स्कूलों के बुनियादी ढांचे की मौजूदा स्थिति सरकार करें सार्वजनिक – कॉकरोच जनता पार्टी

The government should make the current state of school infrastructure public – Cockroach Janta Party

प्रदीप शर्मा

सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक एवं संयोजक अभिजीत दिपके ने सभी राज्यों के शिक्षा मंत्रियों को पत्र लिखकर स्कूलों की स्थिति पर सार्वजनिक जानकारी देने की मांग की है. पत्र में उन्होंने कहा है कि आजादी के 80 साल बाद भी देश के कई सरकारी स्कूलों में बच्चों को पीने का साफ पानी, कार्यशील शौचालय, उचित कक्षाएं और बैठने के लिए बेंच जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। पत्र में कहा गया है कि सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति से जुड़ी तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आ रहे हैं. ऐसे हालात में बच्चों को शिक्षा हासिल करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। CJP ने स्कूलों के बुनियादी ढांचे की मौजूदा स्थिति को सार्वजनिक करने की मांग की है।

देश के सरकारी स्कूलों की बदहाली किसी से छिपी नहीं है। जिस देश में एक लाख स्कूल एक ही शिक्षक के भरोसे चल रहे हों, मूलभूत शैक्षिक सुविधाओं का अभाव हो, वहां पढ़ाई का स्तर क्या होगा, अंदाज लगाना कठिन नहीं है। कुछ स्कूल जर्जर इमारतों में चल रहे हैं, कुछ पेड़ तले व बरामदों में- तो सवाल स्वाभाविक है कि सुधार क्यों नहीं होता? आखिर इन स्कूलों का सुधार हमारे नीति-नियंताओं की प्राथमिकताओं में क्यों नहीं होता? जिस शिक्षा विभाग में अधिकारियों व कर्मचारियों की पूरी फौज तैनात है, उसकी जवाबदेही तय क्यों नहीं होती? अब भले ही सरकारी स्कूलों को सीजेपी ने अपना मुद्दा बना लिया हो, लेकिन इससे पहले ही देश के कई भागों में छात्र स्कूलों में सुधार की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे हैं। विडंबना यह है कि इन स्कूलों पर ग्रामीण, समाज के वंचित वर्गों, श्रमिकों व गरीब बच्चों की निर्भरता अधिक होती है, फलत: उनकी आवाज भी अनसुनी कर दी जाती है। यदि नेताओं और अधिकारियों के बच्चों के लिये सरकारी स्कूलों में भर्ती अनिवार्य कर दी जाती तो शायद इन स्कूलों के दिन फिर जाते। सरकारी स्कूलों का सच किसी से छिपा नहीं है। नीति आयोग के हालिया आंकड़े इस सच को अनावृत करते हैं।

आयोग के आंकड़ों के मुताबिक पिछले एक दशक में पूरे देश में 94 हजार सरकारी स्कूल बंद हुए हैं। साथ ही इसी अवधि में सरकारी अनुदान प्राप्त स्कूल भी 83 हजार से घटकर 79 हजार रह गये हैं। स्कूलों में छात्रों के दाखिले में कमी का सिलसिला भी बदस्तूर जारी है। लेकिन वहीं दूसरी ओर मुनाफा कमा रहे निजी स्कूलों का कुनबा लगातार बढ़ ही रहा है। उनकी संख्या अब 2.9 लाख से बढ़कर 3.4 लाख के करीब हो गई है। यह एक हकीकत है कि सरकारी स्कूलों की स्थिति को लेकर राजनीतिक दलों की जो फिक्र सामने आ रही है, उसके निहितार्थ समझना कठिन नहीं है। इन दलों की सरकारों के दौरान भी इन स्कूलों की दिशा-दशा में कोई बड़ा बदलाव नजर नहीं आया।

चिंता इस बात को लेकर है कि इस मुद्दे पर जो राजनीति हो रही है, कहीं उसके चलते सुधार के विमर्श पर आंच न आए। सही मायने में सरकारी स्कूलों का कायाकल्प होना चाहिए। इसमें शासन, प्रशासन, पक्ष-विपक्ष और नागरिकों की भी अहम भूमिका होनी चाहिए। नीति-नियंताओं को सोचना चाहिए कि अभिभावकों से मोटी फीस लेने वाले निजी स्कूल क्यों फल-फूल रहे हैं? सरकारी स्कूलों के पास भवन हैं, पर्याप्त जगह है, सम्मानजनक पगार वाले शिक्षक हैं और सरकारी तंत्र का समर्थन है, तो ये स्कूल पनप क्यों नहीं रहे हैं? क्यों सरकारी स्कूलों में पानी, बिजली, बेंच, टेबल व शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई जा रही हैं? बल्कि सुधारों के बजाय शिक्षकों की नियुक्ति में राजनेताओं की धांधली की खबरें अकसर मीडिया में तैरती रहती हैं। विडंबना देखिये कि पढ़ाई-लिखाई के लिये अनुकूल वातावरण की मांग को लेकर राजस्थान व उत्तर प्रदेश के कई शहरों में विद्यार्थी सड़कों पर उतरे हैं। इन बच्चों को अपने भविष्य की फिक्र थी और ये स्कूलों में गुणवत्ता का शैक्षिक वातावरण मांग रहे थे।

निश्चित रूप से हमारे नीति-नियंताओं ने सरकारी स्कूलों का उद्धार करने के लिये कभी कोई बड़ा अभियान नहीं चलाया। अब जब मुद्दा तूल पकड़ रहा है तो तमाम घोषणाएं की जा रही हैं। सही मायने में प्राथमिक शिक्षा किसी भी देश के भविष्य की बुनियाद होती है। जब इन स्कूलों में बीमार भविष्य वाले नागरिक तैयार करेंगे तो देश का भला कैसे होगा? दरअसल, सरकारी स्कूल हमारे समाज में व्याप्त आर्थिक विषमता का पर्याय हैं। जो लोग अपने बच्चों को महंगे सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ा सकते हैं, वे ही अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजने के लिये मजबूर हैं। लेकिन सोचने वाली बात यह कि मिड-डे-मील जैसे प्रलोभनों से ये सरकारी स्कूल कब तक अपना अस्तित्व बना पाएंगे? कहीं न कहीं इन स्कूलों की अनदेखी करके हम एक बड़ी आबादी को शिक्षा के मौलिक अधिकार से वंचित तो नहीं कर रहे हैं?