हाइड्रोजन तकनीक क्या बन पाएगी भारत में भविष्य की टेक्नालॉजी

Will hydrogen technology become the technology of the future in India?

गुलशन राय खत्री

आयातित पेट्रोल और प्रदूषण कम करने के लिए इथनॉलयुक्त पेट्रोल बनाने से लेकर इलैक्ट्रिक गाड़ियां लाने तक सरकार की ओर से कई कदम उठाए जा रहे हैं। लेकिन इन सबसे हटकर अब देश में हाइड्रोजन ईंधन की कवायद शुरू हो गई है। फिलहाल इसकी शुरुआत भारतीय रेलवे ने की है। पहली हाइड्रोजन ट्रेन लांच करने के साथ ही उसने अगले कुछ वर्षों में 35 हाइड्रोजन ट्रेनें चलाने की तैयारी की है। लेकिन आने वाले समय में सिर्फ ट्रेनें ही नहीं, बल्कि सड़कों पर दौड़ने वाले वाहनों के लिए भी हाइड्रोजन गैस एक तरह से ईंधन के रूप में इस्तेमाल की जा सकती है। एक तरह से भविष्य में वैकल्पिक ईंधन के रूप में बड़े पैमाने पर हाइड्रोजन का इस्तेमाल किया जा सकता है।

हालांकि फिलहाल ट्रेनों के मामले में अगर हाइड्रोजन से ट्रेनें चलाई जाती हैं तो वह इलैक्ट्रिक ट्रेनों के मामले में महंगी होंगी लेकिन भविष्य में जब बड़े पैमाने पर सड़क पर चलने वाले वाहन भी हाइड्रोजन का उपयोग करने लगेंगे तो ये अपेक्षाकृत काफी सस्ती हो जाएगी। हाइड्रोजन को ईंधन के रूप में उपयोग करने का सबसे अधिक लाभ, ये प्रदूषणरहित हैं। ट्रेन चलने पर इससे धुआं नहीं बल्कि भाप निकलती है।

सिर्फ 269 किमी के लिए
रेलवे के आंकड़ें बताते हैं कि इस वक्त रेलवे के 70,271 के ब्रॉडगेज रूट किमी में से 70 हजार किमी से अधिक का रूट इलैक्ट्रिफाई हो चुका है यानी उस पर डीजल इंजन की ट्रेनें चलाने की आवश्यकता नहीं है। ऐसे में सवाल किया जा सकता है कि जब 99 फीसदी से अधिक ब्रॉडगेज नेटवर्क पहले से ही इलैक्ट्रिफाई है तो फिर हाइड्रोजन ट्रेनों के लिए इतना भारी भरकम निवेश करने की क्या जरुरत है जबकि इलैक्ट्रिक ट्रेनें, हाइड्रोजन के मुकाबले सस्ती हैं ?

ये सही है कि सिर्फ 269 किमी का ही ब्रॉडगेज नेटवर्क ही ऐसा है, जिस पर इलैक्ट्रिक ट्रेनें नहीं चल पातीं और वहां डीजल ट्रेनें चलाने की जरुरत पड़ती है। इन डीजल ट्रेनों से जाहिर है कि वायु प्रदूषण बढ़ता है, जो हमारे पर्यावरण के लिए नुकसानदायक है। लेकिन इसके साथ ही एक और बड़ी वजह ये है कि ये 269 किमी की रेल लाइनें जिन क्षेत्रों में हैं, वे सभी दुर्गम पहाड़ी वाले या जंगल के क्षेत्र हैं। इन क्षेत्रों में इलैक्ट्रिफिकेशन करना यानी ओवरडेड वायरिंग करना या तो संभव नहीं है या फिर बेहद महंगा है। महत्वपूर्ण ये है कि इनमें से अधिकांश पर्यटन और यूनेस्को हेरिटेज वाले क्षेत्र हैं। मसलन, दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे, नीलगिरी माउंटेन रेल, कांगड़ावैली रेलवे, माथेरान हिल रेलवे, मारवाड़ गोरामघाट रेलवे। जाहिर है कि इन सभी क्षेत्रों में अगर डीजल इंजन का उपयोग किया जाता है तो औसतन हर साल डीजल इंजन से डेढ़ सौ से दो सौ टन सीओ 2 के अलावा सैकड़ों किलो अन्य प्रदूषक तत्व भी हवा में घुलते हैं। इसके अलावा ध्वनि प्रदूषण भी होता है।

इसके अलावा रेलवे में कई ऐसे सेक्शन हैं, जहां अभी भी शंटिंग का काम डीजल इंजनों के जरिए ही किया जाता है। ऐसे में वहां भी वायु प्रदूषण होता है। वैसे भी रेलवे ने 2030 तक नेट जीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य रखा हुआ है। ऐसे में इन रूटों पर अगर हाइड्रोजन ट्रेनें चलती हैं तो इन पूरे क्षेत्रों में कम से कम डीजल इंजनों से होने वाले वायु प्रदूषण को खत्म करने में कामयाबी मिलेगी।

भविष्य की टेक्नालॉजी
वैसे भी हाइड्रोजन ट्रेनों को भविष्य की टेक्नालॉजी माना जा रहा है। इसकी उपयोगिता को देखते हुए ही सबसे पहले जर्मनी ने 2018 में ही हाइड्रोजन ट्रेनें चलानी शुरू कीं। 2022 में तो रेलवे ने एक हाइड्रोजन वाली पूरी रेल लाइन ही शुरू कर दी थी। हालांकि अभी हाइड्रोजन ट्रेनें, इलैक्ट्रिक के मुकाबले महंगी हैं और औसतन एक ट्रेन और उसके इंफ्रॉस्ट्रक्चर पर लगभग डेढ़ सौ करोड़ रुपये खर्च होते हैं। लेकिन एक्सपर्टस मानते हैं कि जैसे जैसे इसका उपयोग बढ़ेगा तो यह तकनीक अपेक्षाकृत सस्ती होती जाएगी। इस तकनीक सबसे बड़ी विशेषता यही है कि जब इस तकनीक वाले इंजन दौड़ते हैं तो हवा में किसी तरह का प्रदूषित धुआं नहीं छोड़ते बल्कि पानी की भाप छोड़ते हैं। जिससे हवा में भाप घुल जाती है और फिर पानी के चक्र का हिस्सा बन जाती है।

अन्य लाभ
हाइड्रोजन गैस के लिए प्लांट लगाना महंगा होता है लेकिन अगर रेलवे और सड़क परिवहन के लिए एकसाथ ऐसे प्लांट लगाने शुरू किए गए तो ये सस्ते होते जाएंगे। इसकी एक विशेषता ये भी है कि अगर हाइड्रोजन प्लांट लगता है तो एक ही प्लांट से ट्रेनों और बस, कार, ट्रक आदि के लिए भी हाइड्रोजन गैस सप्लाई की जा सकती है यानी एक हाइड्रोजन गैस के लिए तैयार एक इंफ्रॉस्ट्रक्चर का अन्य गाड़ियों के लिए भी उपयोग किया जा सकता है। हाइड्रोजन बस का एक टैंक फुल कर दिया जाए तो चार से आठ सौ किमी तक उसे चलाया जा सकता है। यही नहीं, टैंक भरने में भी दस से 15 मिनट का समय लगता है यानी बैटरी चार्ज होने से भी बहुत कम। ऐसे में इसे भारत के लिए भी भविष्य की स्वच्छ तकनीक के रूप में माना जा रहा है। हालांकि इलैक्ट्रिक गाड़ियां भी इसी श्रेणी में हैं लेकिन अभी इलैक्ट्रिक गाड़ियों की बैटरियों की लाइफ पूरी होने पर बैटरी कचरे के निपटारा भविष्य में चिंता बन सकता है जबकि हाइड्रोजन के साथ फिलहाल ऐसी चिंता नहीं है।