभावकों और समाज को बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों के प्रति सजग रहते हुए उन्हें सुरक्षित इंटरनेट व्यवहार के बारे में जागरूक करना चाहिए। तकनीक का उपयोग रचनात्मकता और ज्ञान के लिए हो, न कि बच्चों के शोषण के लिए-यह सामूहिक जिम्मेदारी है।मेटा का ऐसे मामलों से जुड़ी जानकारी भारतीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ साझा करने का निर्णय एक सकारात्मक कदम है, लेकिन अब जरूरत इस सहमति को प्रभावी और स्थायी व्यवस्था में बदलने की है। सोशल मीडिया कंपनियों को यह समझना होगा कि भारतीय उपयोगकर्ताओं, विशेषकर बच्चों की सुरक्षा से जुड़ी जिम्मेदारियों का निर्वहन भारतीय कानून और उसकी भावना के अनुरूप ही होना चाहिए। डिजिटल दुनिया में बच्चों की सुरक्षा का मामला किसी कंपनी की सदिच्छा(किसी के कल्याण की कामना) के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। इसके लिए सरकार, तकनीकी कंपनियों, अभिभावकों, शिक्षण संस्थानों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साझा प्रयासों से एक मजबूत सुरक्षा तंत्र विकसित करना होगा।